संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभार्गव-चरित्र वर्णन (२) ] [ ३४३
मनीषी भगवान् ने ध्यान में मन के द्वारा स्मरण किया था केवल स्मरण करने ही से अपने चरणों में शिर झुकाकर प्रणत होने वाले भक्तों की पीड़ा का हनन कर देने वाले केशव भगवान् वहाँ पर आकर उपस्थित हो गये थे क्योंकि प्रभु तो समस्त चराचर के ईश्वर हैं—दया के सागर हैं और अपने भक्तों के वश में होने वाले हैं ।१६। अब भगवान् के सुन्दर जगत मोहन स्वरूप का वर्णन किया जाता है—उनका वर्ण नील सजल मेघ के समान था--आपका मुख विकसित कमल के सदृश था और आप रत्न जटित केयूर और हार धारण किये हुए थे । सौदामिनी विद्युत के समान पीताम्बर पहिने हुए थे और मकरों की आकृति वाले दो कुण्डल कानों में धारण कर रहे थे । मयूर पिच्छों से निर्मित और अनेक मणियों से संयुत मस्तक पर मुकुट पहिन रहे थे तथा उनके मुख कमल पर मन्द मुस्कान झलक रही थी । वे गोपियों के नाथ जिनके यश का वर्णन किया है कौस्तुभ मणि से उद्भासित वक्षःस्थल वाले थे ।२०। अद्भुत श्री से सम्पन्न श्रीकृष्ण के साथ में रासेश्वरी राधा भी थीं और श्रीदामा से अपराजित थे ।२१।
मुष्णंस्तेजांसि सर्वेषां स्वरुचा ज्ञानवारिधिः ।
अथैनमागतं दृष्ट्वा शिवः संहृष्टमानसः ।।२२
प्रणिपत्य यथान्यायं पूजयामास चागतम् ।
प्रवेश्याभ्यंतरे वेश्म राधया सहितं विभुम् ।।२३
रत्नसिंहासने रम्ये सदारं स न्यवेशयत् ।
अथ तत्र गता देवी पार्वती तनयान्विता ।।२४
ननाम चरणान्प्रभोः पुत्राभ्यां सहिता मुदा ।
अथ रामोऽपि तत्रैव गत्वा नमितकंधरः ।।२५
पार्वत्याश्चरणोपांते पपाताकुलमानसः ।
सा यदा नाभ्यनंदत्तं भार्गवं प्रणतं पुरः ।।२६
तदोवाच जगन्नाथः पार्वतीं प्रीणयन्गिरा ।।२७
श्रीकृष्ण उवाच-
अयि नगनंदिनि निंदितचंद्रमुखि त्वमिमं जमदग्निसुतम् ।
नय निजहस्तसरोजसमर्पितमस्तकमंकमनंतगुणे ।।२८