भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३६६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

अपनी नगरी की ओर चले गये थे ।९। हे महाराज ! उस महामुनि जमदग्नि के जो अन्य पुत्र थे वे परम साधु प्रकृति से सुसम्पन्न महान् आत्मा वाले तापस ही थे जब उन्होंने देखा कि उनके पिता का बड़ी निर्दयता से हनन कर दिया गया है तो उस मृत पिता के शव के चारों बैठकर महान शोक से उत्पीड़ित होते हुए रुदन करने लग गये थे ।१०। अपने प्राणनाथ स्वामी को निहत और भूमि पर पड़े हुए देखकर मुनि पत्नी रेणुका देवी तुरन्त ही भूमि पर पछाड़ खाकर वज्राघात से गिरी हुई कोमल लता के ही समान मूर्च्छित होकर गिर गयी थी ।११। उसके मन में मूर्च्छा आ गयी थी और उसको अपने देह का अनुसन्धान नहीं रहा था । वह शोक की अग्नि से दीपित हो गयी थी । वह बहुत अधिक संज्ञा से हीन के समान ही होकर तुरन्त ही अपने प्रिय प्राणों से वियुक्त हो गयी थी अर्थात् उसके प्राण पखेरू तुरन्त ही उड़ गए थे ।१२। जब उसके पुत्रों ने देखा कि वह कुछ भी नहीं बोल रही है तो फिर उनको होश आया था और अपनी माता का मृत शरीर देखकर वे सभी शोक के अगाध सागर में निमग्न होते हुए मूर्च्छित होकर भूमि में पछाड़ खाकर गिर गये थे ।१३। जब ऐसा शोक से वहाँ बड़ा हाहाकार मच गया तो जो अन्य तप के ही धन वाले तपस्वी गण थे जो कि उसी तपोवन में निवास करने वाले थे हे मुने ! उन सबको भी उन मुनि पति-पत्नियों के वियोग से समान ही दुःख हो रहा था और वे सब वहीं पर इकट्ठे हो गये थे तथा रेणुका के पुत्रों को समाश्वासन दिया था ।१४।

सान्त्व्यमाना मुनिगणैर्जामदग्न्या यथाविधि ।
आधुक्षुर्वचसा तेषामग्नौ पित्रोः कलेवरे ॥१५
चक्रुरेव तदूर्ध्वं वै यत्कर्त्तव्यमनंतरम् ।
पित्रोर्मरणदुःखेन पीड्यमाना दिवानिशम् ॥१६
तत काले गते रामः समानां द्वादशावधौ ।
निवृत्तस्तपसः सख्या सहागादाश्रमं पितुः ॥१७

समस्त समागत मुनिगणों के द्वारा अब अच्छी तरह से उन पुत्रों को सान्त्वना दी गयी थी तो जमदग्नि के उन मुनियों के कहने से अपने माता-पिता के शवों का कर्मकाण्ड के अनुसार अग्नि में दाह कर दिया था ।१५। अन्त्येष्टि के अनन्तर फिर जो भी करने के योग्य ऊर्ध्व क्रिया कलाप था उस