संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसगर की दिग्विजय ] [ ४०३
नाना भाँति के सुन्दर सुमनों की मालाओं से वह समुज्ज्वल बनायी गयी थीं ।१३। अच्छे-अच्छे रत्नों के द्वारा निर्मित तोरण वन्दनवारें लगायी गयी थी तथा ऊँचे-ऊँचे गोपुर और अट्टालिकाओं से वह परम भूषित थी जो महापथ थे उनमें पुष्पों और लाजाओं की वर्षा की थी जिससे वे बहुत ही सुन्दर एवं सुशोभित हो रहे थे ।१४।
महोत्सवसमायुक्ता प्रतिगेहमभूत्पुरी ।
संपूजिताशेषवास्तुदेवतागृहमालिनी ॥१५
दिक्चक्रजयिनो राज्ञः संदर्शनमुदान्वितैः ।
पौरजानपदैर्हृष्टैः सर्वतः समलंकृता ॥१६
ततः प्रकृतयः सर्वे तर्थातः पुरवासिनः ।
वारकांताकदंबैश्च नगरीभिश्च संवृताः ॥१७
अभ्याययुस्ततः सर्वे समेत्य पुरवासिनः ।
स तैः समेत्य नृपतिर्लब्धाशीर्वादसत्क्रियः ॥१८
बधिरीकृतदिक्चक्रो जयशब्देन भूरिणा ।
नानावादित्रसंघोषमिश्रेण मधुरेण च ॥१९
सत्कृत्य तान्यथायोगं सहितस्तैर्मुदान्वितैः ।
आनंदयन्प्रजाः सर्वाः प्रविवेश पुरोत्तमम् ॥२०
वेदघोषैः सुमधुरैर्ब्राह्मणैरभिनन्दितः ।
संस्तूयमानः सुभृशं सूतमागधवंदिभिः ॥२१
उस समय से अयोध्या पुरी में महान् उल्लास छाया हुआ था तथा प्रत्येक घर में महोत्सव मनाया जा रहा था । वहाँ पर सभी गृहों की पंक्तियों में भलीभाँति समस्त वास्तु देवताओं का पूजन किया गया था ।१५। दिग्विजय करने वाले चक्रवर्ती राजा सगर के दर्शन करने के आनन्द से युक्त नागरिक और देशवासी बहुत ही प्रसन्न थे और इनसे सभी ओर वह पुरी समलंकृत थी ।१६। फिर वहाँ पर सभी प्रकृतियाँ तथा अन्तःपुर के निवासी परम प्रसन्न थे और वार कान्ताओं के समुदायों से और नगरियों से संवृत थी । अर्थात् बहुत सी नर्तिका वेश्या से भी एकत्रित थीं ।१७। इसके पश्चात् सभी पुरवासी इकट्ठे होकर वहाँ पर आ गये थे और सबने एकत्रित होकर उस राजा को सत्कृत किया था तथा आशीर्वादों से मुदित किया था ।१८।