भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

वसिष्ठ गमन वर्णन ] [ ३८१

तस्याभूत्काश्यपोऽध्वर्यु रुद्गाता गौतमो मुनिः । विश्वामित्रोऽभवद्धोता रामस्य विदितात्मनः ॥४८ ब्रह्मत्वमकरोत्त्तस्य मार्कण्डेयो महामुनिः । भरद्वाजाग्निवेश्याद्या वेदवेदांगपारगाः ॥४६

भार्गवेन्द्र मुनि ने जिस समय में उन समस्त परम दिव्य तप से परि- पूर्ण मुनियों को वहां पर समागत हुए देखा था तो उन्होंने अर्घ्य आदि सब उपचारों के द्वारा सहर्ष उनका अर्चन किया था ॥४३॥ उन समस्त महोदयों ने सर्व प्रथम तो क्षेम-कुशल का प्रश्नोत्तर किया था फिर उन सबकी और भार्गवेन्द्र की परस्पर में परम पुण्यमय मनोहर कथाएं हुई थीं ॥४४॥ इसको उपरान्त भावित आत्मा वाले उन्हें मुनियों की अनुमति से भृगुनन्दन ने महायज्ञ के आहरण करने का उपक्रम दिया था ॥४५॥ इसके अनन्तर हे नृप ! और्वादि तथा विश्वामित्र—भरद्वाज और मार्कण्डेय आदि के सहित यज्ञ के उपयुक्त समस्त संभारों का संग्रह किया गया था ॥४६॥ फिर उन्हीं सबकी अनुमति हो जाने पर भृगुनन्दन ने काश्यप को अपना गुरु बनाकर हे राजन् ! फिर वाजिमेध महान ऋतु का समाहरण किया था ॥४७॥ विदित आत्मा वाले भृगुनन्दन के गुरु तो काश्यप हुए थे और उद्गाता गौतम मुनि हुए थे और उस यज्ञ में विश्वामित्र ऋषि होता हुए थे ॥४८॥ महामुनि मार्कण्डेय ने वहां पर ब्रह्मा के पद को ग्रहण किया था । भरद्वाज-अग्निवेश्य आदि जो भी वेदों तथा वेदों के अङ्ग शास्त्रों के पारगामी प्रकाण्ड पण्डित थे ॥४६॥

मुनयश्चक्रुरन्यानि कर्माण्यन्ये यथाक्रमम् । पुत्रैः शिष्यैः प्रशिष्यैश्च सहितो भगवान्भृगुः ॥५० सादस्यमकरोद्राजन्नन्यैश्च मुनिभिः सह । स तैः सहाखिलं कर्म समाप्य भृगुपुंगवः ॥५१ ब्रह्माणं पूजयामास यथावद्गुरुणा सह । अलंकृत्य यथान्यायं कन्यां रूपवतीं महीम् ॥५२ पुरनामशतोपेतां समुद्रांबरमालिनीम् । आहूय भृगुशार्दूलः सशैलवनकाननाम् ॥५३

३८२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

काश्यपाय ददौ सर्वामृते तं शैलमुत्तमम् । आत्मनः सन्निवासाथं तं रामः पर्यकल्पयत् ॥५४॥ ततः प्रभृति राजेंद्र पूजयामास शास्त्रतः । हिरण्यरत्नवस्त्राश्वगोगजान्नादिभिस्तथा ॥५५॥ पुरा समाप्य यज्ञांते तथा चावभृथाप्लुतः । चक्रे द्रव्यपरित्यागं तेषामनुमते तदा ॥५६॥

इन समस्त मुनियों ने तथा अन्यों ने क्रम के अनुसार अन्यान्य जो भी कर्म उस यज्ञशाला में थे उनको किया था । उस यज्ञ में भगवान् भृगु भी अपने पुत्रों-शिष्यों और प्रशिष्यों के सहित पधारे थे । उन्होंने अन्यान्य मुनियों के साथ हे राजन् ! यज्ञ की सदस्यता की थी अर्थात् सब सदस्य बन गये थे और उन सबके साथ मिलकर भृगुपुङ्गव परशुरामजी ने उस सम्पूर्ण कर्म को सुसम्पन्न किया था ।५०-५१। जब सम्पूर्ण कर्म समाप्त हो गया था यथा रीति अपने गुरुदेव के ही साथ ब्रह्माजी का पूजन किया था । फिर रूप लावण्य वाली मही कन्या को महामूल्यवान् आभूषणों से समलंकृत किया था ।५२। फिर उस मही कन्या को जो सहस्रों पुरों और ग्रामों से समन्वित एवं सागरों और अम्बर की माला वाली थी तथा उसमें अनेकों शैल-वन और कानन भी थे । उन मुनि शार्दूल ने उसको अपने समीप में बुला लिया था ।५३। फिर सम्पूर्ण उसको काश्यप मुनि को दे दिया था केवल उस उत्तम महेन्द्र पर्वत को नहीं दिया था जिस पर वे स्वयं निवास किया करते थे क्यों कि परशुरामजी ने उस पर्वत को अपने ही निवास करने के लिए कल्पित कर लिया था ।५४। तभी से लेकर हे राजेन्द्र ! शास्त्रानुसार सुवर्ण-रत्न-वस्त्र-अश्व-गौ-गज आदि के द्वारा उसका पूजन किया था । पहिले इस सब कर्म को समाप्त करके फिर यज्ञ के अवसान समय में वे यज्ञान्त अवभृथ स्नान से आप्लुत हुए थे और उसी अवसर पर उन समस्त महा मुनियों के के अनुमति से फिर द्रव्य का परित्याग कर दिया था ।५५-५६।

दत्त्वा च सर्वभूतानामभयं भृगुनन्दनः । तत्रापि पर्वतवरे तपश्चतुं समारभत् ॥५७॥ ततस्तं समनुज्ञाय सदस्या ऋत्विजस्तथा । ययुर्यथागतं सर्वे मुनयः शंसितव्रताः ॥५८॥

वसिष्ठ गमन वर्णन ] [ ३८३

गतेषु तेषु भगवानकृतव्रणसंयुतः।
तपो महत्तसमास्थाय तत्रैव न्यवसत्सुखी ॥५६॥
काश्यपी तु ततो भूमिर्जननाथा ह्यनेकंशः ।
सर्वदुःखप्रशांत्यर्थं मारीचानुमतेन तु ॥६०॥
तत्र दीपप्रतिष्ठाख्यव्रतं विष्णुमुखोदितम् ।
चचार धरणीं सम्यक् दुःखैःर्मुक्ताऽभवच्च सा ॥६१॥
इत्येष जामदग्न्यस्य प्रादुर्भाव उदाहृतः ।
यस्मिञ्श्रुते नरः सर्वपातकैर्विप्रमुच्यते ॥६२॥
प्रभावः कार्त्तवीर्यस्य लोके प्रथिततेजसः ।
प्रसंगात्कथितः सम्यङ्नातिसंक्षेपविस्तरः ॥६३॥

