संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसगर की दिग्विजय ] [ ४०५
ऊपर श्वेत छत्र लगा हुआ था ॥२३॥ राजा के ऊपर लाजा और पुष्पों की वर्षा की जा रही थी । इस रीति से राजा ने अपनी पुरी अयोध्या में महेन्द्र-देव जिस तरह से इन्द्रपुरी में गमन कर रहे हों उसी भांति प्रवेश किया था ॥२४॥ दृष्टिपूत गन्ध से युक्त ब्राह्मणों के मार्ग से नगर के मध्य में जो भी सम्पन्न एवं अलंकृत गृह था उसमें राजा ने गमन किया था ॥२५॥ फिर अपनी दोनों भार्याओं के साथ प्रसन्नता से यान से नीचे उतर कर अपनी माताश्री के घर में राजा ने प्रवेश किया था जहाँ पर सहस्रों परम हृष्ट-पुष्ट जन विद्यमान थे ॥२६॥ उनकी माताजी एक पर्यङ्क पर विराजमान थीं उनके समीप में परम विनय से युक्त होकर उस समय में उनके चरणों का स्पर्श करके माथा टेककर प्रणाम किया था ॥२७॥ माताजी ने भी शुभाशीर्वाद देकर उसका अभिनन्दन किया था और फिर अत्यधिक हर्ष से गद्गद वाणी के द्वारा बड़े ही सम्भ्रम के साथ उठकर अपने परम प्रिय पुत्र को छाती से लगाकर परिष्वन किया था ॥२८॥
सहर्षं बहुधाशीर्भिरभ्यनंदद्शुभे स्नुषे । स तां संभाव्य कथया तत्र स्थित्वा चिरादिव ॥२९॥ अनुज्ञातस्तया राजा निश्चक्राम तदालयात् । ततः सानुचरो राजा श्वेतव्यजनवीजितः ॥३०॥ सुरराज इव श्रीमान्सभां समगमच्छनैः । संप्रविश्य सभां दिव्यामनेकनृपसेविताम् ॥३१॥ नत्वा गुरुजनं सर्वमाशीर्भिश्चाभिनंदितः । सिंहासने शुभे दिव्ये निषसाद नरेश्वरः ॥३२॥ संसेव्यमानश्च नृपैर्नानाजनपदेश्वरैः । नानाविधाः कथाः कुर्वंस्तत्र नृपसत्तमः ॥३३॥ संप्रीयमाणं सुतरामुवास सह बंधुभिः । प्रतिज्ञां पालयित्वैवं जितदिङ्मण्डलो नृपः ॥३४॥ अन्वतिष्ठद्यथान्यायमर्थत्रयमुदारधीः । स्वप्रभावजिताशेषवैरिदिङ्मण्डलाधिपः ॥३५॥
इसके अनन्तर जो परम सुन्दर दो पुत्र वधुएं साथ में ही समुपस्थित हुई थीं उनको भी बहुत आशीर्वादों से माताजी ने अभिनन्दित किया था।