संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवसिष्ठ गमन वर्णन ] [ ३७५
सर्वपापक्षयकरं महापुण्योपबृंहितम् । मर्त्यानां यत्र यातानामेनांसि निखिलानि तु ॥१२ दूरादेवापयास्यंति प्रवाते शुष्कपर्णवत् । तत्क्षेत्रचर्यागमनं मर्त्यानामसतामिह ॥१३ न लभ्यते महाराज जातु जन्मशतैरपि । समंतपंचकं तीर्थं कुरुक्षेत्रेऽतिपावनम् ॥१४
इसके पश्चात् हे राजन् ! तपश्चर्या करने के उस वन कुरुक्षेत्र में जमदग्नि के पुत्र के द्वारा किया हुआ वह कुरु क्षेत्रधाम तभी से आरम्भ करके तीर्थों से सबसे परम श्रेष्ठ तीर्थ बन गया था ।८। वह स्थान सस्मय-मन्तक--इस नाम से तीनों लोकों में प्रख्यात हो गया था । क्योंकि वहाँ पर परशुरामजी ने अपने पितृगणों की अक्षय तृप्ति की थी ।६। वहाँ पर उन्होंने पितरों को बहुत ही अच्छी तरह से स्नान-दान-तप-होम-विप्रों के लिए भोजन और तर्पण आदि के द्वारा सन्तृप्त कर दिया था ।१०। और पितृगणों के लोक ने निरन्तर अक्षय तृप्ति प्राप्त की थी । स्यमन्तक नाम वाला तीर्थ लोक से परिश्रुत है ।११। यह तीर्थ समस्त पापों के क्षय का करने वाला है और महान पुण्य से उपबृहन्ति है । जहाँ पर समागत हुए मनुष्यों के सम्पूर्ण से उपबृहन्ति है । जहाँ पर समागत हुए मनुष्यों के सम्पूर्ण पाप दूर से ही वायु में शुष्क पत्रों की ही भाँति उपगत हो जाता करते हैं । मनुष्यों का जो असत् है उनकी चर्या तथा गमन बड़ी ही कठिनाई से प्राप्त हुआ करता है । यह हे महाराज ! कभी भी सौ में जन्मों भी प्राप्त नहीं करता है । स्यमन्तक पंचक तीर्थ कुरुक्षेत्र में बहुत ही अधिक पावन है ।१२-१४।
यत्र स्नातः सर्वतीर्थैः स्नातो भवति मानवः । कृतकृत्यस्ततो रामः सम्यक् पूर्णमनोरथः ॥१५ उवास तत्र नियतः कंचित्कालं महामतिः । ततः संवत्सरस्यांते ब्राह्मणैः सहितो वशी ॥१६ पितृपिंडप्रदानाय जामदग्न्योऽगमद्गयाम् । ततो गत्वा ततः श्राद्धं यथाशास्त्रमरिंदमः ॥१७