संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३५८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
का प्रक्षेप कर रहे थे जिस जल से सारी भूमि आविल हो गई थी अर्थात् भीगकर मटमैले रङ्ग की हो रही थी ।६। जहाँ पर अध्ययन शील बटु ब्रह्म-चारियों के द्वारा नित्य ही वेदों-शास्त्रों और संहिताओं का अभ्यास किया जाता था । ये सभी छात्र परमाधिक हर्ष से समन्वित तथा ब्रह्मचर्य व्रत में समास्थित रहा करते थे ।७।
अथ रामः प्रसन्नात्मा पश्यन्नाश्रमसंपदम् । प्रविवेश शनै राजन्नकृतव्रणसंयुतः ॥८ जयशब्दं नमः शब्दं प्रोच्चरद्भिद्विजात्मजैः । द्विजैश्च सत्कृतो रामः परं हर्षमुपागतः ॥६ आश्रमाभ्यंतरे तत्र संप्रविश्य निजं गृहम् । ददर्श पितरं रामो जमदग्निं तपोनिधिम् ॥१० साक्षाद्भृगुमित्रासीनं निग्रहानुग्रहक्षमम् । पपात चरणोपान्ते ह्यष्टांगालिंगितावनिः ॥११ रामोऽहं तव दासोऽस्मि प्रोच्चरन्निति भूपते । जग्राह चरणौ चापि विधिवत्सज्जनाग्रणीः ॥१२ अथ मातुश्च चरणावभिवाद्य कृतांजलिः । उवाच प्रणतो वाक्यं तयोः संहर्षकारणम् ॥१३ राम उवाच- पितस्तव प्रभावेण तपसोऽतिदुरासदः । कार्त्तवीर्यो हतो युद्धे सपुत्रबलवाहनः ॥१४
इसके अनन्तर उस परम पुनीत आश्रम की अनिर्वचनीय विशाल विभूति का अवलोकन करने से प्रसन्न आत्मा वाले राम ने हे राजन् ! अपने पालित अकृत व्रण के सहित मन्दगति से उस आश्रम में प्रवेश किया था ।८। जैसे ही राम ने भीतर अपना पदार्पण किया था वैसे ही उनका दर्शन करके वहाँ पर स्थित द्विजों के बालकों ने जय-जयकार और नमस्कार की ध्वनियों को प्रोच्चारण किया था और विप्रों के द्वारा भार्गवेन्द्र राम का बड़ा ही अधिक सम्मान-सत्कार किया गया था । इस रीति से अपने स्वागत-समादर को देखते हुए राम को परमाधिक हर्ष हुआ था ।६। उस आश्रम के
सगरोपाख्यान (१) ] [ ३५६
अन्दर अपने गृह में जब राम ने प्रवेश किया था तो वहाँ पर परशुराम जी ने तपस्या के परम निधि अपने पिताश्री जमदग्नि महामुनि का दर्शन किया था।१०। वे जमदग्नि मुनि साक्षात् अपने पूर्व पुरुष भृगु मुनि के समान वहाँ पर विराजमान थे जो अपने तपोबल से विग्रह और अनुग्रह करने की विशाल सामर्थ्य धारण करने वाले थे। उनके समीप में पहुँचकर राम ने उनके चरण कमलों के निकट में अपने आठों अङ्गों से भूमि का आलिङ्गन करते हुए गिर गये थे अर्थात् भूमि पड़कर साष्टाङ्ग प्रणाम किया था।११। हे भूपते ! परशुराम ने प्रणिपात करते हुए—मैं आपका दासानुदास राम हूँ—आपकी सेवा में मेरा सादर प्रणाम निवेदित है—ऐसा मुख से उच्चारण करते हुए उस सज्जनों में प्रमुख राम ने प्रणाम करने की विधि से साथ पिताश्री के दोनों चरणों का ग्रहण किया था।१२। इसके अनन्तर उन्होंने अपनी माता श्री के चरणों में करबद्ध होते हुए अभिवादन किया था। फिर परम प्रणत होकर उन दोनों माता-पिता के अतीव हर्ष का कारण स्वरूप वाक्य कहा था।१३। राम ने कहा—हे पिताजी, आपके परम दुरासद तप के प्रभाव से ही मैंने बड़े बलवान कार्त्तवीर्य राजा का पुत्रों-सैनिकों और वाहनों के सहित हनन कर दिया है। इस निवेदन का तात्पर्य यही है कि उस इतने बलशाली शत्रू के निपातन करने में मेरा पुरुषार्थ कुछ भी नहीं है यह सब कुछ आपके ही तप का प्रभाव है जिस से मेरे द्वारा वह दुष्ट मारा गया है।१४।
यस्तेऽपराधं कृतवान्दुष्टमंत्रिप्रचोदितः ।
तस्य दण्डो मया दत्तः प्रसह्य मुनिपुंगव ॥१५॥
भवन्तं तु नमस्कृत्य गतोऽहं ब्रह्मणोऽन्तिकम् ।
तं नमस्कृत्य विधिवत्स्वकार्यं प्रत्यवेदयम् ॥१६॥
स मामुवाच भगवाञ्छ्रुत्वा वृत्तांतमादितः ।
व्रज स्वकार्यसिद्धयर्थं शिवलोकं सनातनम् ॥१७॥
श्रुत्वाऽहं तद्वचस्तात नमस्कृत्य पितामहम् ।
गतवाञ्छिवलोकं वै हरदर्शनकांक्षया ॥१८॥
प्रविश्य तत्र भगवन्नुमया सहितः शिवः ।
नमस्कृतो मया देवो वांछितार्थप्रदायकः ॥१९॥
३६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
तदग्रे निखिलः स्वीयो वृत्तांतो विनिवेदितः । मया समाहितधिया स सर्वं श्रुतवानपि ॥२० श्रुत्वा विचार्य तत्सर्वं ददौ मह्यं कृपान्वितः । त्रैलोक्यविजयं नाम कवचं सर्वसिद्धिदम् ॥२१
यह वही अधम राजा था। जिसने अपने परम दुष्ट मन्त्री की प्रेरणा से प्रेरित होकर आपका महान् अपराध किया था। उस अपराध का दण्ड मेरे द्वारा उसको दे दिया गया है। हे मुनियों में परम श्रेष्ठ ! मैंने बलपूर्वक उसको दण्डित किया है। मैंने जिस रीति से अब तक जो कुछ भी किया है उसका पूर्ण विवरण क्रमानुसार मैं आपकी सन्निधि में निवेदित करता हूँ ।१५। मैंने आपको नमस्कार करके सर्वप्रथम ब्रह्माजी के समीप में गमन किया था क्योंकि समस्त सृष्टि ब्रह्मा जी के ही द्वारा हुई हैं। अतः उनको उसके निपातन से कुछ बुरा प्रतीत न हो, उनकी आज्ञा प्राप्त करना न्यायोचित एवं आवश्यक था। मैंने वहाँ जाकर उनको विधि के साथ प्रणिपात किया था और अपना सङ्कल्पित कार्य उनसे निवेदित कर दिया था ।