संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसगरोपाख्यान (१) ] [ ३५६
अन्दर अपने गृह में जब राम ने प्रवेश किया था तो वहाँ पर परशुराम जी ने तपस्या के परम निधि अपने पिताश्री जमदग्नि महामुनि का दर्शन किया था।१०। वे जमदग्नि मुनि साक्षात् अपने पूर्व पुरुष भृगु मुनि के समान वहाँ पर विराजमान थे जो अपने तपोबल से विग्रह और अनुग्रह करने की विशाल सामर्थ्य धारण करने वाले थे। उनके समीप में पहुँचकर राम ने उनके चरण कमलों के निकट में अपने आठों अङ्गों से भूमि का आलिङ्गन करते हुए गिर गये थे अर्थात् भूमि पड़कर साष्टाङ्ग प्रणाम किया था।११। हे भूपते ! परशुराम ने प्रणिपात करते हुए—मैं आपका दासानुदास राम हूँ—आपकी सेवा में मेरा सादर प्रणाम निवेदित है—ऐसा मुख से उच्चारण करते हुए उस सज्जनों में प्रमुख राम ने प्रणाम करने की विधि से साथ पिताश्री के दोनों चरणों का ग्रहण किया था।१२। इसके अनन्तर उन्होंने अपनी माता श्री के चरणों में करबद्ध होते हुए अभिवादन किया था। फिर परम प्रणत होकर उन दोनों माता-पिता के अतीव हर्ष का कारण स्वरूप वाक्य कहा था।१३। राम ने कहा—हे पिताजी, आपके परम दुरासद तप के प्रभाव से ही मैंने बड़े बलवान कार्त्तवीर्य राजा का पुत्रों-सैनिकों और वाहनों के सहित हनन कर दिया है। इस निवेदन का तात्पर्य यही है कि उस इतने बलशाली शत्रू के निपातन करने में मेरा पुरुषार्थ कुछ भी नहीं है यह सब कुछ आपके ही तप का प्रभाव है जिस से मेरे द्वारा वह दुष्ट मारा गया है।१४।
यस्तेऽपराधं कृतवान्दुष्टमंत्रिप्रचोदितः ।
तस्य दण्डो मया दत्तः प्रसह्य मुनिपुंगव ॥१५॥
भवन्तं तु नमस्कृत्य गतोऽहं ब्रह्मणोऽन्तिकम् ।
तं नमस्कृत्य विधिवत्स्वकार्यं प्रत्यवेदयम् ॥१६॥
स मामुवाच भगवाञ्छ्रुत्वा वृत्तांतमादितः ।
व्रज स्वकार्यसिद्धयर्थं शिवलोकं सनातनम् ॥१७॥
श्रुत्वाऽहं तद्वचस्तात नमस्कृत्य पितामहम् ।
गतवाञ्छिवलोकं वै हरदर्शनकांक्षया ॥१८॥
प्रविश्य तत्र भगवन्नुमया सहितः शिवः ।
नमस्कृतो मया देवो वांछितार्थप्रदायकः ॥१९॥