इसके पश्चात् भृगुनन्दन ने समस्त प्राणियों के लिए अभय का दान दे दिया था और वहाँ ही उस पर्वत पर तपस्या करने का आरम्भ कर दिया था ।५७। इसके अनन्तर जो भी यज्ञ में समागत सदस्य तथा ऋत्विज थे उन्होंने एवं शंसित व्रतों वाले मुनियों ने सभी ने जैसे-जैसे जहाँ से वहाँ आगमन किया वैसे ही विदा होकर चले गये थे ।५८। उन सबके चले जाने पर भगवान ने अकृतव्रण से संयुत होकर महान तप में समास्थित होकर सुख से सम्पन्न उसी स्थान पर निवास किया करते थे ।५६। इसके पश्चात् जानना था काश्यपी भूमि ने अनेक प्रकार के समस्त दुःखों की प्रशान्ति के लिए मारीच की अनुमति से एक व्रत किया था ।६०। वहाँ पर दीप प्रतिष्ठा नाम वाला व्रत जो कि भगवान विष्णु के मुख से कहा गया था उसको धरणी ने भली भाँति किया था और फिर समस्त दुःखों से मुक्त हो गयी थी ।६१। वह भगवान जामदग्न्य का प्रादुर्भाव सब बता दिया गया है जिसके श्रवण करने पर मनुष्य समस्त पातकों से मुक्त हो जाया करता है ।६२। अपरिमित तेज वाले कार्त्तवीर्य का लोक में जो प्रबल प्रभाव था वह भी प्रसङ्ग से दिया गया था जो न तो अति संक्षिप्त था और न विशेष विस्तृत ही था ।६३।

एवंप्रभावः स नृपः कार्त्तवीर्योऽभवद्भुवि ।
न तादृशः पुमान्कश्चिद्भावी भूतोऽथवा श्रुतः ॥६४॥

३८४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

दत्तात्रेयाद्वरं वव्रे मृतिमुत्तमपूरुषात् । यत्पुरा सोऽगमन्मुक्तिं रणे रामेण घातितः ॥६५॥ तस्यासीत्पंचमः पुत्रः प्रख्यातो यो जयध्वजः । पुत्रस्तस्य महाबाहुस्तालजंघोऽभवन्नृप ॥६६॥ अभूत्तस्यापि पुत्राणां शतमुत्तमधन्विनाम् । तालजंघाभिधा येषां वीतिहोत्रोऽग्रजोऽभवत् ॥६७॥ पुत्रैः सवीतिहोत्राद्यैर्हैहयाद्यैश्च राजभिः । कालं महांत्तमवसद्धिमाद्रिवनगह्वरे ॥६८॥ यः पूर्वं रामबाणेन द्रवन्पृष्ठेऽभिताडितः । तालजंघोऽपतद्भूमौ मूर्च्छितो गाढवेदनः ॥६९॥ ददर्श वीतिहोत्रस्तं द्रवन्दैववशादिव । रथमारोप्य वेगेन पलायनपरोऽभवत् ॥७०॥

वह नृप कार्त्तवीर्य इस भूमण्डल में इस प्रकार के प्रभाव वाला हुआ था कि उस प्रकार का कोई भी पुरुष न कभी हुआ और न भविष्य में भी होगा तथा न कभी सुना ही गया है ।६४। उसने दत्तात्रेय मुनीन्द्र से यह वरदान प्राप्त किया था कि उसकी मृत्यु किसी महान उत्तम पुरुष से होवे । रण से वह परशुरामजी के द्वारा निहत होकर पहिले मुक्ति को प्राप्त हो गया था ।६५। उस राजा का पाँचवां पुत्र प्रख्यात था जिसका नाम जयध्वज था । हे नृप ! उसका पुत्र महाबाहु तालजङ्घ हुआ था ।६६। उसके भी उत्तम धनुर्धारी सौ पुत्र हुए थे । उन सबके नाम तालजङ्घ था उनमें वीतिहोत्र सबमें बड़ा भाई था ।६७। वह वीतिहोत्र प्रभृति पुत्रों के तथा हैहय वंशश नृपों के सहित उस हिमाद्रि पर्वत के वन गह्वर में बहुत लम्बे समय तक उसने निवास किया था ।६८। जो पहिले राम के बाण के द्वारा भागता हुआ भी पृष्ठ भाग में प्रताड़ित हो गया था । फिर वह तालजङ्घ गहरी वेदना से युक्त होकर मूर्च्छा को प्राप्त हो गया था और भूमि पर गिर गया था ।६९। भाग्यवश उसको भागते हुए वीतिहोत्र ने देखा था । बड़े ही वेग से उसको रथ पर समारोपित करके वह भाग जाने में तत्पर हो गया था ।७०।

वसिष्ठ गमन वर्णन ] [ ३८५

ते तत्र न्यवसन्सर्वे हिमाद्रौ भयपीडिताः । कृच्छ्रं महांतामासाद्य शाकमूलफलाशनः ॥७१ ततः शांतिं गते रामे तपस्यासक्तमानसे । तालजंघः स्वकं राज्यं सपुत्रः प्रत्यपद्यत ॥७२ सन्निवेश्य पुरीं भूयः पूर्ववन्नृपसत्तमः । वसंस्तदा निजं राज्यमपालयदरिंदमः ॥७३ सुपुत्रः सानुगबलः पूर्ववैरमनुस्मरन् । अभ्याययौ महाराज तालजंघः पुरं तव ॥७४ चतुरंगबलोपेतः कंपयन्निव मेदिनीम् । रुरोदाभ्येत्य नगरीमयोध्यां स महीपतिः ॥७५ ततो निष्क्रम्य नगरात्फल्गुतंत्रोऽपि ते पिता । युयुधे तैर्नृपैः सर्वैर्वृद्धोऽपि तरुणो यथा ॥७६ निहतानेकमातंगतुरंगरथसैनिकः । शत्रुभिर्निर्जितो वृद्धः पलायनपरोऽभवत् ॥७७

वे सभी भागते हुए आकर भय से बहुत पीड़ित हो गये थे और हिमाद्रि पर्वत में बस गये थे । उन सबको महान कष्ट प्राप्त हुआ था और वहाँ पर वे सब शाक-मूल और फलों का अशन करने वाले हुए थे ।७१। जब वहाँ पर परशुराम परत शान्ति को प्राप्त हो जाने पर केवल तपस्या में ही आसक्त मन वाले हो गये थे और फिर उनका कोई भी भय नहीं रहा था तो तालजङ्घ ने अपने पुत्रों के सहित अपना राज्य कर लिया था ।७२। उस श्रेष्ठ राजा ने फिर पूर्व की ही भाँति अपनी नगरी को सन्निवेशित करके उस समय में वहीं पर निवास करते हुए उस अरिन्दम ने अपने राज्य का परिपालन किया था ।७३। हे महाराज ! सुन्दर पुत्र वाले और अपने अनुचरों तथा सेना से युक्त होकर उस तालजङ्घ ने पूर्व वैर का अनुस्मर करके वह तालजङ्घ आपके पुर में अभ्यागत हो गया था ।७४। वह चतुरङ्गिणी सेना से संयुत होकर भूमि को कँपाता हुआ जैसे हो चला था। जब वह अयोध्या नगरी में पहुँचा तो वह राजा रोने लग गया था ।७५। इसके पश्चात् आपके पिता के पास बहुत कम साधन थे तो भी वह नगर से निकल

