भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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४१४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

किया करती थीं और सम्पूर्ण भूमि सदा ही शाली और सस्य की बहुलता वाली थी । अर्थात् धान्य परिपूर्ण था ।१३-१४।

बभूव नृपशार्दूले तस्मिन् राज्यानि शासति ।।१५ यस्याष्टादशमंडलाधिपतिभिः सेवार्थमभ्यागतैः प्रख्यातोरुपराक्रमेनृपशतैर्मूर्द्धाभिषिक्तैः पृथक् । संविष्टैर्मणिविष्टरेषु नितरामध्यास्यमानाऽमरैः शक्रस्येव विराजते दिवि सभा रत्नप्रभोद्भासिता ।।१६ संकेतादपयांतराभ्युपगमाः सर्वेऽपि सोपायनाः कृत्वा सैन्यनिवेशनानि परितः पुर्याः पृथक् पार्थिवाः । द्रष्टुं कांक्षितराजकाः सतनया विज्ञापयंतो मुहु- र्द्वास्थैरेव नरेश्वराय सुचिरं वत्स्यन्तमन्तः पुरं ।।१७ नमन्नरेंद्रमुकुटश्रेणीनामतिघर्षणात । किणीकृतौ विराजते चरणौ तस्य भूभुजः ।।१८ सेवागतनरेंद्रौघविनिकीर्णैः समंततः । रत्नैर्भांति सभा तस्य गुहा सोमे रवी यथा ।।१९ एवं स राजा धर्मेण भानुवंशशिखामणिः । अनन्यशासनामूर्वीमन्वशासदरिंदमः ।।२० इत्थं पालयतः पृथ्वीं सगरस्य महीपतेः । न चापपात मृत पुत्रमुखालोकनजृंभिता ।।२१

जब यह राजशार्दूल इस भूमि पर शासन कर रहा था उस समय में भूमि धान्योत्पत्ति करके सबको सुखी करता था ।१५। उस राजा की सभा रत्नों की प्रभा से उद्भासित स्वर्ग में इन्द्र की सभा के ही समान शोभा दे रही थी जिसमें अठारह मण्डलों की अधिपति राजा की सेवा के लिये समागत हुए विद्यमान थे । इनके अतिरिक्त मूर्द्धाभिषिक्त सैकड़ों ही नृप पृथक् विराजमान थे जिनके विशाल पराक्रम प्रख्यात थे—जिस सभा में मणि मण्डित आसनों पर नृपगण ऐसे ही संस्थित थे जैसे देवगण निरन्तर इन्द्र देवकी सभा में समवस्थित रहा करते हैं ।१६। वे सभी नृप सङ्केत से ही अन्य विषयों का ज्ञान प्राप्त कर लेने वाले अपने-अपने उपायनों को साथ में लिये हुए थे और उन पार्थिवों ने उस पुरी के चारों ओर अपनी सेनाओं का पृथक् निवेशन कर दिया था । राजा सगर उस समय में अन्तःपुर में थे तो ये नृप गण अपने पुत्रों के सहित राजा के दर्शन करने की इच्छा वाले थे