भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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भार्गव-चरित्र वर्णन (२) ] [ ३४१

उवाच शंकरं रुष्टा पार्वती प्राणनायकम् ॥१०
पार्वत्युवाच—अयं ते भार्गवः शंभो शिष्यः पुत्रः समोऽभवत् ।
त्वत्तो लब्ध्वा परं तेजो वर्म त्रैलोक्यजिद्विभो ॥११
कार्त्तवीर्यार्जुनं संख्ये जितवानूर्जितं नृपम् ।
स्वकार्यं साधयित्वा तु प्रादात्तुभ्यं च दक्षिणाम् ॥१२
तत्ते सुतस्य दशनं कुठारेण न्यपातयत् ।
अनेनैव कृतार्थस्त्वं भविष्यसि न संशयः ॥१३
त्वमिमं भार्गवं शम्भो रक्षांतेवासिसत्तमम् ।
तव कार्याणि सर्वाणि साधयिष्यति सद्गुरोः ॥१४

भगवान् शङ्कर ने गणेशजी को अपने सामने देखा था जिनका मुख तिरछा हो गया था और केवल एक ही दाँत था। पार्वतीजी ने स्वामी कार्त्तिकेय से पूछा था कि इस दुर्घटना के घटित होने का क्या कारण था ।८। माताजी द्वारा जब स्वामी कार्त्तिकेय से पूछा गया तो सेनानी ने आदि से सम्पूर्ण वृत्तान्त माताजी को कहकर सुना दिया था। उस समय में वहाँ पर परशुराम भी इसको सुन ही रहे थे ।६। हे नृप ! जगतों की जननी पार्वतीजी ने पूर्ण समाचार श्रवण करके रुष्ट होती हुई अपने प्राणनायक भगवान् शङ्कर से बोलीं ।१०। पार्वतीजी ने कहा—हे शम्भो ! यह भार्गव तो आपका ही शिष्य है और पुत्र के ही समान हुआ था। हे विभो ! इसने आप ही से ऐसा परम तेज और त्रैलोक्य को जीतने वाला वर्म प्राप्त किया है ।११। इसने महान् अर्जित कार्त्तवीर्यार्जुन नृप को युद्ध में जीत लिया है यह आप ही के द्वारा प्रदत्त बलविक्रम से इसकी विजय हुई है। इसने अपने कार्य को साधित करके अर्थात् अपने शत्रु का निहनन करके अब यह आपकी सेवा में दक्षिणा दी है ।१२। वह यही तो दक्षिणा है कि आप ही के पुत्र के दाँत को अपने कुठार से तोड़कर नीचे गिरा दिया है। आप इसी कार्य से कृतार्थ होंगे—इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है ।१३। हे शम्भो ! आप इस परम श्रेष्ठ अपने छात्र तथा शिष्य की रक्षा कीजिए। आप इसके बड़े ही अच्छे गुरु हैं अब आपके समस्त कार्यों को यह ही सिद्ध करेगा ।१४।

अहं नैवात्र तिष्ठामि यत्त्वया विमता विभो ।
पुत्राभ्यां सहिता यास्ये पितुः स्वस्य निकेतनम् ॥१५