१६। ब्रह्माजी ने आरम्भ से लेकर सम्पूर्ण वृत्तान्त सुना था और मुझसे कहा था। समस्त क्षत्रियगण भगवान् शिव के परम भक्त हैं अतः अपने कार्य की सिद्धि के लिए सनातन शिवलोक में जाना चाहिए ।१७। हे तात ! पितामह के इस वचन का श्रवण करके ब्रह्माजी को नमस्कार करके भगवान् शिव के दर्शन की आकाङ्क्षा से फिर मैं शिवजी के लोक में गया था ।१८। हे भगवन् ! यहां पर शिव लोक में प्रवेश करके उमा देवी के सहित भगवान् शिव को नमस्कार किया था। भगवान् शिव तो ऐसे देव हैं जो सबके लिए वाञ्छित अर्थ का प्रदान कर दिया करते हैं ।१९। उन प्रभु के सामने मैंने अपना पूरा वृत्तान्त आवेदित कर दिया था। जो भी उनकी सेवा में निवेदित किया था उस सबको उन्होंने परम समाहित बुद्धि से उस सबका श्रवण भी किया था। उस सम्पूर्ण वृत्तान्त का श्रवण करके उन्होंने एक क्षण तक विचार किया था और फिर परमाधिक कृपा से समन्वित होकर समस्त सिद्धियों के देने वाले त्रैलोक्य विजय नाम वाला कवच मुझे उन्होंने प्रदान किया था ।२०-२१।
तल्लब्ध्वा तं नमस्कृत्य पुष्करं समुपागतः । तत्राहं साधयित्वा तु कवचं हृष्टमानसः ॥२२
सगरोपाख्यान (१) ] [ ३६१
कार्त्तवीर्यं निहत्याजौ शिवलोकं पुनर्गतः । तत्र तौ तु मया दृष्टौ द्वारे स्कन्दविनायकौ ॥२३ तौ नमस्कृत्य धर्मज्ञ प्रवेष्टुं चोद्यतोऽभवम् । स मामवेक्ष्य गणपो विशन्तं त्वरयान्वितम् ॥२४ वारयामास सहसा नाद्यावसर इत्यथ । मम तेन पितस्तत्र वाग्युद्धं हस्तकर्षणम् ॥२५ सञ्जातपरशुक्षेममतोऽभूद्भृगुनन्दन । तज्ज्ञात्वा समुद्गृह्य मामधश्चोर्ध्वमेव च ॥२६ करेण भ्रामयामास पुनश्चानीतवांस्ततः । तं दृष्ट्वातिक्रुधा क्षिप्तः कुठारो हि मया ततः ॥२७ दंतो निपतितस्तस्य ततो देव उपागतः । पार्वती तत्र रुष्टाऽभूत्तदा कृष्णः समागतः ॥२८
उस कवच की सिद्धि पुष्कर तीर्थ में बतलायी थी अतएव मैंने उस को प्राप्तकर भगवान् शङ्कर को प्रणाम किया और मैं फिर उसकी सिद्धि के लिये पुष्कर में समागत हो गया था। वहाँ पर मैंने उस कवच की सिद्धि प्राप्त कर ली थी । और उसे साधित करके मेरे मन में बड़ी प्रसन्नता हुई थी ।२२। फिर संग्राम भूमि में कार्त्तवीर्य का निपातन करके मैं पुनः शिव-लोक में गया था कि अपनी विजय का सम्वाद प्रभु को सुनादूँ । वहाँ पर मैंने द्वारपर स्कन्द और विनायक को समवस्थित देखा ।२३। हे धर्म के ज्ञान वाले भगवान् ! मैंने उन दोनों की सेवा में प्रणाम किया और मैं अन्दर प्रवेश करने के लिए समुद्यत हो गया था । उस समय में बड़ी शीघ्रता से युक्त होकर अन्दर प्रविष्ट होने वाले मुझ को देखकर गणेश जी ने रोक दिया था ।२४। उन्होंने मुझ से यही कह मुझको अन्दर प्रवेश करने से सहसा रोका था कि आज अन्दर गमन करने का अवसर नहीं है । हे पिताजी ! उस समय में मेरा उन गणेश जी के साथ पहिले तो वाग्युद्ध अर्थात् अच्छी तरह से कहा सुनी हुई थी और फिर हाथों का कर्षण अर्थात् मेरा हाथ पकड़कर खींचातानी हुई थी ।२५। उस समय में गणेश जी ने यह देखा कि भृगु नन्दन अपने परशु का प्रहार करने वाला हो रहा था । उन्होने यह जानकर मुझको पकड़ लिया था और ऊपर उठाकर नीचे की ओर कर दिया था ।२६।
३६२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
गणेश जी ने अपने हाथ से उठाकर अच्छी तरह से ऊपर के अनेक लोकों में घुमाया था और फिर नीचे के लोकों में घुमाकर वहीं पर मुझे लाकर रख दिया था। फिर मुझको बड़ा भारी क्रोध आ गया था और मैंने अपना कुठार उनके ऊपर प्रक्षिप्त कर दिया था ।२७। उस प्रहार से गणेशजी का एक बांया दांत टूटकर भूमि पर गिर गया था। उसी समय में महादेवजी वहाँ पर आ गये थे। उस समय में पार्वतीजी ने अपने पुत्र के दाँत के टूट जाने की दुर्घटना देखी तो वे बहुत रुष्ट हो गयी थी। उसी समय में भगवान् श्री कृष्ण भी आ गये थे ।२८।
राधया सहितस्तेन सानुनीता वरं ददौ ।
मह्यं कृष्णो जगामाथ तेन मैत्रीं विधाय च ॥२९
ततः प्रणम्य देवेशौ पार्वतीपरमेश्वरौ ।
आगतस्तव सान्निध्यमकृतव्रणसंयुतः ॥३०
वसिष्ठ उवाच-
इत्युक्तवा भार्गवो रामो विरराम च भूपते ।
जमदग्निरुवाथेदं रामं शत्रुनिबर्हणम् ॥३१
जमदग्निरुवाच-
क्षत्रहत्याभिभूतस्त्वं तावद्दोषोपशांतये ।
प्रायश्चित्तं ततस्तावद्यथावत्कर्तुमर्हसि ॥३२
इत्युक्तः प्राह पितरं रामो मतिमतां वरः ।
प्रायश्चित्तं तु तद्योग्यं त्वं मे निर्देष्टुमर्हसि ॥३३
जमदग्निरुवाच-
व्रतैश्च नियमैश्चैव कर्षयन्देहमात्मनः ।
शाकमूलफलाहारो द्वादशाब्दं तपश्चर ॥३४
वसिष्ठ उवाच-
इत्युक्तः प्रणिपत्यैनं मातरं च भृगूद्वहः ।
प्रययौ तपसे राजन्नकृतव्रणसंयुतः ॥३५
सं गत्वा पर्वत वरं महेंद्रमरिकर्षणः ।
सगरोपाख्यान (१) ] [ ३६३
कृत्वाऽऽश्रमपदं तस्मिंस्तपस्तेपे सुदुश्चरम् ॥३६ व्रतैस्तपोभिर्नियमैर्देवताराधनैरपि । निन्ये वर्षाणि कति चिद्रामस्तस्मिन्महात्मनाः ॥३७
