भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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सगर का और्वाश्रम में आगमन ] [ ४१३

महोत्सवसमुद्युक्ताः पुरग्रामव्रजाकराः । अन्योन्यप्रियकामाश्च राजभक्तिसमन्विताः ॥८ न निन्दितोऽभिशस्तो वा दरिद्रो व्याधितोऽपि वा । प्रजासु कश्चिल्लुब्धो वा कृपणो वापि नाभवेत् ॥९ जनाः परगुणप्रीताः स्वसम्पर्काभिकाङ्क्षिणः । गुरुषु प्रणता नित्यं सविद्याव्यसनेदृताः ॥११ परपवादभीताश्च स्वदाररतयोऽनिशम् । निसर्गतः खलसंसर्गविरता धर्मतत्पराः ॥१२ आस्तिकाः सर्वशोऽभवन् प्रजास्तस्मिन्प्रशासति । एवं सुबाहुतनये स्वप्रतापार्जितां महीम् ॥१३ ऋतवश्च महाभाग यथाकालानुवर्तिनः । शालिभूयिष्ठसस्याढ्या सदैव सकला मही ॥१४

सभी मानव उस शासन में अपने जो भी समुचित कर्म थे उन्हीं का प्रारम्भ किया करते थे। उस काल में मानवों के सभी कर्म पुरुषार्थ से समुत्पन्न हुआ करते थे ।८। नगर-ग्राम-व्रज और आकर सब महोत्सवों से समुद्युक्त थे। उनमें सभी मानव परस्पर में एक दूसरे के प्रिय करने की कामना वाले थे और सबके मनों में अपने राजा के प्रति भक्ति की भावना विद्यमान रहा करती थी ।८। उस समय में प्रजाओं में कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं दिखाई पड़ता था कि जो निन्दित-अभिशस्त-दरिद्र-व्याधित लुब्धक अथवा कृपण होते। तात्पर्य यही है कि किसी भी प्रकार से हीनता या खिन्नता आदि नहीं थी ।९। उस काल में सभी जन ऐसे थे जो दूसरों के गुणों को देख या जानकर परम हर्षित हुआ करते थे तथा अपने से सम्पर्क करने की अभिकाङ्क्षा रखा करते थे, सभी मानव सद्विद्या के व्यसन से समाहृत और ज्ञान दाता गुरुजनों में उनकी नित्य ही प्रणत भावना रहा करती थी ।११। सभी जन दूसरों की बुराई से डरा करते थे—सब लोग निरन्तर अपनी ही स्त्री में रति रखने वाले थे अर्थात् पर स्त्री गामिता का नाम भी नहीं था। सबको स्वाभाविक रूप से खलों के संसर्ग से विरक्तता होती है और सभी धर्म में परायण रहा करते थे ।१२। उस धार्मिक नृप के शासन काल में सभी प्रजा सभी ओर आस्तिक अर्थात् परम प्रभु के अस्तित्व को मानने वाले थे। अपने प्रताप से अर्जित मही पर सबाय तनय के शासन में इस प्रकार के सब ऋतुएं हे महाभाग ! ठीक-ठीक समय पर अनुवर्त्तन