भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

पृष्ठ 412, कुल 893 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 412

४१६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

ही हमारे पितृगण पिण्डदान के विप्लव को प्राप्त होंगे। यदि सत्पुत्र जन्म ग्रहण कर लेता है तो फिर वे नरक से भी निकल आया करते हैं। वे प्रीति से जातकर्म में समुत्सुक होकर उसके घर में प्रयाण किया करते हैं। यदि कोई महान् पुण्य उन्होंने किया हो तो उसके प्रभाव से वे स्वर्ग को प्राप्त होते हैं।२३-२४। किन्तु जिसके पुत्र नहीं होता है वह सुकृत के प्रभाव से स्वर्ग के द्वार तक ही पहुँच पाता है और फिर पुत्रहीन के लिए देवगण स्वर्ग का द्वार नहीं खोला करते हैं और अन्दर प्रवेश नहीं कर पाता है। पिता भी दोनों लोकों में और उसके पितामह स्वर्गलोक को दोनों वंशों में सत्पुत्र के समुत्पन्न होने पर ही जय प्राप्त करेंगे। मैं तो सन्तान हीन होने से पुत्र वालों की जो गति होती है उसको मैं निश्चय ही प्राप्त नहीं करूँगा क्योंकि पुत्रहीन के लिए वह गति अतीव दुर्लभ है। इन्द्र के पद से अभिन्न यह अखण्ड और समृद्ध राज्य भी व्यर्थ ही है। २५-२७। पुण्यहीन मेरा यह सब कुछ यहाँ पर निष्फलता को ही प्राप्त हो रहा है। यह राज्यासन जिस पर मेरे पूर्वज पुरुष विराजमान हुए थे, सब व्यर्थ ही है।२८।

अपुत्रत्वेन राज्यं च पराधीनत्वमेष्यति ।
तस्मादौर्वाश्रममहं मत्ख्यातं मुनिपुङ्गवम् ॥२९॥
प्रसादयिष्ये पुत्रार्थं भार्याभ्यां सहितोऽधुना ।
गत्वा तस्मै स्वपुत्रत्वं विनिवेद्य महात्मने ॥३०॥
स यद्वक्ष्यति तत्सर्वं करिष्ये नात्र संशयः ।
इति सञ्चिन्त्य मनसा सगरो राजसत्तमः ॥३१॥
इत्येष कृत्यविद्राजन्गन्तुमौर्वाश्रमं प्रति ।
स मन्त्रिप्रवरे राज्यं प्रतिष्ठाप्य ततो वनम् ॥३२॥
प्रययौ रथमारुह्य भार्याभ्यां सहितो मुदा ।
जगाम रथघोषेण मेघनादातिशङ्किभिः ॥३३॥
स्तब्धेक्षणैर्लक्ष्यमाणो मार्गोपान्ते शिखण्डिभिः ।
प्रियाभ्यां दर्शयन्नाजन्सारङ्गांस्तिमितेक्षणान् ॥३४॥
श्रृणमूर्ध्वमुखान्सद्यः पलायनपरान्पुनः ।
वृक्षान्पुष्पफलोपेतान्विलोक्य मुदितोऽभवत् ॥३५॥

जब मेरे कोई पुत्र ही नहीं है तो इस सिंहासन पर भविष्य में कौन बैठेगा। बड़े दुःख का विषय है यह भी आगे किसी दूसरे की ही अधीनता में चला जायेगा। इसलिए मैं अब और्व मुनि के समीप में जाकर उनसे ही