भगवान् श्रीकृष्ण श्रीराधा जी को साथ में लेकर ही पधारे थे। उनके द्वारा पार्वतीजी का अनुभव किया था और पार्वती जगज्जननी ने मुझे वरदान प्रदान किया था। और भगवान् कृष्ण ने हम दोनों की मित्रता कराकर प्रणाम किया था और वहाँ से वे चले गये थे ।२६। इसके अनन्तर देवेश्वर पार्वती और परमेश्वर दोनोंको सादर प्रणिपात करके मैं अकृत व्रण के ही साथ में उनके समीप में उपस्थित हो गया था ।३०। वसिष्ठजी ने कहा—हे भूपते ! इतना ही सम्पूर्ण अपना वृत्तान्त कहकर फिर परशुराम चुप हो गये थे। इसके अनन्तर महामुनि जमदग्नि ने उन शत्रुओं के विनाश कर देने वाले राम से बोले ।३१। जमदग्नि ने कहा—हे राम ! आप तो अब समस्त क्षत्रियों की हत्या से अभिभूत हो गये हैं अर्थात् क्षत्रियों के वध की हत्या आपके ऊपर छायी हुई है। अतएव अब आप उस की हुई हत्या के निवारण करने के लिये यथाविधि प्रायश्चित्त करने के योग्य हैं अर्थात् उसके शोधन के वास्ते शास्त्रोक्त प्रायश्चित्त करना ही चाहिए ।३२। इस तरह से कथन करने वाले अपने पिताजी से मतिमानों में श्रेष्ठ राम ने यह प्रार्थना की थी कि उस विशाल वध के शोधन के योग्य जो भी कोई प्रायश्चित्त हो उसको आप ही मुझे निर्देश करने के लिए परम योग्य हैं ।३३। महामुनीन्द्र जमदग्नि जी ने कहा—बहुत-से व्रतों और नियमों के द्वारा अपने शरीर का कर्षण करते हुए केवल वन्य शाकों और मूलों का आहार करने वाले होकर बारह वर्षों तक निरन्तर तपश्चर्या का समाचरण करो ।३४। जब इस प्रकार से आत्म-शोधन के लिये पिताश्री के द्वारा कहा गया था तो परशुराम जी ने अपने माता-पिता के चरणों में प्रणिपात किया और अकृतव्रण को अपने साथ में लेकर हे राजन् ! वह तपस्या करने के लिये वहाँ से चले गये थे ।३५। वे परशुराम जिन्होंने अपने समस्त शत्रुओं का विनाश करके पूर्णतया कर्षणकार दिया था वे अब अपने देह की शुद्धि के लिए कर्षण करने के वास्ते महेन्द्र नामक पर्वत पर गये थे। उस गिरि पर अपना एक आश्रम बनाकर उन्होंने वहाँ पर परम दुश्चर तप किया था ।३६। वहाँ पर राम ने अनेक व्रत-तप-नियम और देवता के समाराधन के द्वारा उस आश्रम में महान् मन वाले भार्गव ने कुछ वर्ष व्यतीत कर दिये थे अर्थात् ऐसे ही अनेक साधनों को करके बहुत से वर्ष बिता दिये थे ।३७।
३६४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
सगरोपाख्यान (२)
वसिष्ठ उवाच— ततः कदाचिद्विपिने चतुरंगबलान्वितः । मृगयामगमच्छूरः शूरसेनादिभिः सह ॥१ ते प्रविश्य महारण्यं हत्वा बहुविधान्मृगान् । जग्मुस्तृषार्त्ता मध्याह्ने सरितं नर्मदामनु ॥२ तत्र स्नात्वा च पीत्वा च वारि नद्या गतश्रमाः । गच्छंतो ददृशुर्मार्गे जमदग्नेरथाश्रमम् ॥३ दृष्ट्वाश्रमपदं रम्यं मुनीनागच्छतः पथि । कस्येदमिति पप्रच्छुर्भाविकर्मप्रचोदिताः ॥४ ते प्रोचुरतिशांतात्मा जमदग्नेर्महातपाः । वसंत्यस्मिन्सुतो यस्य रामः शस्त्रभृतां वरः ॥५ तच्छ्रुत्वा भीरभूत्तेषां रामनामानुकीर्तनात् । क्रोधं प्रसङ्ख्यानृशंस्य पूर्ववैरमनुस्मरन् ॥६ अथ ते प्रोचुरन्योन्यं पितृहंतुर्वधात्पितुः । वैर निर्यातनं किं तु करिष्यामो दिशाधुना ॥७
श्री वसिष्ठ जी ने कहा—इसके उपरान्त यह हुआ था कि किसी समय में शूर शूरसेन आदि के साथ चतुरङ्गिणी सेना लेकर उसी वन में मृगया (शिकार) के लिये गया था। जिसमें पैदल-अश्व-हाथी और रथ ये सभी चारों साधन होते हैं वही चतुरङ्गिणी सेना कही जाती है ।१। उन्होंने उस महान् विशाल अरण्य में प्रवेश करके बहुत-से मृगों का हनन किया था । जब मध्याह्न काल हो गया तो वे सब पिपासा बेचैन होकर नर्मदा नदी की ओर पहुँच गये थे ।२। वहाँ पर उनने जल मान किया और स्नान किया था और अपने श्रम को दूर किया था। जब वहाँ से वे जा रहे थे तो भृगुवर जमदग्नि मुनि का आश्रम उनने देखा था ।३। वह आश्रम का स्थान बहुत ही सुरम्य था। उसका अवलोकन करके उन्होंने मार्ग में आगमन करते हुए मुनिगणों से पूछा था कि यह किसका ऐसा परम सुन्दर आश्रम है। उस समय में हानहार ऐसा ही था और भविष्य में होने वाले कर्मों से वे प्रेरित
सगरोपाख्यान (२) ] [ ३६५
हो गये थे ।४। उन मुनिगणों ने उस नृप से कहा था कि इस आश्रम में अत्यन्त ही प्रशान्त आत्मा वाले और महान् तपस्वी जमदग्नि मुनि निवास किया करते हैं जिनके पुत्र शस्त्र धारियों में परम श्रेष्ठ परशुराम हैं ।५। यह श्रवण करके परशुराम जी के नाम के अनुकीर्त्तन से पहिले तो सुनने के साथ ही उनके हृदय में बड़ा भारी भय उत्पन्न हो गया था किन्तु फिर क्रोध को सहन करके उनको परशुराम की बड़ी भारी क्रूरता के साथ किये हुए पूर्व वैर का अनुस्मरण हो गया था ।६। इसके अनन्तर उन्होंने एक दूसरे से आपस में कहा था कि इन्होंने तो हमारे पिता का वध किया था तो ऐसे पिता के हनन करने वाले के पिता का अब इस समय में वध करके हम सब इस रीति से अपने वैर का बदला अवश्य निकालेंगे ।७।
