संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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पितुः प्रेतस्य राजेंद्र श्राद्धादिकमशेषतः ।
ब्राह्मणैः सह मातुश्च तत्र चक्रे यथोदितम् ॥६
एवं तीर्णप्रतीकः स कुरुक्षेत्रे तपोमये ।
उवासातंद्रितः सम्यक् पितृपूजापरायणः ॥७
श्री वसिष्ठ जी ने कहा—इसके अनन्तर अपरिमित तेज वाले मूर्द्धाभिषिक्त अर्थात् सर्वं शिरोमणि बारह सहस्र राजाओं का परशुरामजी ने जीवनों का ग्रहण किया था अर्थात् मार गिराया था ।१। इसके अनन्तर एक सहस्र राजाओं को पकड़ कर मुनिगणों के साथ महान् तेजस्वी वे परशुराम जी तपोमय कुरुक्षेत्र में गमन कर गये थे ।२। भृगूद्वह ने वहाँ पर पाँच सरोवर खुदवा कर उनको सब ओर परम सुख का आवाहन करने वाले तीर्थ कर दिया था ।३। वहीं पर उन सहस्र नृपों का हनन किया था और उनके शरीरों से निकले हुए रुधिर से भार्गव ने उन पाँचों सरोवरों को भर दिया था ।४। परमाधिक प्रतापी जमदग्नि के पुत्र ने न्यायानुसार उन सरोवरों में स्नान किया था और तन्द्रा से रहित होकर शास्त्रोक्त विधान से अपने पितरों को तृप्त किया था अर्थात् पितृगणों के लिए तर्पण किया था ।५। हे राजेन्द्र ! वहीं पर परशुरामजी ने जैसा भी शास्त्र में कहा गया है वही ब्राह्मणों के साथ रहकर अपने मृत पिता का और माता का श्राद्ध आदि पूर्ण रूप से सुसम्पन्न किया था ।६। इस रीति से पितृऋण से उत्तीर्ण होने वाले उन्होंने उस तप से परिपूर्ण कुरुक्षेत्र में पितृगणों की अर्चना में तत्पर होते हुए अतन्द्रित रहकर भली भाँति निवास किया था ।७।
ततः प्रभृत्यभूद्राजंस्तीर्थानामुत्तमोत्तमम् ।
विहितं जामदग्न्येन कुरुक्षेत्रे तपोवने ॥८
स्यमंतपंचकमिति स्थानं त्रैलोक्यविश्रुतम् ।
यत्र चक्रे भृगुश्रेष्ठः पितॄणां तृप्तिमक्षयाम् ॥९
स्नानदानतपोहोमद्विजभोजनतर्पणैः ।
भृशमाप्यायितास्तेन यत्र ते पितरोऽखिलाः ॥१०
अवापुरक्षयां तृप्तिं पितृलोकं च शाश्वतम् ।
समंतपंचकं नाम तीर्थं लोके परिश्रुतम् ॥११