भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३७६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

ब्राह्मणांस्तर्पयामास पितॄनुद्दिश्य सत्कृतान् । शैवं तत्र परं स्थानं चन्द्रपादमिति स्मृतम् ॥१८ पितृतृप्तिकरं क्षेत्रं तादृग्लोके न विद्यते । यत्रार्चिताः स्वकुलजैैर्यथाशक्ति मनागपि ॥१९ पितरः पिंडदानाद्यैः प्राप्स्यंति गतिमक्षयाम् । पितॄनुद्दिश्य तत्रासौ तर्पितेषु द्विजातेषु ॥२० ददौ च विधिवत्पिडं पितृभक्तिसमन्वितः । ततस्तत्पितरः सर्वे पितृलोकादुपागताः ॥२१

वह तीर्थ ऐसा महिमामय है कि जहाँ पर स्नान कर लेने वाला मनुष्य संसार के समस्त तीर्थों के स्नान का पुण्य फल प्राप्त कर लेने वाला हो जाता है । इसके अनन्तर राम अपने सब कृत्यों को पूर्ण कर लेने वाले सफल तथा भली भाँति पूर्ण मनोरथों वाले हो गये थे ।१५। फिर वे महती मति वाले नियत होकर कुछ काल तक निवासी हो गये थे । फिर सम्वत्सर के अन्त में वशी ब्राह्मणों के सहित पितृगणों के लिए पिण्ड समर्पित करने के लिये जमदग्नि के पुत्र गया गये थे । वहाँ पर जाकर शत्रुओं के दमन करने वाले ने शास्त्र की पद्धति के ही अनुसार श्राद्ध किया था ।१६-१७। उन्होंने श्राद्ध से अपने पितृगणों का उद्देश्य ग्रहण करके ब्राह्मणों का सत्कार किया था और उनको संतृप्त किया था । उसके आगे शैव स्थान है जो चन्द्रपाद नाम से कहा गया है ।१८। पितृगणों की तृप्ति करने वाला उसके समान लोक में अन्य कोई भी क्षेत्र नहीं है । यह ऐसा स्थान है जहाँ पर अपने कुल में समुत्पन्न मानवों के द्वारा शक्ति के अनुसार अत्यल्प रूप से भी अर्चित हुए पितृगण पिण्ड दानादिक के द्वारा अक्षय गति को प्राप्त कर लेंगे । वहाँ पर पितृगणों का उद्देश्य लेकर द्विजातियों को तृप्त किया था । जब वे पूर्णतया तृप्त हो गये थे तो पितृगण के प्रति भक्तिभाव से समन्वित होकर विधि पूर्वक पिण्डदान दिया था । इसके अनन्तर सभी पितृलोक से वहीं पर उपागत हो गये थे ।१९-२१।

जुगृहुस्तत्कृतां पूजां जमदग्निपुरोगमाः । अथ संप्रीतमनसः समेत्य भृगुनंदनम् ॥२२ ऊचुस्तत्पितरः सर्वेऽदृश्या भूत्वांतरिक्षगाः ।