इत्युक्त्वा खड्गहस्तास्ते संप्रविश्य तदाश्रमम् । प्रजघ्निरे प्रयातेषु मुनिवीरेषु सर्वतः ॥८ तं हत्वाऽस्य शिरो हृत्वा निषादा इव निर्दयाः । प्रययुस्ते दुरात्मानः सबलाः स्वपुरीं प्रति ॥९ पुत्रास्तस्य महात्मानो दृष्ट्वा स्वपितरं हतम् । परिवार्य महाराज रुरुदुः शोककर्शिताः ॥१० भर्त्तारं निहतं भूमौ पतितं वीक्ष्य रेणुका । पपात मूर्च्छिता सद्यो लतेवाशनिताडिता ॥११ सा स्वचेतसि संमूर्च्छद्य शोकपावकदीपितान् । दूरप्रनष्टसंज्ञेव सद्यः प्राणैर्व्ययुज्यत ॥१२ अनालपंत्यां तस्यां तु संज्ञां याता हि ते पुनः । न्यपतन्मूर्च्छिता भूमौ निमग्नाः शोकसागरे ॥१३ ततस्तपोधना येऽन्ये तत्तपोवनवासिनः । समेत्याश्वासयामासुस्तुल्यदुःखाः सुतान्मुने ॥१४
इतना कहकर वे सब करों में खड्ग लेकर उस आश्रम के अन्दर प्रविष्ट हो गये थे और सभी ओर से गमनागमन करने वाले मुनियों का हनन किया था ।८। फिर उनने जमदग्नि मुनि का हनन कर दिया था और दया से रहित निषादों के ही समान उस जमदग्नि का मस्तक काटकर हरण कर लिया था । वे महान् दुष्ट आत्मा वाले अपनी सेना के सहित
३६६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
अपनी नगरी की ओर चले गये थे ।९। हे महाराज ! उस महामुनि जमदग्नि के जो अन्य पुत्र थे वे परम साधु प्रकृति से सुसम्पन्न महान् आत्मा वाले तापस ही थे जब उन्होंने देखा कि उनके पिता का बड़ी निर्दयता से हनन कर दिया गया है तो उस मृत पिता के शव के चारों बैठकर महान शोक से उत्पीड़ित होते हुए रुदन करने लग गये थे ।१०। अपने प्राणनाथ स्वामी को निहत और भूमि पर पड़े हुए देखकर मुनि पत्नी रेणुका देवी तुरन्त ही भूमि पर पछाड़ खाकर वज्राघात से गिरी हुई कोमल लता के ही समान मूर्च्छित होकर गिर गयी थी ।११। उसके मन में मूर्च्छा आ गयी थी और उसको अपने देह का अनुसन्धान नहीं रहा था । वह शोक की अग्नि से दीपित हो गयी थी । वह बहुत अधिक संज्ञा से हीन के समान ही होकर तुरन्त ही अपने प्रिय प्राणों से वियुक्त हो गयी थी अर्थात् उसके प्राण पखेरू तुरन्त ही उड़ गए थे ।१२। जब उसके पुत्रों ने देखा कि वह कुछ भी नहीं बोल रही है तो फिर उनको होश आया था और अपनी माता का मृत शरीर देखकर वे सभी शोक के अगाध सागर में निमग्न होते हुए मूर्च्छित होकर भूमि में पछाड़ खाकर गिर गये थे ।१३। जब ऐसा शोक से वहाँ बड़ा हाहाकार मच गया तो जो अन्य तप के ही धन वाले तपस्वी गण थे जो कि उसी तपोवन में निवास करने वाले थे हे मुने ! उन सबको भी उन मुनि पति-पत्नियों के वियोग से समान ही दुःख हो रहा था और वे सब वहीं पर इकट्ठे हो गये थे तथा रेणुका के पुत्रों को समाश्वासन दिया था ।१४।
सान्त्व्यमाना मुनिगणैर्जामदग्न्या यथाविधि ।
आधुक्षुर्वचसा तेषामग्नौ पित्रोः कलेवरे ॥१५
चक्रुरेव तदूर्ध्वं वै यत्कर्त्तव्यमनंतरम् ।
पित्रोर्मरणदुःखेन पीड्यमाना दिवानिशम् ॥१६
तत काले गते रामः समानां द्वादशावधौ ।
निवृत्तस्तपसः सख्या सहागादाश्रमं पितुः ॥१७
समस्त समागत मुनिगणों के द्वारा अब अच्छी तरह से उन पुत्रों को सान्त्वना दी गयी थी तो जमदग्नि के उन मुनियों के कहने से अपने माता-पिता के शवों का कर्मकाण्ड के अनुसार अग्नि में दाह कर दिया था ।१५। अन्त्येष्टि के अनन्तर फिर जो भी करने के योग्य ऊर्ध्व क्रिया कलाप था उस
क्षत्रिय वंश नाश प्रतिज्ञा ] [ ३६७
सबको भी पूर्णतया सम्पन्न किया था । वे सभी जमदग्नि के आत्मज अपने दोनों ही माता-पिता के मरण के असह्य दुःख से रात दिन पीड़ित होते हुए रहा करते थे ।१६। इसके अनन्तर कुछ काल के व्यतीत हो जाने पर जबकि बारह वर्षों की अवधि पूर्ण हो गयी थी तो अपनी तपश्चर्या से निवृत्त होकर राम अकृत व्रण के साथ अपने पिता श्री में आये थे ।१७।
क्षत्रिय वंश नाश प्रतिज्ञा
वसिष्ठ उवाच—
स गच्छन्पथि शुश्राव मुनिभ्यस्तत्त्वमादितः ।
राजपुत्रव्यवसितं पित्रोः स्वर्गतिमेव च ॥१॥
पितुस्तु जीवहरणं शिरोहरणमेव च ।
तन्मृतेरेव मरणं श्रुत्वा मातुश्च केवलम् ॥२॥
विललाप महाबाहुर्दुःखशोकसमन्वितः ।
तमथाश्वासयामास तुल्यदुःखोऽकृतव्रणः ॥३॥
हेतुभिः शास्त्रनिर्दिष्टैर्वीर्यसामर्थ्यसूचकैः ।
युक्तिलौकिकदृष्टान्तैस्तच्छोकं संव्यशामयत् ॥४॥
सान्त्वितस्तेन मेधावी धृतिमालंब्य भार्गवः ।
प्रययौ सहितः सख्या भ्रातॄणां तु दिदृक्षया ॥५॥
स तान् दृष्ट्वाभिवाद्यैतान् भार्गवो दुःखकर्षितः ।
शोकामर्षयुतस्तैश्च सह तस्थौ दिनत्रयम् ॥६॥
ततोऽस्य सुमहान्क्रोधः स्मरतो निधनं पितुः ।
बभूव सहसा सर्वलोकसंहरणक्षमः ॥७॥
श्री महामुनीन्द्र वसिष्ठजी ने कहा—परशुराम ने मार्ग में गमन करते हुए मुनि मण्डल से आरम्भ से सब तत्त्व सुन लिया था अर्थात् वहाँ पर किस तरह से सब घटनाएं हुईं थीं यह श्रवण कर लिया था । उनको यह भी ज्ञात हो गया था कि उन महान दुष्ट राज पुत्रों ने यह कुचेष्टाएं की थीं और उनके द्वारा पिता की मृत्यु तथा शोक में माता का देहान्त हो गया है
३६८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
