संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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का प्रक्षेप कर रहे थे जिस जल से सारी भूमि आविल हो गई थी अर्थात् भीगकर मटमैले रङ्ग की हो रही थी ।६। जहाँ पर अध्ययन शील बटु ब्रह्म-चारियों के द्वारा नित्य ही वेदों-शास्त्रों और संहिताओं का अभ्यास किया जाता था । ये सभी छात्र परमाधिक हर्ष से समन्वित तथा ब्रह्मचर्य व्रत में समास्थित रहा करते थे ।७।
अथ रामः प्रसन्नात्मा पश्यन्नाश्रमसंपदम् । प्रविवेश शनै राजन्नकृतव्रणसंयुतः ॥८ जयशब्दं नमः शब्दं प्रोच्चरद्भिद्विजात्मजैः । द्विजैश्च सत्कृतो रामः परं हर्षमुपागतः ॥६ आश्रमाभ्यंतरे तत्र संप्रविश्य निजं गृहम् । ददर्श पितरं रामो जमदग्निं तपोनिधिम् ॥१० साक्षाद्भृगुमित्रासीनं निग्रहानुग्रहक्षमम् । पपात चरणोपान्ते ह्यष्टांगालिंगितावनिः ॥११ रामोऽहं तव दासोऽस्मि प्रोच्चरन्निति भूपते । जग्राह चरणौ चापि विधिवत्सज्जनाग्रणीः ॥१२ अथ मातुश्च चरणावभिवाद्य कृतांजलिः । उवाच प्रणतो वाक्यं तयोः संहर्षकारणम् ॥१३ राम उवाच- पितस्तव प्रभावेण तपसोऽतिदुरासदः । कार्त्तवीर्यो हतो युद्धे सपुत्रबलवाहनः ॥१४
इसके अनन्तर उस परम पुनीत आश्रम की अनिर्वचनीय विशाल विभूति का अवलोकन करने से प्रसन्न आत्मा वाले राम ने हे राजन् ! अपने पालित अकृत व्रण के सहित मन्दगति से उस आश्रम में प्रवेश किया था ।८। जैसे ही राम ने भीतर अपना पदार्पण किया था वैसे ही उनका दर्शन करके वहाँ पर स्थित द्विजों के बालकों ने जय-जयकार और नमस्कार की ध्वनियों को प्रोच्चारण किया था और विप्रों के द्वारा भार्गवेन्द्र राम का बड़ा ही अधिक सम्मान-सत्कार किया गया था । इस रीति से अपने स्वागत-समादर को देखते हुए राम को परमाधिक हर्ष हुआ था ।६। उस आश्रम के