संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसगर की दिग्विजय ] [ ४०७
आशीभिर्वर्द्धयित्वा तं वसिष्ठः सगरं तदा ॥४१॥ आस्यतामिति होवाच सह सर्वैर्नरेश्वरैः । उपाविशत्ततो राजा कांचने परमासने ॥४२॥
स्वर्ग में गये हुए पिताजी के पूर्व में परिभव से यह सगर अत्यन्त क्रुद्ध हुए थे और फिर दिग्विजय करके एक छत्र समग्र वसुधा पर इसने अनुशासन किया था। ३६। उसने जिस प्रतिज्ञा को किया था उसको अच्छी तरह परिपूर्ण करके ही छोड़ा था। समस्त शत्रुओं को जीतकर सातों द्वीप और सागर से युक्त नगर-ग्राम और आयतनों की माला मेदिनी का पालन किया था। इस रीति से जब कुछ काल व्यतीत हो गया था तब भगवान् वसिष्ठ ऋषि ने वहाँ पर पदार्पण किया था। ३७-३८। उस राजा को पुनः देखने की कामना वाले ऋषि वहाँ पर समागत हुए थे। जैसे ही वहाँ पर पदार्पण करते हुए ऋषि का अवलोकन राजा ने किया था वैसे ही सम्भ्रम के साथ राजा ने अपने हाथों में अर्घ-सामग्री ग्रहण कर तुरन्त ही उनका शुभागमन किया था उस समय में उसके साथ अन्य सभी नृप विद्यमान थे। महामति नृप ने अर्घा-पाद्य आदि समग्र उपचारों से भली भाँति उन ऋषि-वर का अर्चन किया था। ३६-४०। गुरुदेव की भक्ति से युक्त होकर उनको प्रणाम किया था। उस समय में वसिष्ठ जी ने भी आशीर्वचनों से सगर का वर्धन किया था। ४१। मुनि ने राजा को आज्ञा दी थी कि आठ बैठ जाइए तब फिर सब नृपों के सहित राजा सुवर्ण निर्मित आसन पर उपविष्ट हो गये थे। ४२।
मुनिना समनुज्ञातः सभार्य सह राजभिः । आगतस्तु नृपश्रेष्ठमुपासीनमुपह्वरे ॥४३॥ उवाच शृण्वतां राज्ञां शनैमृद्वक्षरं वचः । वसिष्ठ उवाच- कुशलं ननु ते राजन्बाह्येष्वाभ्यंतरेषु च ॥४४॥ मंत्रिष्वमात्यवर्गेषु राज्ये वा सकलेऽधुना । दिष्ट्या च विजिताः सर्वे समग्रबलवाहनाः ॥४५॥ अयत्नेनैव युद्धेषु भवता रिपवो हि यत् । दिष्ट्यारूढप्रतिज्ञेन मम मानयता वचः ॥४६॥ अरयस्त्यक्तधर्म्माणस्त्वया जीवविसर्जिताः ।