३८६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

आये थे और उन समस्त नृपों के साथ वृद्ध होते हुए भी तरुण पुरुष के ही समान उसने घोर युद्ध किया था ।७६। उसके बहुत से हाथी-अश्व-रथ और सैनिक जब निहत हो गये थे तो वह शत्रुओं के द्वारा निर्जित हो गया था और फिर वह वृद्ध वहां से भागने लग गया ।७७।

त्यक्त्वा स नगरं राज्यं सकोशबलवाहनम् । अन्तर्वत्न्या च ते मात्रा सहितो वनमाविशत् ।।७८ तत्र चौर्वाश्रमोपांते निवसन्त्तचिरादिव । शोकामर्षसमाविष्टो वृद्धभावेन च स्वयम् ।।७६ विलोक्यमानो मात्रा ते बाष्पगद्गदकंठया । अनाथ इव राजेन्द्र स्वर्गलोकमितो गतः ।।८० ततस्ते जननी राजन्दुःखशोकसमन्विता । चितामारोपयद्भर्तू रुदती सा कलेवरम् ।।८१ अनशनादिदुःखेन भर्तुर्व्यसनकर्शिता । चकाराग्निप्रवेशाय सुदृढां मतिमात्मनः ।।८२ और्वरुतदखिलं श्रुत्वा स्वयमेव महामुनि । निर्गत्य चाश्रमात्तां च वारयन्निदमब्रवीत् ।।८३ न मर्तव्यं त्वया राज्ञि सांप्रतं जठरे तव । पुत्रस्तिष्ठति सर्वेषां प्रवरश्चक्रवर्तिनाम् ।।८४

उस वृद्ध नृप ने अपना सम्पूर्ण राज्य-नगर-कोश-बल समस्त वाहनों को छोड़कर गर्भवती तुम्हारी माता को साथ में लेकर वन में प्रवेश कर कर लिया था ।७८। वहाँ वन में और्व मुनि के आश्रम के समीप में अल्प समय तक ही उसने निवास किया था और वह स्वयं वृद्धता के कारण से बहुत ही अधिक शोक तथा अमर्ष से समाविष्ट हो गया था। तुम्हारी माता उसको देख रही थी और उसके नेत्रों से अश्रुपात हो रहा था उसका कण्ठ गद्गद हो गया था । हे राजेन्द्र ! वह वृद्ध नृप एक अनाथ के ही समान यहाँ से स्वर्गलोक में चल बसा था ।७६-८०। इसके अनन्तर हे राजन् ! तुम्हारी माता विचारी पति वियोग के महा दुःख और शोक से समन्वित हो गयी थी । फिर करुण क्रन्दन करती हुई उसने स्वामी के मृत शरीर को चिता

वसिष्ठ गमन वर्णन ] [ ३८७

पर समारोपित कर दिया था ॥८१॥ पति के मृत हो जाने पर उसने कुछ भी खाया नहीं था—शोक हृदय में बैठा ही था—ऐसे दुःखों से अपने स्वामी से वियोग के दुःख से वह बहुत कशित हो गयी थी। अतः उसने भी अपने आपको भी अग्नि में पति के ही शव के साथ प्रवेश कर सती हो जाने का सुदृढ़ निश्चय कर लिया था ॥८२॥ और्व महामुनि ने यह सम्पूर्ण समाचार सुना तो वे महामुनि स्वयं ही अपने आश्रम से बाहिर निकलकर आ गये थे और उससे यह वचन कहा था ॥८३॥ हे राज्ञि ! तुमको इस समय में पति के साथ प्राणत्याग नहीं करना चाहिए कारण यह है कि तुम्हारे उदर में पुत्र स्थित है जो कि समस्त चक्रवर्त्तियों में परम श्रेष्ठ होगा ॥८४॥

इति तद्वचनं श्रुत्वा माता तव मनस्विनी । विरराम मृतेस्तां तु मुनिः स्वाश्रममानयत् । ततः सा सर्वदुःखानि नियम्य त्वन्मुखांबुजम् ॥८५॥ दिदृक्षुराश्रमोपांते तस्यैव न्यवसत्सुखम् । सुषाव च ततः काले सा त्वामौर्वाश्रमे तदा ॥८६॥ जातकर्मादिकं सर्वं भवतः सोऽकरोन्मुनिः । और्वाश्रमे विवृद्धश्च भवांस्तेनानुकंपितः ॥८७॥ त्वयैव विदितं सर्वमतः परमरिंदम । एवं प्रभावो नृपतिः कार्त्तवीर्योऽभवद्भुवि ॥८८॥ व्रतस्यास्य प्रभावेण सर्वलोकेषु विश्रुतः । यद्धर्णौर्जितो युद्धे पिता ते वनमाविशत् ॥८९॥ तद्वृत्तांतमशेषेण मया ते समुदीरितम् । एतच्च सर्वमाख्यातं व्रतानामुत्तमं तव ॥६०॥ समन्त्रतन्त्रं लोकेषु सर्वलोकफलप्रदम् । न ह्यस्य कर्तुर्नृपतेः पुरुषार्थचतुष्टये ॥६१॥

तुम्हारी मनस्विनी माता ने इस उस मुनि के वचन का श्रवण किया था तो फिर वह सती होकर दग्ध होने से कार्य से विरत हो गयी थी और फिर उसको वह मुनि अपने आश्रम में ले आये थे। इसके पश्चात् उसने सब दुःखों की ओर से अपने मन को नियमित कर लिया था तथा उस गर्भस्थ

३८८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

अपने बालक के मुख कमल को देखने की इच्छा वाली होकर उसी आश्रम के समीप में सुख पूर्वक निवास कर रही थी ।८५। जब प्रसव काल उपस्थित हुआ तो उसने उसी और्व मुनि के आश्रम में प्रसव किया था ।८६। उसी मुनि ने आपका समस्त जातकर्म आदि संस्कार किया था और आप उसी मुनि की कृपा के भाजन होते हुए और्वाश्रय में ही पालित होकर बड़े हुए हैं ।८७। हे अरिन्दम ! इसके पश्चात् जो भी कुछ हुआ है वह आपको सब ज्ञात ही है । इस प्रकार के प्रभाव वाला राजा कार्त्तवीर्य इस भूमण्डल पर हुआ था ।८८। इसी व्रत के प्रभाव से वह लोकों में प्रख्यात हुआ है । जिसके वंश में समुत्पन्न होने वालों के द्वारा आपके पिता को युद्ध में जीत लिया गया है और वन में चले गये थे ।८९। उसका सम्पूर्ण वृत्तान्त मैंने आपको कहकर सुना दिया है और यह सब व्रतों में उत्तम व्रत मैंने आपको बतला दिया है ।९०। यह ऐसा व्रत है कि लोकों में मन्त्रों और तन्त्रों के सहित सब ही लौकिक फल को प्रदान कर देने वाला है । जो इस व्रत को राजा किया करता है उसको चारों (धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष) पुरुषार्थों की प्राप्ति हो जाया करती है ।९१।

भवत्यभीप्सितं किञ्चिद्दुर्लभं भुवनत्रये ।
संक्षेपेण मयाख्यातं व्रतं हैहयभूभुजः ।
जामदग्न्यस्य च मुने किमन्यत्कथयामि ते ॥६२॥

