भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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सगर प्रतिज्ञा वर्णन ] [ ३६६

किया था और मन में बड़ा आदर करके उनका विलोकन किया था । फिर उन महती मति वाले वसिष्ठजी ने उनको उज्जीवित करते हुए धीरे से कहा था—आप लोग डरो मत ।४०। इसके पश्चात् उन महाभाग ने अत्यधिक कृपा से समन्वित होकर कहा था तथा जीवन के चाहने वाले उन समस्त नृपों को समय में (सन्धि करने में) स्थापित कर दिया था ।४१। वसिष्ठजी ने राजा सगर की प्रतिज्ञा की निवृत्ति के लिए ऐसा समय किया था कि वह राजा सगर की क्रोधाग्नि से दग्ध नृप समुदाय नृपों के कुल में किए हुए सम्पूर्ण धर्म से अपेत हो गया था। फिर वे स्वयं ही धीरे से उस नृप श्रेष्ठ सगर के समीप में प्राप्त हुए थे और उनको यथा-रीति सान्त्वना दी थी तथा जीवित शत्रुओं के अपगमन के विधान में उनकी आज्ञा की याचना की थी। अर्थात् वे सभी जीवित ही चले जायें—ऐसी याचना की थी ।४२।

सक्रोधोऽपि महीपतिर्गुरुवचः संभावयस्तानरीन् धर्मस्य स्वकुलोचितस्य च तथा वेषस्य सत्यागतः । श्रौतस्मार्त्तविभिन्नकर्मनिरतान्विप्रैश्च दूरोज्झतान् सासूनकेवलमत्यजन्मृतसमानेकैकशः पार्थिवान् ॥४३

अर्द्धमुण्डाञ्छकांश्चक्रे पल्हवान् श्मश्रुधारिणः । यवनान्विगतश्मश्रूंन्कांबोजांश्चिबुकान्वितान् ॥४४

एवं विरूपानन्यांश्च स चकार नृपान्वयान् । वेदोक्तकर्मनिर्मुक्तान्विप्रैश्च परिवर्जितान् ॥४५

कृत्वा संस्थाप्य समये जीवतस्तान्व्यसर्जयत् । ततस्ते रिपवस्तस्य त्यक्तस्वाचारलक्षणाः ॥४६

व्रात्यतां समनुप्राप्ताः सर्ववर्णविनिंदिताः । धिक्कृताः सततं सर्वे नृशंसा निरपत्रपाः ॥४७

क्रूराश्च संघशो लोके बभूवुर्म्लेच्छजातयः ॥४८

मुक्तास्तेनाथ राज्ञा शकयवनकिरातादयः सद्य एव त्यक्तस्वाचारवेषा गिरिगहनगुहाद्याश्रयाः संवभूवुः । एता अद्यापि सद्भिः सततमवमता जातयोऽसत्प्रवृत्त्या वर्त्तन्ते दुष्टचेष्टा जगति नरपतेः पालयंतः प्रतिज्ञाम् ॥४९