भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४०२ ] [ कालिका पुराण

ततोऽनुमान्य नृपतीन्निजराज्याय सानुगान् । अनुजज्ञे नरपतिः समस्ताननुयायिनः ॥८ ततो बलेन महता स्कंधावारसमन्वितः । शनैरपीडयन्देशान्स्वराज्यमुपजग्मिवान् ॥६ संभाव्यमानश्च मुहुरुपदाभिरनेकशः । नानाजनपदैस्तूर्णमयोध्यां समुपागमत् ॥१० तदागमनमाज्ञाय नागरः सकलो जनः । नगरीं तामलंचक्रे महोत्सवसमुत्सुकः ॥११ ततः स नगरी सर्वा कृतकौतुकमंगला । सिक्तसंमृष्टभूभागा पूर्णकुम्भशतावृता ॥१२ समुच्छ्रितध्वजशता पताकाभिरलंकृता । सर्वत्रागरुधूपाढ्या विचित्रकुसुमोज्ज्वला ॥१३ सद्रत्नतोरणोत्तुंगगोपुराट्टालभूषिता । प्रसूनलाजवर्षैश्च स्वलंकृतमहापथा ॥१४

इसके उपरान्त उन नृपों को अपने राज्य पर स्थित बने रहने का आदेश देकर तथा सम्मान प्रदान करके कि वे अपने अनुगों के साथ अनुयायी रहें राजा ने प्रस्थान किया था इसके पश्चात् स्कन्धावार से संयुत उसने महान सैन्य के साथ सब देशों को पीड़ित करते हुए अन्त में अपनी ही राजधानी में आकर प्राप्त हो गया था ।८-६। उस राजा का अनेक प्रकार की भेटों से बड़ा सत्कार अनेक जनपदों के द्वारा किया गया था और फिर वह शीघ्र ही अयोध्या में आ गया था ।१०। वहाँ पर समस्त नागरिक जनों को जब ज्ञात हुआ कि राजा अयोध्या में आ गये हैं तो सबने बड़ा महान् उत्सव किया था और बड़ी उत्सुकता के साथ उस अयोध्यापुरी को सजाया था ।११। फिर वह समग्र नगरी माङ्गलिक कौतुकों से समलंकृत हुई थी। उसकी समस्त भूमि पर स्वच्छता हुई थी और छिड़काव किया गया था तथा जहाँ-तहाँ सैकड़ों ही पूर्ण कुम्भ स्थापित किये गये थे ।१२। उसमें सैकड़ों ध्वजाएं फहराई गयी थीं तथा अनेक पताकाओं से वह विभूषित बनायी गयी थी । वहाँ पर सभी अगरु की धूपों की महक हो रही थी एवं

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