जैमिनिरुवाच-

ततः स सगरो राजा कृतांजलिपुटो मुनिम् ॥६३॥
उवाच भगवन्नेतत्कर्तुमिच्छाम्यहं व्रतम् ।
सम्यक्त्वमुपदेशेन तत्रानुज्ञां प्रयच्छ मे ॥६४॥
कर्मणानेन विप्रर्षे कृतार्थोऽस्मि न संशयः ।
इत्युक्तस्तेन राज्ञा तु तथेत्युक्त्वा महामुनिः ॥६५॥
दीक्षयामास राजानं शास्त्रोक्तेनैव वर्त्मना ।
स दीक्षितो वसिष्ठेन सगरो राजसत्तमः ॥६६॥
द्रव्याण्यानीय विधिवत्प्रचचार शुभव्रतम् ।
पूजयित्वा जगन्नाथं विधिना तेन पार्थिवः ॥६७॥

सद्घ गमन वर्णन ] [ ३८६

समाप्य च यथायोग्यमनुज्ञाय गुरुं ततः । प्रतिज्ञामकरोद्राजा व्रतमेतदनुत्तमम् ॥६८॥ आजीवांतं धरिष्यामि यत्नेनेति महामतिः । अथानुज्ञाप्य राजानं वसिष्ठो भगवानृषिः ॥६६॥ सन्निवर्त्यानुगच्छंतं प्रजगाम निजाश्रमम् ॥१००॥

फिर इन तीनों भुवनों में कुछ भी ऐसी अभीप्सित वस्तु नहीं है जिसका प्राप्त करना दुर्लभ हो अर्थात् सभी कुछ प्राप्त हो जाया करता है । यह हैहय राजा का व्रत मैंने संक्षेप से कह दिया है और अब जमदग्नि के पुत्र परशुराम मुनि के विषय में मैं आपको क्या बतलाऊँ ? ।६२। जैमिनि ने कहा—इसके अनन्तर राजा सगर अपने हाथों की अञ्जलि को जोड़कर मुनिवर से कहने लगा था ।६३। उसने कहा—हे भगवन् ! मैं इस व्रत के करने की इच्छा करता हूँ सो आप भली भाँति उपदेश के द्वारा इसके करने में मुझे अपनी अनुज्ञा प्रदान कीजिए ।६४। हे विप्रर्षे ! इस कर्म से मैं कृतार्थ हो गया हूँ—इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है । जब राजा के द्वारा इस रीति से प्रार्थना की गयी तो उस मुनि ने भी ऐसा ही होगा—यह कह दिया था । फिर उस मुनि ने शास्त्रोक्त मार्ग के द्वारा उस राजा को दीक्षा दी थी और श्रेष्ठ राजा सगर वसिष्ठ मुनि के द्वारा दीक्षित होगया था ।६५-६६। फिर समस्त द्रव्यों को मंगा कर विधि-विधान के साथ उस शुभ व्रतका समाचरण किया था । राजा ने उसी विधि से भगवान् जगन्नाथ का पूजन किया ।६७। यथा योग्य उसको सङ्ग समाप्त करके फिर अपने गुरुदेव की आज्ञा प्राप्त की थी और उस राजा ने उस सर्वोत्तम व्रत के करने की दृढ़ प्रतिज्ञा की थी ।६८। महामति उस नृप ने यही प्रतिज्ञा की थी कि मैं इस व्रत को जब तक मेरा जीवन रहेगा तब तक धारण करूँगा और यत्न पूर्वक करता रहूँगा । फिर भगवान् वसिष्ठ ऋषि ने उस राजा को अपनी आज्ञा प्रदान कर दी थी ।६६। फिर अपने पीछे अनुगमन करने वाले राजा को वापिस लौटाकर वसिष्ठ जी अपने आश्रम को चले गये थे ।१००।

३६० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

सगर-प्रतिज्ञा पालन

जैमिनिरुवाच- गते तस्मिन्मुनिवरे सगरो राजसत्तमः । अयोध्यायामधिवसन्पालयामास मेदिनीम् ॥१ सर्वसंपद्गणोपेतः सर्वधर्मार्थतत्त्ववित् । वयसैव स बालोऽभूत्कर्मणा वृद्धसंमतः ॥२ तथापि न दिवा भुङ्क्ते शेते वा निशि संस्मरन् । सुदीर्घं निःश्वसित्युष्णमुद्विग्नहृदयोऽनिशम् ॥३ श्रुत्वा राजा स्वराज्यं निजगुरुमवजित्यारिभिः संगृहीतं मात्रा सार्द्धं प्रयांतं वनमतिगहनं स्वर्गंतं तं च तस्मिन् । शोकाविष्टः सरोषं सकलरिपुकुलोच्छित्तये सत्प्रतिज्ञश्चक्रे सद्यः प्रतिज्ञां परिभवमनलं सोढुमिक्ष्वाकुवंश्यः ॥४ स कदाचिन्महीपालः कृतकौतुकमंगलः । रिपुं जेतुं मनश्चक्रे दिशश्च सकलाः क्रमात् ॥५ अनेकरथसाहस्रैर्गजाश्वरथसैनिकैः । सर्वतः संवृतो राजा निश्चक्राम पुरोत्तमात् ॥६ शत्रून्हंतुं प्रतस्थे निजबलनिवहेनोत्पतद्भिस्तुरंगै- र्नासित्वोर्मिजालाकुलजलनिधिनिभेनाथ षाडंगिकेन । मत्तैर्मातंगयूथैः सकुलगिरिकुलेनैव भूमंडलेन । श्वेतच्छत्रध्वजौघैरपि शशिसुकराभातखेनैव सार्द्धम् ॥७

जैमिनि मुनि ने कहा—उस मुनिवर के चले जाने पर श्रेष्ठ नृप सगर ने अयोध्या पुरी में अधिवास करते हुए इस मेदिनी का परिपालन किया था ।१। वह सभी प्रकार की सम्पदाओं से संयुत था और सम्पूर्ण धर्म के तात्त्विक अर्थ का ज्ञाता था। वह अवस्था से ही बालक था किन्तु उसके

