संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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करना बन्द कर दो।२७। इन विचारों के द्वारा तुम्हारे पिता का कोई भी अपराध नहीं किया गया है क्योंकि यह जगत् स्वतन्त्र नहीं हैं अर्थात् जगत् के प्राणी स्वेच्छा से ही कर्मों के करने में कभी भी स्वतन्त्र नहीं हुआ करते हैं। पहिले आपके पिता का जो मरण हुआ है उसके यह कोई भी निमित्त नहीं है क्योंकि स्वाधीनता किसी में भी कर्मों के करने की हुआ ही नहीं करती है ।२८।
हंतुं कं कः समर्थः स्याल्लोके रक्षितुमेव वा ।
निमित्तमात्रमेवेह सर्वः सर्वस्य चैतयोः ॥२९॥
ध्रुवं कर्मानुरूपं ते चेष्टंते सर्व एव हि ।
कालानुवृत्तं बलवान्नृ लोको नात्र संशयः ॥३०॥
बाधितुं भुवि भूतानि भूतानां न विधिं विना ।
शक्यते वत्स सर्वोऽपि यतः शक्त्या स्वकर्मकृत् ॥३१॥
क्षत्रं प्रति ततो रोषं विमुच्यास्मत्प्रियेप्सया ।
शममाप्नुहि भद्रं ते स ह्यस्माकं परं बलम् ॥३२॥
वसिष्ठ उवाच-
इत्युक्त्वांतर्दधुः सर्वे पितरो भृगुनन्दनम् ।
स चापि तद्वचः सर्वं प्रतिजग्राह सादरम् ॥३३॥
अकृतव्रणसंयुक्तो मुदा परमया युतः ।
प्रययौ च तदा रामस्तस्मात्सिद्धवनाश्रमम् ॥३४॥
तस्मिन्स्थित्वा भृगुश्रेष्ठो ब्राह्मणैः सहितो नृप ।
तपसे धृतसंकल्पो बभूव स महामनाः ॥३५॥
इस लोक में कौन है जो किसी का हनन या रक्षण करने की सामर्थ्य रखता हो। तात्पर्य यही है कि किसी में भी किसी के मारने या रक्षा करने की शक्ति नहीं है। मरण और संरक्षण इन दोनों के विषय में सभी केवल इस लोक में एक निमित्त ही हुआ करते हैं और वस्तुतः स्वयं कोई भी कुछ करने वाला नहीं होता है ।२६। जो भी कोई यहाँ पर किया करते हैं वे सभी यह निश्चय है कि अपने पूर्व कृत कर्मों के ही अनुसार चेष्टा किया करते हैं। तात्पर्य यही हैं कि जैसा भी जिसका कर्म पूर्व में किया हुआ होता