।१। अपने पिताजी के जीवन का हरण और उनके शिर को काटकर ले जाने का समाचार भी उन्होंने जानकर यह भी उनको ज्ञात हो गया था कि उनकी माताश्री का मरण पिताजी की मृत्यु हो जाने ही से शोकोद्रेक वश हो गयी थी ।२। वह महाबाहु को बड़ा भारी शोक और असह्य दुःख हुआ था । इससे वे राम बहुत अधिक विलाप करने लग गये थे । यद्यपि अकृत व्रण को भी परशुराम के ही समान दुःख हुआ था किन्तु फिर भी उसने राम को बहुत कुछ समाश्वासन दिया था ।३। वीर्य की सामर्थ्य के सूचक शास्त्रों में निविष्ट किये गए हेतुओं के द्वारा और युक्तियों से तथा लोक में होने वाले अनेक दृष्टान्तों के द्वारा परशुराम जी के उस महान शोक को अकृत व्रण ने शमित कर दिया था ।४। उस अकृत व्रण के द्वारा सान्त्वना दिए गए परशुराम ने धैर्य का अवलम्बन लिया था क्योंकि वह बहुत अधिक मेधावी थे । इसके अनन्तर परशुरामजी अपने सखा अकृत व्रण के साथ अपने भाइयों के देखने की इच्छा से अपने गृह की ओर चल दिये थे ।५। वहाँ पर भार्गव ने जाकर अभिवादन किया था और इन सबको परम दुःखित देखकर परशुरामजी को भी अत्यधिक दुःख हुआ था । उन सबके साथ में पुनः उस शोक का नवीनीकरण हो गया था और परम शोक में मग्न होकर वह वहाँ तीन दिन तक स्थित रहे थे ।६। इसके अनन्तर अपने पिता श्री के निधन का स्मरण करते हुए उनको महान क्रोध उत्पन्न हो गया था और तुरन्त ही वह सम्पूर्ण लोक के संहार कर देने में समर्थ हो गये थे ।७।
मातुरर्थे कृतां पूर्वं प्रतिज्ञां सत्यसंगरः ।
दृढीचकार हृदये सर्वक्षत्रवधोद्यतः ॥८
क्षत्रवंश्यानशेषेण हत्वा तद्दे हलोहितैः ।
करिष्ये तर्पणं पित्रोरिति निश्चित्य भार्गवः ॥९
भ्रातॄणां चैव सर्वेषामाख्यायात्मसमीहितम् ।
प्रययौ तदनुज्ञातः कृत्वां संस्थां पितुः क्रियाम् ॥१०
अकृतव्रणसंयुक्तः प्राप्य माहिष्मतीं ततः ।
तद्बाह्योपवने स्थित्वा सस्मार स महोदरम् ॥११
स तस्मै रथचापाद्यं सहसा श्वसमन्वितम् ।
प्रेषयामास रामाय सर्वसंहननानि च ॥१२
क्षत्रिय वंश नाश प्रतिज्ञा ] [ ३६९
रामोऽपि रथमारुह्य सन्नद्धः सशरं धनुः । गृहीत्वापूरयच्छंखं रुद्रदत्तममित्रजित् ॥१३ ज्याघोषं च चकारोच्चै रोदसी कंपयन्निव । सहसाहोथ सारथ्यं चक्रे सारथिनां वरः ॥१४
माता रेणुका ने अपने पति के वियोग में विलाप करते हुए इक्कीस बार अपने वक्षःस्थल को पीटा था अतः परशुरामजी ने उसी समय में यह प्रतिज्ञा की थी कि मेरे पिता को क्षत्रिय जातीय नृप ने निहत किया है इसलिए मैं भी इक्कीस बार भूमण्डल को संहार करके क्षत्रियों से रहित कर दूँगा—माता के लिए की हुई इस प्रतिज्ञा को सत्यवादी दिया था। ८। ने समस्त क्षत्रियों के वध करने के लिये समुद्यत होकर हृदय में सुदृढ़ कर भार्गवेन्द्र ने ऐसा निश्चय कर लिया था कि क्षत्रियों के वंश में समुत्पन्न सबका निहनन करके उनके शरीरों के रुधिर से मैं अपने माता-पिता का तर्पण करूँगा ।९। अपने समस्त भाइयों से यह अपना समीहित सत्य संकल्प कहकर अपने पिताजी की संस्थित क्रिया को पूर्ण करके भाइयों की आज्ञा प्राप्त करके परशुराम चले गये थे ।१०। फिर अकृतव्रण को साथ में लेकर माहिष्मती नगरी में स्थित होकर उन्होंने महोदर (श्रीगणेश जी) का स्मरण किया था ।११। उन्होंने तुरन्त ही राम के लिए रथ-चाप आदि सभी आयुधों तथा अश्वों आदि को भेज दिया था ।१२। फिर परशुराम प्रभु भी उस रथ पर समारूढ़ होकर सन्नद्ध हो गये थे और शत्रुओं पर विजय पाने वाले ने शरके सहित धनुष का ग्रहण कर लिया था तथा भगवान रुद्र के द्वारा प्रदत्त शंख की ध्वनि करके उससे सम्पूर्ण भाग को पूरित कर दिया था ।१३। अपने धनुष की प्रत्यंचा की टंकार से अन्तरिक्ष और भूमण्डल को प्रकम्पित करते हुए बड़ा ही उच्च घोष किया था । सारथियों में परम श्रेष्ठ सहसाहु ने उनके रथ का सारथि होने का कार्य ग्रहण किया था ।१४।
रथज्याशंखनादैस्तु वधात्पित्रोर्मषिणः । तस्याभून्नगरी सर्वा संक्षुब्धाश्च नरद्विपाः ॥१५ रामं त्वागतमाज्ञाय सर्वक्षत्रकुलांतकम् । संक्षुब्धाश्चक्रुरुद्योगं संग्रामाय नृपात्मजाः ॥१६ अथ पंचरथाः शूराः शूरसेनादयो नृप ।
३७० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
रामेण योद्धुं सहिता राजभिश्चक्रुरुद्यमम् ॥१७ चतुरङ्गबलोपेतास्ततस्ते क्षत्रियर्षभाः । राममासादयामासुः पतंगा इव पावकम् ॥१८ निवार्य तानापतितो रथेनैकेन भार्गवः । युयुधे पार्थिवैः सर्वैः समरेऽमितविक्रमः ॥१९ ततः पुनरभूद्युद्धं रामस्य सह राजभिः । जघान यत्र संक्रुद्धो राज्ञां शतमुदारधीः ॥२० ततः स सूरसेनादीन्हत्वा सबलवाहनान् । क्षणेन पातयामास क्षितौ क्षत्रियमंडलम् ॥२१