सगर-प्रतिज्ञा पालन ] [ ३६१

कर्म ऐसे थे कि वह वृद्धों के सम्मत थे ।२। वह दिन में भोजन नहीं करता है अथवा रात्रि में शयन भी नहीं किया करता है और स्मरण करता हुआ बहुत लम्बी श्वास लिया करता है जो कि बहुत गर्म होती हैं तथा उसका हृदय रात दिन अत्यन्त ही उद्विग्न रहता है ।३। जब राजा ने यह श्रवण किया था कि अपने गुरु को अवजित करके अपना सम्पूर्ण राज्य शत्रुओं ने ले लिया है । वह पिता पराजित होकर मेरी माता के सहित बहुत ही गहन वन में प्रयाण कर गये हैं और वहाँ पर ही स्वर्गलोक के प्रवासी हो गये हैं । उस पर इक्ष्वाकु के वंश में समुत्पन्न उसने महान् क्रोध से युक्त होकर तथा शोक से संविष्ट होते हुए सत्प्रतिज्ञा वाले ने समस्त शत्रुओं के कुल का उच्छेदन करने के लिये तुरन्त ही प्रतिज्ञा की थी और इस परिभव की थी और इस परिभव की अग्नि को कठिनाई से सहन किया था ।४। फिर किसी समय में उस महीपाल ने मङ्गल कौतुक करके सब दिशाओं में क्रम से जाकर शत्रु के जीतने का मन में विचार किया था ।५। वह राजा अनेकों सहस्र रथ-अश्व-गज और सैनिकों से सब ओर से संवृत होकर अपने उत्तम- पुर से निकल दिया था ।६। उस राजाने शत्रुओं को जीतने के लिए प्रस्थान कर दिया था । जिस समय में वहाँ से चला है उस समय में उसकी सेनाओं का ऐसा विशाल समुदाय उसके साथ में था कि उसमें जो अश्व थे वे ऊपर की ओर उछालें मार रहे थे कि ऐसा प्रतीत होता था मानों अत्युच्च तरङ्गों से समाकुल जलनिधि ही होवे । वह सेना छहों अङ्गों से युक्त थी । मत्त हाथियों के समूह ऐसे थे मानों भूमण्डल कुलगिरियों के समुदाय से संयुत है । उसकी सेनामें श्वेत ध्वजाओं के समूह आकाश में फहरा रहे थे जो ऐसा आभास हो रहा था कि पूर्ण अन्तरिक्ष चन्द्रमा की किरणों से श्वेत चमक रहा हो । ऐसी महान् विशाल सेना को साथ लेकर ही वह चला था ।७।

तस्याग्रेसरसैन्ययूथचरणप्रक्षुण्णशैलोच्चयः क्षोदापूरितनिम्नभागमवनीपालस्य संयास्यतः । प्रत्येकं चतुरङ्गसैन्यनिकरप्रक्षोदसंभूतरेणुप्रावृतिरुत्स्थली समभवद्भूमिस्तु तत्रानिशम् ॥८

निघ्नन्दृप्ताननेकान्द्विपतुरगरथव्यूहसंभिन्नवीरान्सद्यः शोभां दधानोऽसुरनिकरचमूनिघ्नतश्चन्द्रमौलिः । दूरादेवाभिशंसन्नरिनगरनिरोधेषु कर्माभिषंगे तेषां शीघ्रापयानक्षणमभिदिशति प्राणिधेयं विधत्ते ॥६

३६२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

विजिगीषुर्दिशो राजा राज्ञो यस्याभियास्यति ॥१० विषयं स नृपस्तस्य सद्यः प्रणतिमेष्यति । विजित्य नृपतीन्सर्वान्कृत्वा च स्वपदानुगान् ॥११ संकेतगामिनः कांश्चित्कृत्वा राज्ये न्यवर्त्तत । एवं स विसरन्दिक्षु दक्षिणाभिमुखो नृपः ॥१२ स्मरन्पूर्वकृतं वैरं हैहयानभ्यवर्त्तत । ततस्तस्य नृपैः सार्द्धं समग्ररथकुंजरैः ॥१३ बभूव हैहयैर्वीरैः संग्रामो रोमहर्षणः । राज्ञां यत्र सहस्राणि स बलानि महाहवे ॥१४

जिस समय में वह राजा सम्प्रयाण कर रहा था उस समय में उसकी जो सबसे आगे चलने वाली सेना के समुदायों के चरणों से शैलों के उच्च-भाग क्षुण्ण हुए थे उनके क्षोदों से निम्न भाग जो भूमि में थे वे भर गये थे और चतुरङ्गिणी सेना के हाथी-अश्व-रथ और पैदल सैनिकों के हर एक के एक के चरणों से जो भूमि खुदकर प्रक्षोद रेणु उठी थी उससे ऊँचे स्थल ढक गये थे । इस तरह से वह भूमि निरन्तर ऐसी ही होगयी थी ।८। अनेक दृप्त अर्थात् दर्प से परिपूर्ण हाथी-घोड़े और रथों के व्यूह से संभिन्न वीरों को निहनन करने वाले उसकी शोभा तुरन्त ही असुरों के समूहों की सेनाओं का हनन करने वाले भगवान् शिव की शोभा को धारण वह नृप कर रहा था । उनके कर्मों के अभिषङ्ग होने पर दूर से ही शत्रुओं के नगर के विरोधों में ऐसा अभिशंसन करते हुए कि यहाँ से शीघ्र ही कहीं से भाग जाने के क्षणों का निर्देश करता है और प्राणियों के धैर्य का किया करता है ।६। वह राजा जिसको सब दिशाओं में विजय प्राप्त करने की इच्छा है जिस राजा के ऊपर अभिमान करेगा ।१०। वह राजा उसके देश की प्रणति को प्राप्त करा देगा । उस नृप ने सभी नृपतियों को जीतकर उनको अपने चरणों का अनुचर बना लिया था ।११। उसे महान् वीर राजा ने कुछ नृपों की सङ्केत पर गमन करने वाले बनाकर उनको अपने ही राज्य पर भेज दिया था अर्थात् अपनी आज्ञा के इशारे वाले होना उन्होंने स्वीकार कर लिया था तो उनको राज्य पर बिठा दिया था । इस रीति से विसरण सब दिशाओं में करके फिर राजा दक्षिण की ओर अभिमुख हुआ था ।१२। उस राजा ने अपने साथ पूर्व में की हुई शत्रुता स्मरण करके हैहय राजाओं के ऊपर

सगर-प्रतिज्ञा पालन ] [ ३६३

आक्रमण किया था। फिर उन सबके साथ जो पूर्णतया रथों और हाथियों से संयुत थे इसका महान् युद्ध हुआ था। १३। उन हैहय वीरों के साथ उसका बड़ा ही रोमाञ्चकारी भीषण युद्ध हुआ था जिस युद्ध में सहस्रों राजा थे और बड़ी विशाल सेनाएं भी थीं। १४।

निजघान महाबाहुः संक्रुद्धः कोसलेश्वरः ।
जित्वा हैहयभूपालान्भंक्त्वा दग्ध्वा च तत्पुरीम् ॥१५
निःशेषशून्यामकरोद्वैरांतकरणो नृपः ।
समग्रबलसंमर्द्दप्रमृष्टाशेषभूतलः ॥१६
हैहयानामशेषं तु चक्रे राज्यं रजः समम् ।
राज्यं पुरीं चापहाय भ्रष्टैश्वर्या हतत्विषः ॥१७
राजानो हतभूयिष्ठा व्यद्रवंत समंततः ।
अभिद्रुत्य नृपांस्तांस्तु द्रवमाणान्महीपतिः ॥१८
जघान सानुगान्मत्तः प्रजाः क्रुद्ध इवांतकः ।
ततस्तान्प्रति सक्रोधः सगरः समरेऽरिहा ॥१९
मुमोचास्त्रं महारौद्रं भार्गवं रिपुभीषणम् ।
तेनोत्सृष्टातिरोद्रत्रिभुवनभयदप्रस्फुरद्भागैवास्त्र-
ज्वालादंदह्यमानावशतनुततयस्ते नृपाः सद्य एव ।
वाय्वस्त्रावृत्तधूमोगमपटलतमोमुष्टदृष्टिप्रसारा
भ्रेमुर्भू पृष्ठलोठद्वहुलतमरजो गूढमात्रा मुहूर्त्त म् ॥२०
आग्नेयास्त्रप्रतापप्रतिहतगतयोऽदृष्टमार्गाः समंता-
द्भूपाला नष्टसंघाः परवशतनवो व्याकुलीभूतचित्ताः ।
भीताः संत्युक्तवस्त्रायुधकवचविभूषादिका मुक्तकेशा
विस्पष्टोन्मत्तभावानृशतरमनुकुर्वत्यग्रतः
शात्रवाणाम् ॥२१

