संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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यद्यपि राजा सगर को बहुत अधिक क्रोध हो रहा था तो भी उस नृप ने अपने गुरुदेव की आज्ञा का समादर करते हुए ऐसा स्वीकार कर लिया था वे सब शत्रु तभी जीवित एक-एक छोड़े जा सकते हैं जब कि वे अपने कुल के उचित धर्म और वेष का त्याग कर देवें और श्रोत तथा स्मार्त्त कर्मों से भिन्न कर्मों में निरत रहें और विप्रों के द्वारा दूर ही से त्यागे हुए रहें मृत के ही समान रहे तो रह सकते हैं ॥४३॥ उसमें जो शक जाति वाले थे उनके शिर तो आधे मुण्डित कर दिये गये थे और जो पह्लव थे उनको श्मश्रुधारी करा दिया था। जो यवन थे उनकी श्मश्रुओं को मुँडा दिया गया था और काम्बोज को मुकान्वित करा दिया था ॥४४॥ इस तरह से उस सगर ने अन्यों को विरूप विप्रों के द्वारा परिवर्तित बना दिये गये थे ॥४५॥ ऐसा ही सबको बनाकर समय में (सन्धि में) अर्थात् इस प्रकार की शर्त में बाँधकर संस्थापित करते हुए जीवित ही छोड़ दिया था अर्थात् ऐसे ढंग से ही उनके रहने पर उनका हनन नहीं किया था। इसके अनन्तर उसके वे समस्त शत्रुगण आचार के लक्षणों के परित्याग कर देने वाले हो गए थे ॥४६॥ इस तरह से रहने पर वे सभी व्रात्य हो गये थे और सभी वर्णों के द्वारा विनिन्दित बन गये थे अर्थात् किसी भी वर्ण वाले नहीं रहे थे। सर्वदा उनको धिक्कार दिया जा जाता था—वे बहुत क्रूर हो गये थे तथा एकदम निर्लज्ज भी बन गये थे ॥४७॥ वे सभी अत्यन्त क्रूरों के समुदायों वाले हो गये थे जो कि लोक में म्लेच्छ जाति वाले हो गये थे जो कि लोक में म्लेच्छ जाति वाले हुए थे ॥४८॥ उस समय में जो भी राजा सगर के द्वारा जीवित ही छोड़ दिये गये थे। वे शकयवन और किरात आदि थे वे तुरन्त ही आचार और वेष के त्याग देने वाले हो गये और फिर वे पर्वतों की गुफाओं में आश्रय लेने वाले हो गये थे। ये जातियाँ अब भी सत्पुरुषों के द्वारा बहुत ही नीच मानी जाती हैं क्योंकि बहुत ही बुरी प्रवृत्ति होती है और उनकी चेष्टाएँ भी दुष्ट हैं। ये जगत् में राजा सगर की प्रतिज्ञा का पालन किया करते हैं ॥४६॥
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सगर की दिग्विजय
जैमिनिरुवाच— अथानुज्ञाय सगरो वसिष्ठमृषिसत्तमम् । बलेन महता युक्तो विदर्भानभ्यवर्त्तत ॥१॥