अपने माता और पिता दोनों के वध हो जाने से परशुरामजी को बड़ा भारी क्रोध हो गया था। जब परम क्रुद्ध भार्गव के रथ प्रत्यञ्चा और शंख के नाद हुए तो इनसे उस नृप की समस्त नगरी और नर तथा द्विप सभी अत्यन्त संक्षुब्ध हो गये थे। १५। उन नृप के पुत्रों ने जब यह समझ लिया था कि सब क्षत्रियों के कुलों का अन्त कर देने वाले परशुराम समा-गत हो गये हैं तो वे बहुत ही क्षुब्ध हुए थे और फिर उन्होंने राम के साथ संग्राम करने के लिए उद्योग किया था। १६। इसके अनन्तर हे नृप ! पञ्च-रथ शूरसेन प्रभृति शूरों ने अनेक अन्य राजाओं के साथ परशुरामजी युद्ध करने के लिए उद्यम किया था। १७। इसके उपरान्त वे श्रेष्ठ क्षत्रिय अपनी चतुरङ्गिणी सेनाओं से समन्वित हुए थे और सब राम के पास प्राप्त हो गये थे। जिस तरह पावक पर गिरने वाले पतङ्गों को अग्नि भस्मसात् करके निवारित कर दिया करता है उसी भाँति भार्गवेन्द्र ने अपने एक ही रथ के द्वारा उस पर संस्थित होकर अपने ऊपर चारों ओर से आक्रमण करके आपतन करने वालों को निवारित कर दिया था। अपरिमित बल-विक्रम से सुसम्पन्न राम ने समराङ्गण में उन सभी नृपों के साथ घोर युद्ध किया था। १८-१९। इसके अनन्तर फिर भार्गव का युद्ध राजाओं के साथ हुआ था और उस उदार बुद्धि वाले परशुराम ने उन सौ राजाओं का वध कर दिया था। २०। फिर शूरसेन आदि नृपों का सेना और वाहनों के सहित हनन करके एक ही क्षण में उस पूर्ण क्षत्रियों के मण्डल को भूमि पर गिरा दिया था। २१।
क्षत्रिय वंश नाश प्रतिज्ञा ] [ ३७१
ततस्ते भग्नसंकल्पा हतस्वबलवाहनाः ।
हतशिष्टा नृपतयो दुद्रुवुः सर्वतो दिशम् ॥२२
एवं विद्राव्य सैन्यानि हत्वा जित्वाथ संयुगे ।
जघान शतशो राज्ञः शूराञ्छरवराग्निना ॥२३
ततः क्रोधपरीतात्मा दग्धुकामोऽखिलां पुरीम् ।
उदैरयद्भार्गवोऽस्त्रं कालाग्निसदृशप्रभम् ॥२४
ज्वालाकवलिताशेषपुरप्राकारमालिनीम् ।
पुरीं सहस्त्यश्वनरां स ददाहास्त्रपावकः ॥२५
दह्यमानां पुरीं दृष्ट्वा प्राणत्राणपरायणः ।
जीवनाय जगामाशु वीतिहोत्रो भयातुरः ॥२६
अस्त्राग्निना पुरीं सर्वां दग्ध्वा हत्वा च शात्रवान् ।
प्राश्यानोऽखिलान् लोकान् साक्षात्काल इवांतकः ॥२७
अकृतव्रणसंयुक्तः सहसाहेन चान्वितः ।
जगाम रथघोषेण कंपयन्निव मेदिनीम् ॥२८
इसके अनन्तर वे समस्त नृप भग्न सङ्कल्प वाले हो गये थे और उनके सैनिक तथा सब वाहन हाथी घोड़े आदि नष्ट हो गये थे। जो भी नृप हनन करने से बच गये थे वे भय से भीत होकर सब दिशाओं की ओर इधर-उधर भाग गये ।२२। इस रीति से सम्पूर्ण सेना के सैनिकों को खदेड़ कर तथा हनन करके भार्गवेन्द्र ने युद्ध में विजय प्राप्त की थी और अपने वाणों की अग्नि के द्वारा सैकड़ों शूर नृपों का वध कर दिया था ।२३। फिर महान् क्रोध से भरी हुई आत्मा वाले परशुराम ने उस पुरी को दग्ध करने की इच्छा की थी तथा भार्गव ने कालाग्नि अपने अस्त्र को छोड़ दिया था ।२४। उस अस्त्र की अग्नि ने उस नगरी को जिसमें सभी हाथी-घोड़े और मनुष्य थे जला दिया था और वह पुरी अस्त्राग्नि के जल कर ज्वालाओं से उसके पुरप्राकार आदि की माला से कवलित हो गयी थी अर्थात् उस महान् प्रदीप्त अग्नि ने सबको स्वाहा कर दिया था और वहां पर कुछ भी शेष नहीं रहा था ।२५। उस समस्त पुरी को जलती हुई देखकर अपने प्राणों की रक्षा में तत्पर वीतिहोत्र भय से आतुर होकर वहाँ से जीवन के परित्राण
३७२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
करने के लिये शीघ्र ही चला गया था ।२६। अपनी अस्त्र की अग्नि से उस सम्पूर्ण नगरी को जलाकर तथा सब शत्रुओं का हनन करके उस समय में भार्गवेन्द्र राम समस्त लोकों का विनाश करते हुए साक्षात् अन्त कर देने वाले काल की ही भाँति हो गये थे ।२७। फिर अकृतव्रण के सहित और सहसाहु से समन्वित होकर अपने रथ के महान् घोष से सम्पूर्ण पृथ्वी को कम्पित करते हुए वहाँ से गये थे ।२८।
विनिघ्नन् क्षत्रियान्सर्वान् संशाम्य पृथिवीतले ।
महेंद्राद्रिं ययौ रामस्तपसे धृतमानसः ॥२६
तस्मिन्नष्टचतुष्कं च यावत्क्षत्रसमुद्गमम् ।
प्रत्येत्य भूयस्यद्धत्यै बद्धदीक्षो धृतव्रतः ॥३०
क्षत्रक्षेत्रेषु भूयश्च क्षत्रमुत्पादितं द्विजैः ।
निजघान पुनर्भू'मो राज्ञः शतसहस्रशः ॥३१
वर्षद्वयेन भूयोऽपि कृत्वा निःक्षत्रियां महीम् ।
षट्चतुष्टयवर्षान्तं तपस्तेपे पुनश्च सः ॥३२
भूयोऽपि राजन् संबुद्ध' क्षत्रमुत्पादितं द्विजैः ।
जघान भूमौ निःशेषं साक्षात्काल इवांतकः ॥३३
कालेन तावता भूयः समुत्पन्नं नृपान्वयम् ।
निघ्नंश्चचार पृथिवीं वर्षद्वयमनारतम् ॥३४
अलं रामेण राजेंद्र स्मरता निधनं पितुः ।
त्रि सप्तकृत्वः पृथिवी तेन निःक्षत्रिया कृता ॥३५
इस पृथ्वी तल पर क्षत्रियों का निहनन करते हुए पूर्णतया इस भूमि पर शान्ति स्थापित करके फिर भार्गव राम तपश्चर्या करने के लिये मन में निश्चय करके महेन्द्र पर्वत पर वहाँ से चले गये थे ।२६। उसमें जितना भी क्षत्रियों का समुद्रय था बारह थे उनके प्रति भी आकर फिर उनके हनन करने के वास्ते व्रत धारण करने वाले परशुराम बद्ध दीक्षा वाले हुए थे ।३०। और द्विजों ने क्षत्रियों के क्षेत्रों में फिर क्षत्रियों का उत्पादन कर दिया था। जब परशुरामजी को क्षत्रियों की उत्पत्ति का ज्ञान हुआ था कि अभी और भी क्षत्रिय समुत्पन्न हो गये हैं तो पुनः उन्होंने सैकड़ों और
