संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवसिष्ठ गमन वर्णन ] [ ३८१
तस्याभूत्काश्यपोऽध्वर्यु रुद्गाता गौतमो मुनिः । विश्वामित्रोऽभवद्धोता रामस्य विदितात्मनः ॥४८ ब्रह्मत्वमकरोत्त्तस्य मार्कण्डेयो महामुनिः । भरद्वाजाग्निवेश्याद्या वेदवेदांगपारगाः ॥४६
भार्गवेन्द्र मुनि ने जिस समय में उन समस्त परम दिव्य तप से परि- पूर्ण मुनियों को वहां पर समागत हुए देखा था तो उन्होंने अर्घ्य आदि सब उपचारों के द्वारा सहर्ष उनका अर्चन किया था ॥४३॥ उन समस्त महोदयों ने सर्व प्रथम तो क्षेम-कुशल का प्रश्नोत्तर किया था फिर उन सबकी और भार्गवेन्द्र की परस्पर में परम पुण्यमय मनोहर कथाएं हुई थीं ॥४४॥ इसको उपरान्त भावित आत्मा वाले उन्हें मुनियों की अनुमति से भृगुनन्दन ने महायज्ञ के आहरण करने का उपक्रम दिया था ॥४५॥ इसके अनन्तर हे नृप ! और्वादि तथा विश्वामित्र—भरद्वाज और मार्कण्डेय आदि के सहित यज्ञ के उपयुक्त समस्त संभारों का संग्रह किया गया था ॥४६॥ फिर उन्हीं सबकी अनुमति हो जाने पर भृगुनन्दन ने काश्यप को अपना गुरु बनाकर हे राजन् ! फिर वाजिमेध महान ऋतु का समाहरण किया था ॥४७॥ विदित आत्मा वाले भृगुनन्दन के गुरु तो काश्यप हुए थे और उद्गाता गौतम मुनि हुए थे और उस यज्ञ में विश्वामित्र ऋषि होता हुए थे ॥४८॥ महामुनि मार्कण्डेय ने वहां पर ब्रह्मा के पद को ग्रहण किया था । भरद्वाज-अग्निवेश्य आदि जो भी वेदों तथा वेदों के अङ्ग शास्त्रों के पारगामी प्रकाण्ड पण्डित थे ॥४६॥
मुनयश्चक्रुरन्यानि कर्माण्यन्ये यथाक्रमम् । पुत्रैः शिष्यैः प्रशिष्यैश्च सहितो भगवान्भृगुः ॥५० सादस्यमकरोद्राजन्नन्यैश्च मुनिभिः सह । स तैः सहाखिलं कर्म समाप्य भृगुपुंगवः ॥५१ ब्रह्माणं पूजयामास यथावद्गुरुणा सह । अलंकृत्य यथान्यायं कन्यां रूपवतीं महीम् ॥५२ पुरनामशतोपेतां समुद्रांबरमालिनीम् । आहूय भृगुशार्दूलः सशैलवनकाननाम् ॥५३