उन सभी का निहनन महान् बाहुओं वाले कोसलेश्वर ने अत्यन्त क्रुद्ध होकर कर दिया था। फिर हैहय नृपों को जीतकर उनकी पुरी को तोड़-कर दग्ध कर दिया था। १५। वैर के अन्त करने वाले नृप ने उनकी पुरी

३६४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

को पूर्णतया शून्य कर दिया था । वह राजा ऐसा बलवान् था कि उसने अपनी समग्र सेना के द्वारा मर्दन करके सबको भीड़ डाला था और सम्पूर्ण भूतल को प्रमृष्ट कर दिया था ।१६। उस राजा ने हैहयों के समस्त राज्य को धूल में मिला दिया था। जब वहाँ कुछ भी शेष न रहा तो वे सब अपने राज्य और पुरोंको छोड़कर क्षीण कान्ति वाले और विनष्ट ऐश्वर्य वाले हो गये थे ।१७। जो राजा मरने से बच गये थे ऐसे बहुत से वहाँ चारों ओर भाग गये थे । उस महीपति ने जो भी वहाँ से भाग रहे थे उनको वेग से आगे बढ़कर निग्रहीत कर लिया था ।१८। इस मदोन्मत्त बलवान् नृप ने क्रुद्ध अन्तक जैसे प्रजाओं को मार दिया करता है वैसे ही इसने भी सबका संहार कर दिया था । समर में शत्रुओं के हनन करने वाले राजा सगर ने उन पर बड़ा भारी क्रोध किया था ।१६। फिर सगर नृप ने महान् रौद्र-शत्रुओं के लिये बहुत ही भीषण भार्गव अस्त्र को उन पर छोड़ा था । इस महास्त्र का बड़ा भारी सब पर प्रभाव पड़ा था । उसके छोड़े जाने पर जो कि अत्यन्त ही रौद्र था, वह तीनों भुवनों को भय देने वाला था । ऐसा प्रस्फुरण करता हुआ जो भार्गव अस्त्र था उसकी ज्वालाओं से दग्ध होते हुए और अवश शरीरों वाले वे समस्त नृपगण हो गये थे । इसके उपरान्त जो वायु-अस्त्र का प्रयोग करने से चारों ओर धूम के समूह ने उनको ऐसा घेर लिया था कि वहाँ पर घोर अन्धकार से उन को दृष्टि भी मुष्ट हो गयी थी अर्थात् देखने की शक्ति समाप्त हो गयी थी और मुहूर्त्त भर तक तो वे सब अधिक अन्धकार और रज से ढके हुए होकर भूमि के पृष्ठ पर लोटते हुए चक्कर काट रहे थे ।२०। शत्रुओं के सैनिकों की दशा उस समय में ऐसी हो गयी थी कि छोड़े हुए आग्नेयास्त्र के प्रताप से जिनकी गति प्रतिहत हो गयी है अर्थात् वे चलने में असमर्थ हो गये थे क्योंकि उनको उस समय में मार्ग दिखलाई नहीं दे रहा था—चारों ओर उन नृपों के सङ्ग नष्ट हो गये थे और उनके शरीर परवश हो गये थे तथा उनके चित्त व्याकुल हो गये थे । वे ऐसे भीत हो गये थे कि उन्होंने अपने वस्त्र-आयुध-कवच और विभूषा आदि सबका त्याग कर दिया था-उनके मस्तकों के केश खुले हुए थे—वे सब अत्यन्त उन्मत्तों के ही भावों का उस समय में अनुकरण कर रहे थे ।२१।

विजित्य हैहयान्सर्वान्समरे सगरो बली ।
संक्षुब्धसागराकारः काम्बोजानभ्यवर्तत ॥२२॥

सगर-प्रतिज्ञा वर्णन ] [ ३६५

नानावादित्रघोषाहतपटहरवाकर्णनध्वस्तधैर्याः सद्यः संत्यक्तराज्यस्वबलपुरपुरंध्रीसमूहा विमूढाः । कांबोजास्तालजंघाः शकयवनकिरातादयः साकमेते भ्रमुर्भूर्यंत्रभीत्या दिशि दिशि रिपवो यस्य पूर्वापराधाः ॥२३

भीतास्तस्त नरेश्वरस्य रिपवः केचित्प्रता- पानलज्वालामुष्टदृशो विसृज्य वसतिं राज्यं च पुत्रादिभिः । द्विट्सैन्यैः समभिद्रुता वनभुवं संप्राप्य तत्रापि तेऽ- स्तैमित्यं समुपागता गिरिगुहासुप्तोत्थितेन द्विपः ॥२४

तालजंघान्निहत्याजौ राजा सबलवाहनान् । क्रमेण नाशयामास तद्राज्यमरिकर्षणः ॥२५

ततो यवनकांबोजकिरादीननेकंशः । निजघान रुषाविष्टः पल्हवान्पारदानपि ॥२६

हन्यमानास्तु ते सर्वे राजानस्तेन संयुगे । द्रुद्रुवुः संघशो भीता ह्यवशिष्टाः समंततः ॥२७

युष्माभिर्यस्य राज्यं बहुभिरपहृतं तस्य पुत्रोऽधुनाऽहं हन्तुं वः सप्रतिज्ञ प्रसममुपगतो वैरनिर्यातनैषी । इत्युच्चैः श्रावयाणो युधि निजचरितं वैरिभिर्नागवीर्यः क्षत्रैर्विध्वंसितेजाः सगरनरपतिः स्मारयामास भूपः ॥२८

समर में उस समय में सगर नृप ने सब हैहय नृपों को पराजित करके वह बलवान् नृप संक्षुब्धसागर के समान आकार वाला हो गया था और फिर उसने काम्बोजों पर आक्रमण किया था ।२२। जिन्होंने सगर नृप का पहिले अपराध किया था वे सब इस समय में बहुत ही बुरी दशा में पड़कर दिशाओं में मारे-मारे इसके शत्रुगण भूमि पर भ्रमण कर रहे थे अर्थात् प्राणों की रक्षा के लिए भटकते हुए घूम रहे थे । जब युद्ध में अनेक तरह के वाद्यों के घोष से और पटहों की ध्वनि के श्रवण करने से उन सब

