संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 375, कुल 893 में से
संदर्भ में पढ़ेंवसिष्ठ गमन वर्णन ] [ ३७६
है वही करने के लिए सबको यहां पर विवश होना ही पड़ता है। यहाँ पर मानवगण काल के ही अनुसार चला करते हैं। यह निस्सन्देह सत्य है कि नृलोक बलवान् है ।३०। इस भूमण्डल में कोई भी हे वत्स ! विधि के बिना प्राणियों को कोई बाधा पहुँचा कर शक्ति के द्वारा सामर्थ्य नहीं रखा करता है कारण यही है कि यहाँ पर सभी अपने कृत कर्मों के अनुसार ही सब किया करते हैं। तात्पर्य यही है कि कर्म ही बड़ा बलवान् है जिसके वशीभूत होकर प्राणी कार्य करने को प्रेरित होता है ।३१। आपने जो क्षत्रियों के वध करने का क्रोध किया है उसको अब त्याग दो यदि आपके मन में हमारे प्रिय करने की अभिलाषा है। अब आप शम को ग्रहण करो। इस भूमण्डल में इसी शम से आपका श्रेय होगा। यह शम तो हमारा बड़ा भारी बल हैं ।३२। वसिष्ठजी ने कहा—उन भृगुनन्दन जी से इतना ही कहकर सब पितृ-गण अन्तर्हित हो गये थे। फिर उन परशुरामजी ने भी बहुत ही आदर के साथ उनके उस वचन का ग्रहण किया था ।३३। अकृतव्रण को अपने साथ में लेकर परमाधिक प्रसन्नता से संयुत होकर उसी समय में परशुराम वहाँ से सिद्धों के वन में स्थित आश्रम को चले गये थे ।३४। महान् विशाल मन वाले राम उस आश्रम में समवस्थित होकर जहाँ कि बहुत से ब्राह्मण भी उनके साथ में थे हे नृप ! फिर वे तप करने के लिए मन में सङ्कल्प धारण करने वाले हो गये थे ।३५।
सरथं सहसाहं च धनुः संहननानि च । पुनरागमसंकेतं कृत्वा प्रास्थापयत्तदा ॥३६॥ ततः स सर्वतीर्थेषु चक्रे स्नानमतंद्रितः । परीत्य पृथिवीं सर्वां पितृदेवादिपूजकः ॥३७॥ एवं क्रमेण पृथिवीं त्रिवारं भृगुनन्दनः । परिचक्राम राजेंद्र लोकवृत्तमनुव्रतः ॥३८॥ ततः स पर्वतश्रेष्ठं महेंद्रं पुनरप्यथ । जगाम तपसे राजन्ब्राह्मणैरभिसंवृतः ॥३९॥ स तस्मिंश्चिररात्राय मुनिसिद्धनिषेविते । निवासमात्मनो राजन्कल्पयामास धर्मवित् ॥४०॥ मुनयस्तं तपस्यंतं सर्वक्षेत्रनिवासिनः ।