संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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सबको भी पूर्णतया सम्पन्न किया था । वे सभी जमदग्नि के आत्मज अपने दोनों ही माता-पिता के मरण के असह्य दुःख से रात दिन पीड़ित होते हुए रहा करते थे ।१६। इसके अनन्तर कुछ काल के व्यतीत हो जाने पर जबकि बारह वर्षों की अवधि पूर्ण हो गयी थी तो अपनी तपश्चर्या से निवृत्त होकर राम अकृत व्रण के साथ अपने पिता श्री में आये थे ।१७।
क्षत्रिय वंश नाश प्रतिज्ञा
वसिष्ठ उवाच—
स गच्छन्पथि शुश्राव मुनिभ्यस्तत्त्वमादितः ।
राजपुत्रव्यवसितं पित्रोः स्वर्गतिमेव च ॥१॥
पितुस्तु जीवहरणं शिरोहरणमेव च ।
तन्मृतेरेव मरणं श्रुत्वा मातुश्च केवलम् ॥२॥
विललाप महाबाहुर्दुःखशोकसमन्वितः ।
तमथाश्वासयामास तुल्यदुःखोऽकृतव्रणः ॥३॥
हेतुभिः शास्त्रनिर्दिष्टैर्वीर्यसामर्थ्यसूचकैः ।
युक्तिलौकिकदृष्टान्तैस्तच्छोकं संव्यशामयत् ॥४॥
सान्त्वितस्तेन मेधावी धृतिमालंब्य भार्गवः ।
प्रययौ सहितः सख्या भ्रातॄणां तु दिदृक्षया ॥५॥
स तान् दृष्ट्वाभिवाद्यैतान् भार्गवो दुःखकर्षितः ।
शोकामर्षयुतस्तैश्च सह तस्थौ दिनत्रयम् ॥६॥
ततोऽस्य सुमहान्क्रोधः स्मरतो निधनं पितुः ।
बभूव सहसा सर्वलोकसंहरणक्षमः ॥७॥
श्री महामुनीन्द्र वसिष्ठजी ने कहा—परशुराम ने मार्ग में गमन करते हुए मुनि मण्डल से आरम्भ से सब तत्त्व सुन लिया था अर्थात् वहाँ पर किस तरह से सब घटनाएं हुईं थीं यह श्रवण कर लिया था । उनको यह भी ज्ञात हो गया था कि उन महान दुष्ट राज पुत्रों ने यह कुचेष्टाएं की थीं और उनके द्वारा पिता की मृत्यु तथा शोक में माता का देहान्त हो गया है