भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३४४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

भगवान् श्रीकृष्ण ज्ञान के महान् सागर थे और अपने दिव्य देह की कान्ति से सबके तेज को तिरस्कृत कर रहे थे । इसके अनन्तर जिस समय में भगवान् श्रीकृष्ण ने वहाँ पर पदार्पण किया था तो उनका दर्शन करके भगवान् शिव के मन में परमाधिक प्रसन्नता हुई थी ।२२। उन वहाँ पर समागत हुए प्रभु को न्याय के अनुसार जैसा भी महापुरुषों के लिये अभिवादन किया जाता है प्रणिपात किया और अर्चन किया था । फिर बड़े ही आदर से राधिकाजी के साथ प्रभु का अपने सदन में प्रवेश कराया था ।२३। वहाँ पर एक रत्न जटिल परम सुरम्य सिंहासन पर राधिका जी के सहित उनको विराजमान कराया था । इसके अनन्तर जब पार्वती जी ने साक्षात् प्रभु का आगमन देखा तो वह भी अपने दोनों पुत्रों के सहित वहाँ पर पहुँच गयी थीं ।२४। बड़े ही हर्षोल्लास के साथ इन्होंने अपने दोनों पुत्रों के सहित श्रीकृष्ण और श्रीराधा चरणों में प्रणाम किया था । इसके उपरान्त परशुराम भी वहीं पर पहुँच गये थे और अपनी गरदन को नीचे की ओर झुकाये हुए आकुलित मन वाले होकर पार्वती जी के चरणों के समीप में ही भूमि में गिर गये थे । किन्तु जब अपने आगे प्रणिपात करते हुए भार्गव को पार्वती जी ने अभिनन्दित नहीं किया था तो यह भगवान् श्रीकृष्ण ने स्वयं उनके हृद्गत अमर्ष का अवलोकन किया था ।२५-२६। उस समय जगतों के नाथ प्रभु श्रीकृष्ण ने अपनी परम मधुर वाणी से पार्वती जी को प्रसन्न करते हुए उनसे कहा था ।२७। श्रीकृष्ण ने कहा—अयि ! नगराज की पुत्रि ! आप तो इतने अधिक सुन्दर मुख वाली हैं कि जिसकी छटा के सामने चन्द्र भी तुच्छ है । आपके अन्दर तो अनन्त गुण गण विद्यमान हैं । अब आप इस जमदग्नि के पुत्र परशुराम को अपने कर कमलों से इसका मस्तक पकड़ कर अपनी गोद में बिठा लीजिए ।२८।

भवभयहारिणि शंभुविहारिणि कल्मषनाशिनि कुंभिगते । तव चरणे पतितं सततं कृतकिल्विषमप्यव देहि वरम् ॥२९

शृणु देवि महाभागे वेदोक्तं वचनं मम । यच्छ्रुत्वा हर्षिता नूनं भविष्यसि न संशयः । विनायकस्ते तनयो महात्मा महतां महान् ॥३०

यं कामः क्रोध उद्वेगो भयं नाविशते कदा । वेदस्मृतिपुराणेषु संहितासु च भामिनि ॥३१