संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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उस समय में जयजयकार की समुच्च ध्वनि से सभी दिशाएं बधिर हो गयी थीं अर्थात् जयघोष में कहीं पर भी कुछ भी सुनायी नहीं दे रहा था। वहाँ पर बहुत से प्रकार के वाद्य बज रहे थे उनकी भी ध्वनि बहुत मधुर उसी जयघोष में मिल रही थी ।१९। राजा ने भी उन समस्त स्वागत करने वालों का योग्यता के अनुसार सत्कार किया था जिससे उनको भी परमाधिक हर्ष हो रहा था। इन प्रसन्न पुर वासियों के ही साथ में समस्त प्रजाजनों को आनन्दित करते हुए राजा ने पुर में प्रवेश किया था ।२०। उस समय में ब्राह्मणों ने भी परम मधुर वेद के मन्त्रों की ध्वनि से राजा का अभिनन्दन किया था। तथा सूत-मागध और वन्दियों के द्वारा उस शुभ समागमन के समय में राजा का संस्तवन किया जा रहा था ।२१।
जयशब्दैश्च परितो नानाजनपदेरितैः ।
करतालरचोन्मिश्रवीणावेणुतलस्वनैः ॥२२
गायद्भिर्गायकजनैर्नृत्यद्भिर्गणिकाजनैः ।
अन्वीयमानो विलसच्छ्वेतच्छत्रविराजितः ॥२३
विकीर्यमाणः परितः सहलाजकुसुमोत्करैः ।
पुरीमयोध्यामविशत्स्वपुरोमिव वासवः ॥२४
दृष्टिपूतेन गन्धेन ब्राह्मणानां च वर्त्मना ।
जगाम मध्येनगरं गृहं श्रीमदलंकृतम् ॥२५
अवरुह्य ततो यानाद्भार्याभ्यां सहितो मुदा ।
प्रविवेश गृहं मातुर्हृष्टपुष्टजनायुतम् ॥२६
पर्यंकस्थामुपामग्य मातरं विनयान्वितः ।
तत्पादौ संस्पृशन्मूर्ध्ना प्रणाममकरोत्तदा ॥२७
साभिनन्द्य तमाशीर्भिर्हर्षगद्गदया गिरा ।
ससंभ्रमं समुत्थाय पर्यष्वजत चात्मजम् ॥२८
उस नृपति के दोनों ओर अनेक जनपदों के द्वारा कहे गये जयजयकार का घोष हो रहा था और करताल—की ध्वनि से मिले हुए वीणा और वेणु के मधुर स्वर निकल रहे थे ।२२। राजा के पीछे-पीछे गान करने वाले गान कर रहे थे और गणिकाएं नृत्य करती हुई चली जा रही थीं। राजा के