संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अभ्यनुज्ञाय तं भूपः प्रजगाम निजाश्रमम् । वसिष्ठे तु गते राजा सगरः प्रीतमानसः ॥५७ अयोध्यायामभवत्सन्प्रशशासाखिलां भुवम् । भार्याभ्यां समुपेताभ्यां रूपशीलगुणादिभिः ॥५८ बुभुजे विषयान्ग्राम्यान्यथाकामं यथासुखम् । सुमतिकेशिनी चोभे विकसद्वदनांबुजे ॥५९ रूपौदार्यगुणोपेते पीनवृत्तपयोधरे । नील कुंचितकेशाढ्ये सर्वाभरणभूषिते ॥६० सर्वलक्षणसंपन्ने नवयौवनगोचरे । प्रिये सन्निहिते तस्य नित्यं प्रियहिते रते ॥६१ स्वाचारभावचेष्टाभिर्जह्रतुस्तुस्तन्मनोऽनिशम् । स चापि भरणोत्कर्ष प्रतीतात्मा महीपतिः ॥६२
फिर वह मुनि नृप सगर से आज्ञा ग्रहण करके अपने आश्रम को चले गये थे। वसिष्ठ मुनि के गमन कर जाने पर राजा के मन में परम हर्ष हुआ था ।५७। वह राजा फिर अयोध्या पुरी अपनी राजधानी में निवास करता था और उसने समस्त भूमण्डल पर प्रशासन किया था। दोनों भार्याओं को भी अपने पास में रखता था जो रूप लावण्य, शील स्वभाव और गुण गण आदि से सुसम्पन्न थीं ।५८। उस राजा सगर ने ग्राम्य विषयों के सुख का पूर्ण अपनी इच्छा के अनुरूप ही उपभोग किया था। सुमति और केशिनी ये दोनों ही विकसित कमल के समान परम सुन्दर मुखों वाली थीं ।५९। सुन्दर स्वरूप के साथ-साथ इन दोनों पत्नियों में विशाल उदारता भी थी। इनके उरोज युग्म परिपुष्ट वृत्ताकार एवं समुन्नत थे। इनके केशपाश नील वर्ण के कुञ्चित अर्थात् छल्लेदार परम सुहावने थे। ये सभी आभरणों से विभूषित रहा करती थीं ।६०। नूतन यौवन के उद्गम में दिखलाई देने वाली नारियों में जो गुण गण हुआ करते हैं। उन सभी से ये दोनों रानियां सुसम्पन्न थीं। ये दोनों बहुत ही प्रिय थीं और सदा राजा के समीप में रहा करती थीं तथा नित्य ही अपने परम प्रिय स्वामी के हित कार्य में रति रखने वाली थीं ।६१। इन दोनों के अपने आचरण राजा के प्रति इतने सुन्दर थे वे अपने हाव-भाव और चेष्टाओं के द्वारा निरन्तर ही राजा के मन को अपनी ओर आकर्षित रखा करती थीं। वह राजा भी उन दोनों के भरण के उत्कर्ष से प्रसन्न मन वाला था ।६२।