संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
न सति स्थविरे बालं मृत्युरभ्युपगच्छति । सर्ववर्णेषु भूपाले महीं तस्मिन्प्रशासति ॥४ स्फीतान्यपेतबाधानि तदा राष्ट्राणि कृत्स्नशः । तेष्वसंख्या जनपदाश्चातुर्वर्ण्यजनावृताः ॥५ ते चासंख्यगृहग्रामशतोपेता विभागशः । देशाश्चावासभूयिष्ठा नृपे तस्मिन्प्रशासति ॥६ अनाश्रमी द्विजः कश्चिन्न बभूव तदा भुवि । प्रजानां सर्ववर्णेषु प्रारंभाः फलदायिनः ॥७
जैमिनि मुनि ने कहा—उस राजा ने सात द्वीपों वाली मेदिनी का विधि के साथ परिपालन साक्षात् दूसरे मूर्तिमान् धर्म के ही समान किया था ॥१॥ अव्याहत इन्द्रियों वाले उस नृप सगर ने न्यायानुरूप ब्राह्मण आदि चारों वर्णों को अपने-अपने धर्म में पृथक्-पृथक् स्थापित कर दिया था ॥२॥ सब ही वर्णों में जो भी प्रजाजन थे वे उचित रीति से अपने से श्रेष्ठों के अनुवर्त्तन करने वाले थे। जो वर्ण आनुलोम्य से हुए थे उनकी भी उसी भाँति कार्यों में क्रम से लगा दिया था। उच्च वर्ण वाले से नीचे वर्ण वाली स्त्री में जो समुत्पन्न होते हैं वे अनुलोम सृष्टि वाले होते हैं। इसके विपरीत क्षत्रिय से ब्राह्मणी आदि में समुत्पन्ने विलोम हैं, जिसका शास्त्र में सर्वथा निषेध है ॥३॥ वृद्ध माता-पिता के जीवित रहने पर उस नृप के राज्य में बालक की मृत्यु नहीं हुआ करती थी। यह बात उस महीपति के शासन करने पर सभी वर्णों में हुआ करती थी ॥४॥ उस समय में राष्ट्र पूर्णतया बाधा रहित और स्फीत अर्थात् विस्तृत थे। उन राष्ट्रों में अगणित जनपद थे जिनमें चारों वर्णों के मानव रहा करते थे ॥५॥ उस नृप के प्रशासन करने पर सभी देशों में बहुत अधिक आवास गृह थे तथा विभक्त रूप से संख्या रहित सैकड़ों ही गृह और ग्राम थे ॥६॥ वह ऐसा समय था कि इस भू मण्डल में कोई भी द्विज ऐसा नहीं था जिसका कोई आश्रम न होवे। ब्रह्मचर्य—गार्हस्थ्य—वानप्रस्थ और संन्यास ये चार ही आश्रम थे। सभी वर्णों की प्रजाओं में जो भी आरम्भ होते हैं वे सभी निष्फल न होकर फल देने वाले हुआ करते थे ॥७॥
स्वोचितान्येव कर्माणि प्रारभंत च मानवाः । पुरुषार्थोपपन्नानि कर्माणि च तदा नृणाम् ॥८