भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 376, कुल 893 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 376

३८० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

द्रष्टुकामाः समाजग्मुर्नियता ब्रह्मवादिनः॥ ४१
ददृशुस्ते मुनिगणास्तपस्यासक्तमानसम् ।
क्षात्रं कक्षमशेषेण दग्ध्वा शांतमिवानलम् ॥४२

उस समय में परशुरामजी ने रथ के सहित सहसाह को और धनुष तथा समस्त आयुधों को पुनः आवश्यकता पड़ने पर आगमन का संकेत करके वहाँ से प्रस्थापित कर दिया था। ३६। इसके पश्चात् उन्होंने सभी तीर्थों में अतन्द्रित होकर स्नान किया था और पितृगण तथा देवों का पूजन रीति से हे राजेन्द्र ! भृगुनन्दन ने लोक व्रत का अनुवर्त्तन करते हुए तीन बार सम्पूर्ण पृथ्वी का परिक्रमण किया था ।३८। हे राजन् ! इसके अनन्तर उन्होंने ब्राह्मणों से अभिसंवृत होकर फिर तपस्या करने के लिए महेन्द्र पर्वत पर जो कि पर्वतोंमें परमश्रेष्ठ था आगमन किया था ।३९। हे राजन् ! धर्म के ज्ञाता उन्होंने मुनिगण और सिद्ध-समुदायों के द्वारा सेवित उस पर्वत पर अधिक समय तक अपने निवास करने का विचार कर लिया था ।४०। फिर वहाँ पर समस्त क्षेत्रों के निवासी नियत और ब्रह्मवादी मुनियों ने तपश्चर्या करने वाले उन भार्गवेन्द्र के दर्शन करने की कामना रखकर वहाँ पर समागमन किया था ।४१। उन मुनिगणों ने तपश्चर्या में समासक्त उनका पूर्ण रूप से क्षत्रियों के कक्ष को दग्ध करके परम शान्त अग्नि की भाँति दर्शन किया था ।४२।

अथ तानागतान्दृष्ट्वा मुनीन्दिव्यांस्तपोमयान् ।
अर्घ्यादिसमुदाचारैः पूजयामास भार्गवः ॥४३
कृतकौशलसंप्रश्नपूर्वकाः सुमहोदयाः ।
तेषां तस्य च संवृत्ताः कथाः पुण्या मनोहराः ॥४४
ततस्तेषामनुमते मुनीनां भावितात्मनाम् ।
हयमेधं महायज्ञमाहर्तुमुपचक्रमे ॥४५
संभृत्य सर्वसंभारानौर्वाद्यैः सहितो नृप ।
विश्वामित्रभरद्वाजमार्कण्डेयादिभिस्तथा ॥४६
तेषामनुमते कृत्वा काश्यपं गुरुमात्मनः ।
वाजिमेधं ततो राजन्नाजहार महाक्रतुम् ॥४७