संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसगर की दिग्विजय ] [ ४०१
ततो विदर्भराट् तस्मै स्वसुतां प्रीतिपूर्वकम् । केशिन्याख्यामनुपमामनुरूपां न्यवेदयत् ॥२॥ स तस्या राजशार्दूलो विधिवद्वहिनसाक्षिकम् । शुभे मुहूर्ते केशिन्याः पाणिं जग्राह भूमिपः ॥३॥ स्थित्वा दिनानि कतिचिद्गृहे तस्यातिसत्कृतः । विदर्भराज्ञा संमंत्र्य ततो गंतुं प्रचक्रमे ॥४॥ अनुज्ञातस्ततस्तेन पारिबर्हैश्च सत्कृतः । निष्क्रम्य तत्पुराद्राजा शूरसेनानुपेयिवान् ॥५॥ संभावितस्ततश्चैव यादवैर्मातृसोदरैः । धनौघैस्तर्पितस्तैश्च मधुराया विनिर्ययौ ॥६॥ एवं स सगरो राजा विजित्य वसुधामिमाम् । करैश्च स नृपान्सर्वाश्चक्रे संकेतगानपि ॥७॥
जैमिनी मुनि ने कहा-इसके अनन्तर नृप सगर ने परम श्रेष्ठ ऋषि वसिष्ठजी की अनुज्ञा प्राप्त करके महान सेना से समन्वित होकर विदर्भ देश पर आक्रमण किया था ।१। फिर विदर्भ के नृप ने अपनी केशिनी नाम वाली पुत्री को बहुत ही प्रीति के साथ उनकी सेवा में समर्पित कर दी थी । यह कन्या रूप लावण्यादि सब गुणों में अनुपम थी और उस नृप के सर्वथा अनुरूप थी ।२। उस राजशार्दूल नृप सगर ने अग्नि को साक्षी करके परम शुभ मुहूर्त में उस का पाणिग्रहण किया था ।३। वहाँ पर ससुराल ही में कुछ दिन तक स्थित रहकर उस विदर्भेश्वर के द्वारा बड़ा सत्कार प्राप्त किया था फिर विदर्भाधि अनुमति पाकर वहाँ से गमन करने का उपक्रम किया था ।४। उस राजा ने भी आज्ञा देदी थी तथा पारिबर्हों के अर्थात् दायों के द्वारा उसका अच्छा सत्कार किया था। फिर वहाँ पुर से राजा ने निकल कर शूरसेन देशों में पहुँचा था ।५। वहाँ पर भी माता के सादरों के द्वारा यादवों से उसका सम्मान किया गया था और बहुत-सा धन देकर उन्होंने भी उसको पूर्ण सन्तुष्ट किया था । इसके पश्चात् वहाँ से निकल कर चल दिया था ।६। मधुरा से चलकर इस रीति से उस राजा सगर ने इस सम्पूर्ण वसुधा पर विजय प्राप्त की थी और समस्त नृपों पर कर लगाकर उनको अपने ही संकेतों पर चलने वाले अनुगामी बना दिया था ।७।