३६६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

की धीरज छूट गया था-उन्होंने तुरन्त ही अपना राज्य-सेना और स्त्रियों का भी त्याग कर दिया और किंकर्त्तव्य विमूढ़ हो गये थे । इनके अतिरिक्त तालजङ्घ-काम्बोज-शक-पवन और किरात आदि सब साथ ही साथ अस्त्रों के भय से भ्रमण कर रहे थे ।२३। उस सगर नरेश्वर के भय से डरे हुए शत्रुगण उस समय में ऐसे हो गये कि कुछ की तो प्रताप की अग्नि की ज्वाला से दृष्टि ही नष्ट हो गयी थी और वे सब अपना राज्य-वसति का त्यागकर के पुत्रादि के साथ शत्रु की सेनाओं से खदेड़े हुए जङ्गम में पहुँच गये थे वहाँ पर भी उनके नेत्रों में स्तिमता छाया हुआ था जैसे कि गिरियों की गुफाओं में सोकर उठने पर होता है । तात्पर्य यह है कि वन में भी उनको कुछ सूझ नहीं रहा था ।२४। शत्रुओं से कर्षण करने वाले उस राजा ने रण में तालजङ्घों को निहत करके और उनके सैनिक तथा वाहनों का विनाश करके उसने क्रम से उनके राज्य का ध्वंस कर दिया था ।२५। इसके अनन्तर पवन-काम्बोज और किरात आदि तथा वल्हव एवं पारद प्रभृति को सब को क्रोध में समाविष्ट होकर राजा सगर ने मार गिराया था ।२६। उस महायुद्ध में मारे जाते हुए वे सब राजा लोग उस प्रतापी राजा के द्वारा प्रताड़ित होकर मरने से जो भी कुछ बच गये थे भयभीत होते हुए समुदाय के समुदाय चारों ओर भाग गये थे ।२७। वे सब परस्पर में यह कहते हुए और बहुत ही ऊँचे स्वर से चिल्लाते हुए भाग रहे थे कि आप सब ने जिसके राज्य को वर वश छीन लिया था उसी का पुत्र यह है जो इस समय के अपने बैर को निकालने की इच्छा वाला होकर जबरदस्ती से यहाँ उपगत हुआ है-हाथियों के समान वीर्यवाले सगर नृप ने जिसका तेज ही विध्वंसकारी है उस युद्ध क्षेत्र में वैरियों के द्वारा अपना चरित सुनाता हुआ उन्हें याद करा रहा था ।२८।

तं दृष्ट्वा राजवर्यं सकलरिपुकुलप्रक्षयोपात्तदोक्षं भीताः स्त्रीबालपूर्वं शरणमभिययुः स्वासुसंरक्षणाय । इक्ष्वाकूणां वसिष्ठं कुलगुरुमभितः सप्त राज्ञां कुलेषु प्रख्याताः संप्रसूता नृपवररिपवः पारदाः पल्हवाद्याः ॥२९ वसिष्ठाश्रमोपांते वसंतमृषिभिर्वृतम् । उपगम्याब्रुवन्सर्वे कृतांजलिपुटा नृपाः ॥३०

सगरोपाख्यान (१) ] [ ३६७

शरणं भव नो ब्रह्मन्नार्त्तानामभयैषिणाम् । सगरास्त्राग्निानिर्दग्धशरीराणां मुमूर्षताम् ।।३१ स हन्त्यस्मानशेषेण वैरांतकरणोन्मुखः । तस्माद्भयाद्धि निष्क्रांता वयं जीवितकांक्षिणः ।।३२ विभिन्नराज्यभोगर्द्धिस्र्वदारापत्यबांधवाः । केवलं प्राणरक्षार्थं त्वां स्वयं शरणं गतः ।।३३ न ह्यन्योऽस्ति पुमाँल्लोके सौहृदेन बलेन वा । यस्तं निवर्त्तयित्वास्मान्पालयेन्महतो भयात् ।।३४ त्वं किलाक्र्कान्वयभुवां राज्ञां कुलगुरुवृतः । तद्वंशपूर्वजे भूपैस्त्वत्प्रभावश्च तादृशः ।।३५

समस्त शत्रुओं के कुलों का पूर्णतया क्षय करने को दीक्षा ग्रहण करने वाले उस राजा को देखकर डरे हुए सब शत्रुगण स्त्री और बच्चों को आगे करके अपने प्राणों की रक्षा के लिए सगर नृप की शरणागति में आ गये। इक्ष्वाकु के वंशजों के कुलगुरु वसिष्ठजी के चारों ओर वे सात राजाओं के कुलों में परम प्रसिद्ध समुत्पन्न हुए पारद और वह्लव आदि सगर के शत्रु राजा उपस्थित हुए थे ।२९। वसिष्ठजी के समीप में ही ऋषियों से घिरे हुए निवास कर रहे थे। वहाँ पर उन सबने उपगत होकर हाथ जोड़कर उनसे कहा था ।३०। हे ब्रह्मन् आप ही हमारे रक्षा करने वाले होंवे। हम बहुत ही आर्त्त हैं और अभय दान के इच्छुक हैं। हम सब राजा सगर के अस्त्र को अग्नि से निर्दग्ध शरीर वाले हैं और मर रहे हैं ।३१। वह राजा सगर तो अपने वैर का अन्त करने के लिए उन्मुख हो रहा है और हम सबको ही मार रहा है। उसी के भय से हम निकलकर भागे हुए हैं और अपने जीवन की रक्षा के चाहने वाले हैं ।३२। हमारा सबका राज्य-भोग-समृद्धि-स्त्री-सन्तति और बान्धव सभी कुछ विभिन्न हो गया है। अब तो हम केवल अपने प्राणों की रक्षा के लिए आपको शरणागति में आये हैं ।३३। इस लोक में आपके सिवाय अन्य कोई भी पुरुष ऐसा नहीं है जो सौहार्द से तथा बल-विक्रम से उसको हटाकर इस महान भय से हमारी रक्षा कर सके ।३४। आप तो निश्चित रूप से सूर्य वंश के भूपों के कुलगुरु माने गये हैं और उस राजा के वंश में जो भी पूर्वज हुए थे उन सबने आपको कुलगुरु बनाया है और इन सब पर भी आपका प्रभाव उसी प्रकार का है ।३५।

३६८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

तेनायं सगरोऽप्यद्य गुरुगौरवयंत्रितः ।
भवन्निदेशं नात्येति वेलामिव महोदधिः ॥३६
त्वं नः सुहृत्पिता माता लोकानां च गुरुर्विभो ।
तस्मादस्मान्महाभाग परित्रातुं त्वमर्हसि ॥३७
जैमिनिरुवाच-
इति तेषां वचः श्रुत्वा वसिष्ठो भगवानृषिः ।
शनैर्विलोकयामास शरणं समुपागतान् ॥३८
वृद्धस्त्रीबालभूयिष्ठान्हतशेषान्नृपान्वयान् ।
दृष्ट्वा त्वतप्यद्भगवान्सर्वभूतानुकंपकः ॥३९
चिरं निरूप्य मनसा तान्विलोक्य च सादरम् ।
उज्जीवयञ्छनैर्वाचा मा भैष्टेति महामतिः ॥४०
अथावोचन्महाभागः कृपया परयान्वितः ।
समये स्थापयामास राज्ञस्ताञ्जीविताथिनः ॥४१
भूपव्याकोपदग्धं नृपकुलविहिताशेषधर्मादपेतं
कृत्वा तेषां वसिष्ठः समयमवनिपालप्रतिज्ञानिवृत्त्यै ।
गत्वा तं राजवर्यं स्वयमथ शनकैः सांत्वयित्वा यथावत् ।
सप्राणानामरीणामपगमनविधावभ्यनुज्ञां ययाचे ॥४२