वसिष्ठ गमन वर्णन ] [ ३७३
सहस्रों क्षत्रिय नृपों का भूमि पर हनन कर दिया था ।३१। फिर भी दो वर्षों में इस भूमि को क्षत्रियों का वध करके क्षत्रियों से रहित बना दिया था और फिर दश वर्षों के लम्बे समय तक तपस्या का तपन किया था ।३२। हे राजन् ! जब फिर भी उनको यह ज्ञान हुआ था कि ब्राह्मणों ने क्षत्रियों को अपने तपोबल से समुत्पन्न कर दिया है तो फिर भी उन्होंने साक्षात् विनाश करने वाले काल के ही समान इस भूमण्डल में क्षत्रियों को मार-काटकर समाप्त कर दिया था ।३३। उतने में समय में फिर क्षत्रिय लोग समुत्पन्न हो गये थे तब दो वर्ष पर्यन्त निरन्तर पृथ्वी पर उन सबका हनन करते भार्गवेन्द्र ने किया था ।३४। हे राजेन्द्र ! अपने पिताश्री के क्षत्रियों के द्वारा निधन का स्मरण करते हुए पूर्ण रूप से उन्होंने इक्कीस बार इस भूमि को इसी रीति से क्षत्रियों से रहित कर दिया था । उनकी माता रेणुका ने अपने पति के वियोग के शोक में रुदन करते हुए इक्कीस बार अपने वक्षःस्थल को करों से प्रताड़ित किया था उतनी ही बार परशुरामजी ने इस भूमण्डल क्षत्रियों से रहित कर दिया था ।३५।
॥ वसिष्ठ गमन वर्णन ॥
वसिष्ठ उवाच-
ततो मूर्द्धाभिषिक्तानां राज्ञाममिततेजसाम् ।
षट्सहस्रद्वयं रामो जीवग्राहं गृहीतवान् ॥१
ततो राजसहस्राणि गृहीत्वा मुनिभिः सह ।
स जगाम महातेजाः कुरुक्षेत्रं तपोमयम् ॥२
सरसां पंचकं तत्र खानयित्वा भृगूद्वहः ।
सुखावगाहतीर्थानि तानि चक्रे समंततः ॥३
जघान तत्र वै राज्ञः शरीरप्रभवासृजा ।
सरांसि तानि वै पंच पूरयामास भार्गवः ॥४
स्नात्वा तेषु यथान्यायं जामदग्न्यः प्रतापवान् ।
पितॄन्संतर्पयामास यथाशास्त्रमतंद्रितः ॥५
३७४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
पितुः प्रेतस्य राजेंद्र श्राद्धादिकमशेषतः ।
ब्राह्मणैः सह मातुश्च तत्र चक्रे यथोदितम् ॥६
एवं तीर्णप्रतीकः स कुरुक्षेत्रे तपोमये ।
उवासातंद्रितः सम्यक् पितृपूजापरायणः ॥७
श्री वसिष्ठ जी ने कहा—इसके अनन्तर अपरिमित तेज वाले मूर्द्धाभिषिक्त अर्थात् सर्वं शिरोमणि बारह सहस्र राजाओं का परशुरामजी ने जीवनों का ग्रहण किया था अर्थात् मार गिराया था ।१। इसके अनन्तर एक सहस्र राजाओं को पकड़ कर मुनिगणों के साथ महान् तेजस्वी वे परशुराम जी तपोमय कुरुक्षेत्र में गमन कर गये थे ।२। भृगूद्वह ने वहाँ पर पाँच सरोवर खुदवा कर उनको सब ओर परम सुख का आवाहन करने वाले तीर्थ कर दिया था ।३। वहीं पर उन सहस्र नृपों का हनन किया था और उनके शरीरों से निकले हुए रुधिर से भार्गव ने उन पाँचों सरोवरों को भर दिया था ।४। परमाधिक प्रतापी जमदग्नि के पुत्र ने न्यायानुसार उन सरोवरों में स्नान किया था और तन्द्रा से रहित होकर शास्त्रोक्त विधान से अपने पितरों को तृप्त किया था अर्थात् पितृगणों के लिए तर्पण किया था ।५। हे राजेन्द्र ! वहीं पर परशुरामजी ने जैसा भी शास्त्र में कहा गया है वही ब्राह्मणों के साथ रहकर अपने मृत पिता का और माता का श्राद्ध आदि पूर्ण रूप से सुसम्पन्न किया था ।६। इस रीति से पितृऋण से उत्तीर्ण होने वाले उन्होंने उस तप से परिपूर्ण कुरुक्षेत्र में पितृगणों की अर्चना में तत्पर होते हुए अतन्द्रित रहकर भली भाँति निवास किया था ।७।
ततः प्रभृत्यभूद्राजंस्तीर्थानामुत्तमोत्तमम् ।
विहितं जामदग्न्येन कुरुक्षेत्रे तपोवने ॥८
स्यमंतपंचकमिति स्थानं त्रैलोक्यविश्रुतम् ।
यत्र चक्रे भृगुश्रेष्ठः पितॄणां तृप्तिमक्षयाम् ॥९
स्नानदानतपोहोमद्विजभोजनतर्पणैः ।
भृशमाप्यायितास्तेन यत्र ते पितरोऽखिलाः ॥१०
अवापुरक्षयां तृप्तिं पितृलोकं च शाश्वतम् ।
समंतपंचकं नाम तीर्थं लोके परिश्रुतम् ॥११
वसिष्ठ गमन वर्णन ] [ ३७५
सर्वपापक्षयकरं महापुण्योपबृंहितम् । मर्त्यानां यत्र यातानामेनांसि निखिलानि तु ॥१२ दूरादेवापयास्यंति प्रवाते शुष्कपर्णवत् । तत्क्षेत्रचर्यागमनं मर्त्यानामसतामिह ॥१३ न लभ्यते महाराज जातु जन्मशतैरपि । समंतपंचकं तीर्थं कुरुक्षेत्रेऽतिपावनम् ॥१४
इसके पश्चात् हे राजन् ! तपश्चर्या करने के उस वन कुरुक्षेत्र में जमदग्नि के पुत्र के द्वारा किया हुआ वह कुरु क्षेत्रधाम तभी से आरम्भ करके तीर्थों से सबसे परम श्रेष्ठ तीर्थ बन गया था ।८। वह स्थान सस्मय-मन्तक--इस नाम से तीनों लोकों में प्रख्यात हो गया था । क्योंकि वहाँ पर परशुरामजी ने अपने पितृगणों की अक्षय तृप्ति की थी ।६। वहाँ पर उन्होंने पितरों को बहुत ही अच्छी तरह से स्नान-दान-तप-होम-विप्रों के लिए भोजन और तर्पण आदि के द्वारा सन्तृप्त कर दिया था ।१०। और पितृगणों के लोक ने निरन्तर अक्षय तृप्ति प्राप्त की थी । स्यमन्तक नाम वाला तीर्थ लोक से परिश्रुत है ।११। यह तीर्थ समस्त पापों के क्षय का करने वाला है और महान पुण्य से उपबृहन्ति है । जहाँ पर समागत हुए मनुष्यों के सम्पूर्ण से उपबृहन्ति है । जहाँ पर समागत हुए मनुष्यों के सम्पूर्ण पाप दूर से ही वायु में शुष्क पत्रों की ही भाँति उपगत हो जाता करते हैं । मनुष्यों का जो असत् है उनकी चर्या तथा गमन बड़ी ही कठिनाई से प्राप्त हुआ करता है । यह हे महाराज ! कभी भी सौ में जन्मों भी प्राप्त नहीं करता है । स्यमन्तक पंचक तीर्थ कुरुक्षेत्र में बहुत ही अधिक पावन है ।१२-१४।
