भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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वसिष्ठ गमन वर्णन ] [ ३७७

पितर ऊचु :- महत्कर्म कृतं वीर भवतान्यैः सुदुष्करम् ॥२३ अस्मानपि यथान्यायं सम्यक् तर्पितवानसि । अस्माकमक्षयां प्रीतिं तथापि त्वं न यच्छसि ॥२४ क्षत्रहत्यां हि कृत्वा तु कृतकर्माभवद्यतः । क्षेत्रस्यास्य प्रभावेण भक्त्या च तव दर्शनम् ॥२५ प्राप्ताः स्म पूजिताः किं तु नाक्षय्यफलभागिनः । तस्मात्त्वं वीरहत्यादिपापप्रशमनाय हि ॥२६ प्रायश्चित्तं यथान्यायं कुरु धर्मं च शाश्वतम् । वधाच्च विनिवर्तस्व क्षत्रियाणामतः परम् ॥२७ पितुर्न तेऽपराध्यंते न स्वतंत्रं यतो जगत् । तन्निमित्तं तु मरणं पितुस्ते विहितं पुरा ॥२८

जमदग्नि जिनमें आग्रगामी थे ऐसे उन सब पितृगणों ने वहाँ पर आकर उसके द्वारा की गयी पूजा का ग्रहण किया था और वे सब भृगुनन्दन पर बहुत अधिक प्रसन्न मन वाले हो गये थे ।२२। उन समस्त पितृगणों ने आकाश में स्थित होते हुए अदृश्य होकर ही उससे कहा था। पितृगण ने कहा—हे वीर ! तुमने बहुत ही बड़ा कार्य किया है जो कि अन्य जनों के द्वारा कभी भी नहीं हो सकता है अर्थात् महान् कठिन है ।२३। आपने न्याय पूर्वक बहुत ही अच्छी तरह से सन्तृप्त किया है तो भी हमारी कभी क्षीण न होने वाली प्रीति तुमने हमको नहीं दी है ।२४। कारण यह है कि आपने समस्त क्षत्रियों की हत्या करके ही आप कर्म करने वाले हुए हैं। यह तो इस क्षेत्र का ही प्रभाव है कि हमने आपको दर्शन दिया है तथा भक्ति भी इसका एक कारण है ।२५। हम लोग यहाँ पर पूजित तो अवश्य हुए हैं किन्तु फिर भी अक्षय फल के भागी नहीं हुए हैं। इस कारण से आपको उस महान् पाप के निवारण करने के लिये कुछ अवश्य ही कुछ करना ही होगा जो कि बड़े-बड़े वीरों की हत्या के प्रशमन के लिये होना चाहिए ।२६। अब आपका कर्त्तव्य है कि न्याय के अनुरूप इसका प्रायश्चित्त करो और निरन्तर रहने वाला धर्म का कर्म करो। तथा इससे आगे भविष्य में क्षत्रियों के वध करने के कार्य से दूर हो जाओ। अर्थात् क्षत्रियों की हत्या