संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसगर का और्वाश्रम में आगमन ] [ ४१७
यह प्रार्थना करूँ ।२६। इस समय में दोनों अपनी पत्नियों के सहित वहाँ पहुँच कर उन महामुनि को प्रसन्न करूँगा । वे महान् आत्मा वाले महापुरुष हैं वहाँ जाकर अपने पुत्र हीनता के विषय में उनसे विशेष निवेदन करना ही उचित है ।३०। वे इसके लिए जो भी कुछ उपाय बतलायेंगे वह सभी मैं करूँगा इसमें तनिक भी संशय नहीं है । नृपश्रेष्ठ सगर ने ऐसा विचार अपने मन में किया था । हे राजन् ! इसलिए कृत्यों के ज्ञाता उस नृप सगर ने और्व महामुनि की सन्निधि में गमन करने का निश्चय कर लिया था । उसने जो परम श्रेष्ठ मन्त्री था उसको राज्य के प्रशासन का भार सौंपकर फिर वन में चल दिया था ।३१-३२। बड़ी प्रसन्नता से अपनी दोनों पत्नियों को साथ में लेकर रथ पर समारूढ़ हो गया था और वहाँ से चल दिया था । जिस समय में उसका रथ चला है उसका ऐसा महान घोष हुआ था कि मयूरों को मेघों की गर्जना की शंका हो गयी थी ।३३। मार्ग के समीप में मयूरों ने एकटक होकर उसको देखा था । राजा भी उन स्तिमित नेत्रों वाले मयूरों की ओर संकेत करके अपनी पत्नियों को उनकी इस तरह से दृष्टि करने को दिखाता जा रहा था ।३४। उन वन्य मयूरों ने एक क्षण तक तो ऊपर की ओर अपने मुख किये थे और फिर वे वहाँ से पलायन करने में तत्पर हो गये थे । राजा भी उस वन में विविध भाँति के पुष्पों से और फलों से लदे हुए वृक्षों को अवलोकित करके अत्यन्त प्रसन्न हुआ था ।३५।
अम्लानकुसुमैः स्वादुफलैः शाद्वलगर्भकैः ।
सुस्निग्धपल्लवच्छायैरभितः सम्भृतं नगैः ।।३६।।
चूताग्रपल्लवास्वादुस्निग्धकंठपिकारवैः ।
श्रोत्राभिरामजनकैस्सधुष्टं सर्वतो दिशम् ।।३७।।
सर्वर्तुकुसुमोपेतं भ्रमद्भ्रमरमण्डितम् ।
प्रसूनस्तवकानम्रवल्लरीवेल्लितद्रुमम् ।।३८।।
कपित्थसमाक्रान्तवनस्पतिशतैरावृतम् ।
उन्मत्तशिखिसारङ्गकूजत्पक्षिगणान्वितम् ।।३९।।
गायद्विद्याधरवधूगीतिकासुमनोहरम् ।
संचरत्किन्नरीद्वन्द्वविराजद्वृक्षगह्वरम् ।।४०।।
हंससारसचक्राव्हकारण्डवशूकादिभिः ।
सुस्वरंरावतोषांतःसरोभिः परिवारितम् ।।४१।।