संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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फिर राजा ने अपनी सब सुन कर कुछ काल पर्यन्त वहाँ पर स्थिति की थी ।२६। फिर माताजी से अनुज्ञा प्राप्त करके राजा उनके घर से बाहिर निकल आये थे और इसके अनन्तर अनुचरों के सहित वहाँ से गमन कर रहे थे और श्वेत व्यजनों के द्वारा सेवकगण उनकी हवा करते जा रहे थे ।३०। देवराज इन्द्र के ही समान श्री सम्पन्न राजा धीरे-धीरे अपनी सभा के मण्डप में समागत हो गये थे । राजा ने अनेक अधीन नृपों से संसेवित परम दिव्य सभा में प्रवेश किया था ।३१। सर्व प्रथम वहाँ पर जो गुरुजन विराजमान थे उनको प्रणाम किया था और उनके द्वारा दिये हुए आशीर्वाद प्राप्त कर अभिनन्दित हुए थे । फिर नरेश्वर ने परम शुभ एवं अतीव दिव्य सिंहासन पर अपनी संस्थिति की थी ।३२। वहाँ पर अनेक जनपदों के स्वामी नृपों के द्वारा वह भली-भाँति सेव्यमान हुए थे और अनेक प्रकार की उस श्रेष्ठ नृप ने वहाँ पर कथालाप किया था ।३३। इस तरह से बन्धुओं के साथ सुतरां परम प्रसन्नता प्राप्त करते हुए वहाँ पर निवास किया था । इस रीति से नृप ने समस्त दिशाओं को जीतकर अपनी की हुई प्रतिज्ञा का पालन किया था ।३४। न्याय के अनुसार उस उदार बुद्धि वाले नृप ने तीनों धर्म-अर्थ और काम को प्राप्त किया था । उस राजा का प्रभाव ही ऐसा था कि जिसके द्वारा विविध एवं समस्त दिशाओं के मण्डल के स्वामियों को पराजित कर दिया था ।३५।
एकातपत्रां पृथिवीमन्वशासद्वृषो यथा । स्वर्यातस्य पितुः पूर्वं परिभावममर्षितः ।।३६ स यां प्रतिज्ञामारूढस्तां सम्यक्परिपूर्य च । सप्तद्वीपाब्धिनगरग्रामायतनमालिनीम् ।।३७ जित्वा शत्रूनशेषेण पालयामास मेदिनीम् । एवं गच्छति काले च वसिष्ठो भगवानृषिः ।।३८ अभ्याजगाम तं भूयो द्रष्टुकामो जनेश्वरम् । तमायांतमति क्ष्य मुनिवर्यं ससंभ्रमः ।।३६ प्रत्युज्जगामार्घ्यहस्तः सहितस्तंनृपैनृपः । अर्घ्यपाद्यादिभिः सम्यक्पूजयित्वा महामतिः ।।४० प्रणाममकरोत्तस्मै गुरुभक्तिसमन्वितमः ।