यत्र स्नातः सर्वतीर्थैः स्नातो भवति मानवः । कृतकृत्यस्ततो रामः सम्यक् पूर्णमनोरथः ॥१५ उवास तत्र नियतः कंचित्कालं महामतिः । ततः संवत्सरस्यांते ब्राह्मणैः सहितो वशी ॥१६ पितृपिंडप्रदानाय जामदग्न्योऽगमद्गयाम् । ततो गत्वा ततः श्राद्धं यथाशास्त्रमरिंदमः ॥१७
३७६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
ब्राह्मणांस्तर्पयामास पितॄनुद्दिश्य सत्कृतान् । शैवं तत्र परं स्थानं चन्द्रपादमिति स्मृतम् ॥१८ पितृतृप्तिकरं क्षेत्रं तादृग्लोके न विद्यते । यत्रार्चिताः स्वकुलजैैर्यथाशक्ति मनागपि ॥१९ पितरः पिंडदानाद्यैः प्राप्स्यंति गतिमक्षयाम् । पितॄनुद्दिश्य तत्रासौ तर्पितेषु द्विजातेषु ॥२० ददौ च विधिवत्पिडं पितृभक्तिसमन्वितः । ततस्तत्पितरः सर्वे पितृलोकादुपागताः ॥२१
वह तीर्थ ऐसा महिमामय है कि जहाँ पर स्नान कर लेने वाला मनुष्य संसार के समस्त तीर्थों के स्नान का पुण्य फल प्राप्त कर लेने वाला हो जाता है । इसके अनन्तर राम अपने सब कृत्यों को पूर्ण कर लेने वाले सफल तथा भली भाँति पूर्ण मनोरथों वाले हो गये थे ।१५। फिर वे महती मति वाले नियत होकर कुछ काल तक निवासी हो गये थे । फिर सम्वत्सर के अन्त में वशी ब्राह्मणों के सहित पितृगणों के लिए पिण्ड समर्पित करने के लिये जमदग्नि के पुत्र गया गये थे । वहाँ पर जाकर शत्रुओं के दमन करने वाले ने शास्त्र की पद्धति के ही अनुसार श्राद्ध किया था ।१६-१७। उन्होंने श्राद्ध से अपने पितृगणों का उद्देश्य ग्रहण करके ब्राह्मणों का सत्कार किया था और उनको संतृप्त किया था । उसके आगे शैव स्थान है जो चन्द्रपाद नाम से कहा गया है ।१८। पितृगणों की तृप्ति करने वाला उसके समान लोक में अन्य कोई भी क्षेत्र नहीं है । यह ऐसा स्थान है जहाँ पर अपने कुल में समुत्पन्न मानवों के द्वारा शक्ति के अनुसार अत्यल्प रूप से भी अर्चित हुए पितृगण पिण्ड दानादिक के द्वारा अक्षय गति को प्राप्त कर लेंगे । वहाँ पर पितृगणों का उद्देश्य लेकर द्विजातियों को तृप्त किया था । जब वे पूर्णतया तृप्त हो गये थे तो पितृगण के प्रति भक्तिभाव से समन्वित होकर विधि पूर्वक पिण्डदान दिया था । इसके अनन्तर सभी पितृलोक से वहीं पर उपागत हो गये थे ।१९-२१।
जुगृहुस्तत्कृतां पूजां जमदग्निपुरोगमाः । अथ संप्रीतमनसः समेत्य भृगुनंदनम् ॥२२ ऊचुस्तत्पितरः सर्वेऽदृश्या भूत्वांतरिक्षगाः ।
वसिष्ठ गमन वर्णन ] [ ३७७
पितर ऊचु :- महत्कर्म कृतं वीर भवतान्यैः सुदुष्करम् ॥२३ अस्मानपि यथान्यायं सम्यक् तर्पितवानसि । अस्माकमक्षयां प्रीतिं तथापि त्वं न यच्छसि ॥२४ क्षत्रहत्यां हि कृत्वा तु कृतकर्माभवद्यतः । क्षेत्रस्यास्य प्रभावेण भक्त्या च तव दर्शनम् ॥२५ प्राप्ताः स्म पूजिताः किं तु नाक्षय्यफलभागिनः । तस्मात्त्वं वीरहत्यादिपापप्रशमनाय हि ॥२६ प्रायश्चित्तं यथान्यायं कुरु धर्मं च शाश्वतम् । वधाच्च विनिवर्तस्व क्षत्रियाणामतः परम् ॥२७ पितुर्न तेऽपराध्यंते न स्वतंत्रं यतो जगत् । तन्निमित्तं तु मरणं पितुस्ते विहितं पुरा ॥२८
जमदग्नि जिनमें आग्रगामी थे ऐसे उन सब पितृगणों ने वहाँ पर आकर उसके द्वारा की गयी पूजा का ग्रहण किया था और वे सब भृगुनन्दन पर बहुत अधिक प्रसन्न मन वाले हो गये थे ।२२। उन समस्त पितृगणों ने आकाश में स्थित होते हुए अदृश्य होकर ही उससे कहा था। पितृगण ने कहा—हे वीर ! तुमने बहुत ही बड़ा कार्य किया है जो कि अन्य जनों के द्वारा कभी भी नहीं हो सकता है अर्थात् महान् कठिन है ।२३। आपने न्याय पूर्वक बहुत ही अच्छी तरह से सन्तृप्त किया है तो भी हमारी कभी क्षीण न होने वाली प्रीति तुमने हमको नहीं दी है ।२४। कारण यह है कि आपने समस्त क्षत्रियों की हत्या करके ही आप कर्म करने वाले हुए हैं। यह तो इस क्षेत्र का ही प्रभाव है कि हमने आपको दर्शन दिया है तथा भक्ति भी इसका एक कारण है ।२५। हम लोग यहाँ पर पूजित तो अवश्य हुए हैं किन्तु फिर भी अक्षय फल के भागी नहीं हुए हैं। इस कारण से आपको उस महान् पाप के निवारण करने के लिये कुछ अवश्य ही कुछ करना ही होगा जो कि बड़े-बड़े वीरों की हत्या के प्रशमन के लिये होना चाहिए ।२६। अब आपका कर्त्तव्य है कि न्याय के अनुरूप इसका प्रायश्चित्त करो और निरन्तर रहने वाला धर्म का कर्म करो। तथा इससे आगे भविष्य में क्षत्रियों के वध करने के कार्य से दूर हो जाओ। अर्थात् क्षत्रियों की हत्या