इस कारण से आज भी यह राजा सगर अपने कुलगुरु आपके गौरव से यन्त्रित है। यह कभी भी आपके आदेश का उलंघन अपनी मर्यादा को समुद्र की भाँति नहीं करता है।३६। हे विभो ! हमारे तो इस समय में आप लोगों के गुरु हैं। इसलिए हे महाभाग ! आप ही इससे हमारी रक्षा करने के योग्य होते हैं।३७। जैमिनि ने कहा—ऋषिवर भगवान् वसिष्ठजी ने उनके इस वचन का श्रवण करके शरणागति में समागत उनको धीरे से अवलोकित किया था।३८। उनसे सभी वृद्ध-स्त्री-और बालक बहुत से थे और मरने से बचे-बचाये नृप वंशज थे। ऐसी दुरवस्था में स्थित उन सबको देखा था तो वसिष्ठजी का हृदय करुणाद्र हो गया था क्योंकि यह तो सभी प्राणिमात्र पर अनुकम्पा करने वाले महा पुरुष थे।३९। बहुत काल पर्यन्त उनका निरूपण

सगर प्रतिज्ञा वर्णन ] [ ३६६

किया था और मन में बड़ा आदर करके उनका विलोकन किया था । फिर उन महती मति वाले वसिष्ठजी ने उनको उज्जीवित करते हुए धीरे से कहा था—आप लोग डरो मत ।४०। इसके पश्चात् उन महाभाग ने अत्यधिक कृपा से समन्वित होकर कहा था तथा जीवन के चाहने वाले उन समस्त नृपों को समय में (सन्धि करने में) स्थापित कर दिया था ।४१। वसिष्ठजी ने राजा सगर की प्रतिज्ञा की निवृत्ति के लिए ऐसा समय किया था कि वह राजा सगर की क्रोधाग्नि से दग्ध नृप समुदाय नृपों के कुल में किए हुए सम्पूर्ण धर्म से अपेत हो गया था। फिर वे स्वयं ही धीरे से उस नृप श्रेष्ठ सगर के समीप में प्राप्त हुए थे और उनको यथा-रीति सान्त्वना दी थी तथा जीवित शत्रुओं के अपगमन के विधान में उनकी आज्ञा की याचना की थी। अर्थात् वे सभी जीवित ही चले जायें—ऐसी याचना की थी ।४२।

सक्रोधोऽपि महीपतिर्गुरुवचः संभावयस्तानरीन् धर्मस्य स्वकुलोचितस्य च तथा वेषस्य सत्यागतः । श्रौतस्मार्त्तविभिन्नकर्मनिरतान्विप्रैश्च दूरोज्झतान् सासूनकेवलमत्यजन्मृतसमानेकैकशः पार्थिवान् ॥४३

अर्द्धमुण्डाञ्छकांश्चक्रे पल्हवान् श्मश्रुधारिणः । यवनान्विगतश्मश्रूंन्कांबोजांश्चिबुकान्वितान् ॥४४

एवं विरूपानन्यांश्च स चकार नृपान्वयान् । वेदोक्तकर्मनिर्मुक्तान्विप्रैश्च परिवर्जितान् ॥४५

कृत्वा संस्थाप्य समये जीवतस्तान्व्यसर्जयत् । ततस्ते रिपवस्तस्य त्यक्तस्वाचारलक्षणाः ॥४६

व्रात्यतां समनुप्राप्ताः सर्ववर्णविनिंदिताः । धिक्कृताः सततं सर्वे नृशंसा निरपत्रपाः ॥४७

क्रूराश्च संघशो लोके बभूवुर्म्लेच्छजातयः ॥४८

मुक्तास्तेनाथ राज्ञा शकयवनकिरातादयः सद्य एव त्यक्तस्वाचारवेषा गिरिगहनगुहाद्याश्रयाः संवभूवुः । एता अद्यापि सद्भिः सततमवमता जातयोऽसत्प्रवृत्त्या वर्त्तन्ते दुष्टचेष्टा जगति नरपतेः पालयंतः प्रतिज्ञाम् ॥४९

४०० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

यद्यपि राजा सगर को बहुत अधिक क्रोध हो रहा था तो भी उस नृप ने अपने गुरुदेव की आज्ञा का समादर करते हुए ऐसा स्वीकार कर लिया था वे सब शत्रु तभी जीवित एक-एक छोड़े जा सकते हैं जब कि वे अपने कुल के उचित धर्म और वेष का त्याग कर देवें और श्रोत तथा स्मार्त्त कर्मों से भिन्न कर्मों में निरत रहें और विप्रों के द्वारा दूर ही से त्यागे हुए रहें मृत के ही समान रहे तो रह सकते हैं ॥४३॥ उसमें जो शक जाति वाले थे उनके शिर तो आधे मुण्डित कर दिये गये थे और जो पह्लव थे उनको श्मश्रुधारी करा दिया था। जो यवन थे उनकी श्मश्रुओं को मुँडा दिया गया था और काम्बोज को मुकान्वित करा दिया था ॥४४॥ इस तरह से उस सगर ने अन्यों को विरूप विप्रों के द्वारा परिवर्तित बना दिये गये थे ॥४५॥ ऐसा ही सबको बनाकर समय में (सन्धि में) अर्थात् इस प्रकार की शर्त में बाँधकर संस्थापित करते हुए जीवित ही छोड़ दिया था अर्थात् ऐसे ढंग से ही उनके रहने पर उनका हनन नहीं किया था। इसके अनन्तर उसके वे समस्त शत्रुगण आचार के लक्षणों के परित्याग कर देने वाले हो गए थे ॥४६॥ इस तरह से रहने पर वे सभी व्रात्य हो गये थे और सभी वर्णों के द्वारा विनिन्दित बन गये थे अर्थात् किसी भी वर्ण वाले नहीं रहे थे। सर्वदा उनको धिक्कार दिया जा जाता था—वे बहुत क्रूर हो गये थे तथा एकदम निर्लज्ज भी बन गये थे ॥४७॥ वे सभी अत्यन्त क्रूरों के समुदायों वाले हो गये थे जो कि लोक में म्लेच्छ जाति वाले हो गये थे जो कि लोक में म्लेच्छ जाति वाले हुए थे ॥४८॥ उस समय में जो भी राजा सगर के द्वारा जीवित ही छोड़ दिये गये थे। वे शकयवन और किरात आदि थे वे तुरन्त ही आचार और वेष के त्याग देने वाले हो गये और फिर वे पर्वतों की गुफाओं में आश्रय लेने वाले हो गये थे। ये जातियाँ अब भी सत्पुरुषों के द्वारा बहुत ही नीच मानी जाती हैं क्योंकि बहुत ही बुरी प्रवृत्ति होती है और उनकी चेष्टाएँ भी दुष्ट हैं। ये जगत् में राजा सगर की प्रतिज्ञा का पालन किया करते हैं ॥४६॥

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सगर की दिग्विजय

जैमिनिरुवाच— अथानुज्ञाय सगरो वसिष्ठमृषिसत्तमम् । बलेन महता युक्तो विदर्भानभ्यवर्त्तत ॥१॥