संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसगर की दिग्विजय ] [ ४०६
तस्य मे चोपसर्गश्च संभवंतिकथं मुने।
भवताऽनुगृहीतोऽस्मि कृतार्थश्चाधुना कृतः ॥५२
यन्मां द्रष्टुमिहायातः स्वयमेव भवान्गुरो।
यन्मह्यमाह भगवान्विपक्षविजयादिकम् ॥५३
तत्तथाऽनुष्ठितं किन्तु सर्वं भवदनुग्रहात् ।
भवत्प्रसादतः सर्वं मन्ये प्राप्तं महीक्षिताम् ॥५४
अन्यथा मम का शक्तिः शत्रून्हंतुं तथाविधान् ।
अनल्पी कुरुते फल्यं यन्मे व्यवसितं भवान् ॥५५
फलमल्पमपि प्रीतये स्यादगस्याधिरोपितुः।
जैमिनिरुवाच—
एवं संभावितः सम्यक्सगरेण महामुनिः ॥५६
दोनों हाथों को जोड़कर महामुनि को सगर ने उत्तर दिया था। सगर ने कहा—हे महर्षे ! मेरा सर्वत्र कुशल है—इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है ॥५०॥ जिस मुझ सेवक का निरन्तर ही आप जैसे महापुरुष कल्याण की कामना का ध्यान रखा करते हैं उस सेवक मेरे प्रति सभी देवगण कल्याणाभिमुख अर्थात् श्रेय करने वाले सदा ही रहा करते हैं ॥५१॥ हे मुने ! ऐसे मुझको उपद्रव कैसे हो सकते हैं। मैं तो आपके परमाधिक अनुग्रह का भाजन हो गया हूँ और अब अपने समस्त कार्यों में सफल भी बना दिया गया हूँ ॥५२॥ हे गुरुदेव ! आप जो स्वयं ही मुझको अपना दर्शन देने के लिए यहाँ पर पधारे हैं और जो आपने विपक्षियों पर विजय आदि प्राप्त करने की बातें मुझसे कही हैं ॥५३॥ यह सभी कुछ वैसा ही किया गया है किन्तु यह सब आपकी ही अनुकम्पा से हुआ है। मैं स्वयं ही इस बात को मानता हूँ कि शत्रु तथा अन्य नृपों पर जो भी मैंने विजय प्राप्त की है—यह सब आपके ही प्रसाद से ही हुआ है ॥५४॥ नहीं तो ऐसे-ऐसे प्रबल शत्रुओं का हनन कर पराजित करने की मेरे जैसे की क्या शक्ति है। जो भी मेरा व्यवसित है उसको सफल आप जैसे महान् पुरुष ही किया करते हैं ॥५५॥ अग अधिरोपिता का अनल्प भी फल प्रीति के लिए ही होता है। जैमिनी मुनि ने कहा—इस रीति से राजा सगर के द्वारा उन महामुनि का समादर किया गया था।