संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसगर की दिग्विजय ] [ ४११
रममाणो यथाकामं सह ताभ्यां पुरेऽवसत् । अन्येषां भुवि राज्ञां तु राजशब्दो न चाप्यभूत् ॥६३ गुणेन चाभवत्तस्य सगरस्य महात्मनः । अल्पोऽपि धर्मः सततं यथा भवति मानसे ॥६४ राज्ञस्तस्यार्थकामौ तु न तथा विपुलावपि । अलुब्धमानसोऽर्थं च भेजे धर्ममपीडयन् ॥६५ तदर्थमेव राजेंद्र कामं चापीडयंस्तयोः ॥६६
वह राजा सगर उन दोनों अपनी परम प्रिय पत्नियों के साथ अपनी इच्छा के अनुसार रमण करता हुआ अपने नगर में निवास किया करता था। इस भूमि में अन्य राजा के लिए राजा—यह शब्द ही नहीं था। राजा का अर्थ होता जो राजित (शोभित) होता है। वह अर्थ इसी में घटित होता है। अन्य अर्थ यह भी है कि यही एक चक्रवर्ती राजा था ।६३। इस राजा में ही ऐसे गुण गण विद्यमान थे कि महान् आत्मा वाले इसके लिए ही राजा शब्द अन्वर्थ होता था। इसके मन ने अल्प भी धर्म निरन्तर रहा करता था ।६४। इस राजा में विशेष अधिक भी अर्थ और काम वैसे नहीं थे जो उसके मन को अधिक समासक्त कर सकें। इतना लुब्धक नहीं था कि अर्थ संग्रह में ही व्यस्त रहे। यह तो धर्म में कुछ भी बाधा न करके ही अर्थ का सेवन किया करता था। इसमें काम वासना भी उतनी ही थी कि हे राजेन्द्र ! जिससे दोनों पत्नियों को सर्वदा आप्यायित करता रहे ।६५-६६।
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॥ सगर का और्वाश्रम में आगमन ॥
जैमिनिरुवाच— एवं स राजा विधिवत्पालयामास मेदिनीम् । सप्तद्वीपवतीं सम्यक्साक्षाद्धर्म इवापरः ॥१ ब्राह्मणादींस्तथा वर्णांन्स्वेस्वे धर्मे पृथक्पृथक् । स्थापयित्वा यथान्यायं ररक्षाव्याहतेन्द्रियः ॥२ प्रजाश्च सर्ववर्णेषु यथाश्रेष्ठानुवर्तिनः । वर्णांश्चैवानुलोम्येन तद्वदर्थेषु च क्रमात् ॥३