संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसगर का और्वाश्रम में आगमन ] [ ४१५
और द्वार पर स्थित द्वारपालों के द्वारा बारम्बार बहुत काल पर्यन्त राजा को विज्ञापन करते हुए स्थित थे ।१७। उस राजा सगर के चरण युग्म समागत नृपों के मस्तक झुकाने से उनके मुकुटों से रत्नों की अतिवृष्टि होने से किणीकृत हो गये थे अर्थात् रत्नों के कण उन पर बिखरे हुए थे जिससे एक अद्भुत शोभा हो रही थी ।१८। नृप की सेवा करने के लिए जो नृपों का समुदाय वहाँ पर समागत हुआ था उनके द्वारा सभी ओर बिखर गये रत्नों से उस सगर की सभा ऐसी शोभित हो रही थी जैसे चन्द्र और सूर्य के प्रकाश में गुहा विभात हुआ करती है ।१९। इस रीति से अरियों का दमन करने वाला सूर्य वंश का शिरोमणि वह नृप धर्म से इस भूमि का जो किसी भी अन्य के शासन में न होकर इसी नृप के प्रशासन में थी शासन किया करता था ।२०। इस प्रकार से पृथ्वी के पालन करने वाले राजा सगर की उत्कंठा अपने एक पुत्र के मुख का अवलोकन करने की हुई थी क्यों कि उसके कोई भी पुत्र उत्पन्न नहीं हुआ था ।२१।
विना तां दुःखितोऽत्यर्थं चिंतयामास नैकधा ।
अहो कष्टपुत्रोऽहमस्मिन्वंशे ध्रुवं तु यत् ।।२२
प्रयांति नूनमस्माकं पितरः पिंडविप्लवम् ।
निरयादपि सत्पुत्रे संजाते पितरः किल ।।२३
प्रीत्या प्रयांति तद्गेहं जातकर्मक्रियोत्सुकाः ।
महता सुकृतेनापि संप्राप्तस्य दिवं किल ।।२४
अपुत्रस्यामराः स्वर्गे द्वारं नोद्घाटयंति हि ।
पिता तु लोकमुभयोः स्वर्लोकं तत्पितामहाः ।।२५
जेष्यंति किल सत्पुत्रे जाते वंशद्वयेऽपि च ।
अनपत्यतयाऽहं तु पुत्रिणां या भवेद्गतिः ।।२६
न तां प्राप्स्यामि वै नूनं सुदुर्लभतरा हि सा ।
पदादेंद्रात्किलाभिन्नमृद्धं राज्यमखंडितम् ।।२७
मम यत्तदपुण्यस्य याति निष्फलतामिह ।
इदं मत्पूर्वजैरेव सिंहासनमधिष्ठितम् ।।२८
पुत्रोत्पत्ति के बिना वह अत्यधिक दुःखित रहा करता था और अनेक प्रकार से उसने चिन्तन किया था । अहो ! बड़ा ही कष्ट है इस वंश में मैं बिना पुत्र वाला हूँ । यह परम ध्रुव है कि मैं बड़ा भाग्यहीन हूँ ।२२। निश्चय