संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४०८ ] [ ब्रह्माण्डपुराण
तान्विजित्येतराञ्जेतुं पुनर्दग्विजयच्छयो ॥ ४७ ॥
गतस्सवाहनबलस्त्वेवमित्यशृणवं वचः।
जितदिङ्मण्डलं भूयः श्रुत्वा त्वां नगरस्थितम् ॥ ४८ ॥
प्रीत्याहमागतो द्रष्टुमिदानीं राजसत्तम।
जैमिनिरुवाच—
वसिष्ठनैवमुक्तस्तु सगरस्तालजंघजित् ॥ ४९ ॥
जब मुनिवर ने अपनी आज्ञा प्रदान की थी तो नृप भार्याओं तथा अधीन नृपों के सहित मुनि के ही समीप में नीचे की ओर उपासीन हो गये थे। वहाँ पर समस्त नृपों का समुदाय श्रवण कर रहा था तभी मुनिवर ने धीरे से कोमल कान्त वचन राजा से कहे थे। वसिष्ठजी ने कहा—हे राजन्! बाहिर-भीतर सर्वत्र कुशल-क्षेम तो है न ? ॥४४॥ समस्त मन्त्रियों में, अमात्यवर्गों में अथवा समग्र राज्य में इस समय कुशल तो है न? यह तो परम हर्ष की बात है कि आपने युद्धों में सेना और वाहनों के सहित सब अपने शत्रुओं को बिना ही किसी प्रयत्न के बहुत ही साधारण कर्मों द्वारा पराजित कर दिया है। मुझे बड़ी प्रसन्नता इसकी है कि अपनी प्रतिज्ञा पर समारूढ़ होते हुए भी आपने मेरे कथित वचनों को मान लिया है ॥४५-४६॥ आपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करके उनको समस्त धर्मों का त्याग कर देने वाले बना कर जीवित ही रहने वाले छोड़ दिये हैं। इस रीति से उन सबको जीत कर आप अन्यों को पराजित करने के वास्ते आप दिग्विजय करने की इच्छा से सेना और वाहनों से संयुत होकर गये हैं—यह भी वचन मैंने सुन लिया है। फिर मैंने यह श्रवण किया है कि आप दिग्विजय करके वापिस लौट आये हैं और अपने ही नगर में इस समय समवस्थित हैं ॥४७-४८। हे परम श्रेष्ठ राजन् ! इस वर्तमान काल में प्रीति से ही आपसे मिलने के ही लिये यहाँ पर समागत हुआ हूँ। जैमिनि मुनि ने कहा—महामुनीन्द्र वसिष्ठ जी ने जब इस रीति से कहा था तो तालजङ्घ पर विजय पाने वाले राजा सगर ने उनसे निवेदन किया था ॥४९॥
कृतांजलिपुटो भूत्वा प्रत्युवाच महामुनिम् ।
सगर उवाच—
कुशलं ननु सर्वत्र महर्षे नात्र संशयः ॥ ५० ॥
कल्याणाभिमुखाः सर्वे देवताश्च मुनेऽनिशम् ।
भवान्ध्यायति कल्याणं मनसा यस्य संततम् ॥ ५१ ॥