संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
सगर का और्वाश्रम में आगमन ] [ ४१७
यह प्रार्थना करूँ ।२६। इस समय में दोनों अपनी पत्नियों के सहित वहाँ पहुँच कर उन महामुनि को प्रसन्न करूँगा । वे महान् आत्मा वाले महापुरुष हैं वहाँ जाकर अपने पुत्र हीनता के विषय में उनसे विशेष निवेदन करना ही उचित है ।३०। वे इसके लिए जो भी कुछ उपाय बतलायेंगे वह सभी मैं करूँगा इसमें तनिक भी संशय नहीं है । नृपश्रेष्ठ सगर ने ऐसा विचार अपने मन में किया था । हे राजन् ! इसलिए कृत्यों के ज्ञाता उस नृप सगर ने और्व महामुनि की सन्निधि में गमन करने का निश्चय कर लिया था । उसने जो परम श्रेष्ठ मन्त्री था उसको राज्य के प्रशासन का भार सौंपकर फिर वन में चल दिया था ।३१-३२। बड़ी प्रसन्नता से अपनी दोनों पत्नियों को साथ में लेकर रथ पर समारूढ़ हो गया था और वहाँ से चल दिया था । जिस समय में उसका रथ चला है उसका ऐसा महान घोष हुआ था कि मयूरों को मेघों की गर्जना की शंका हो गयी थी ।३३। मार्ग के समीप में मयूरों ने एकटक होकर उसको देखा था । राजा भी उन स्तिमित नेत्रों वाले मयूरों की ओर संकेत करके अपनी पत्नियों को उनकी इस तरह से दृष्टि करने को दिखाता जा रहा था ।३४। उन वन्य मयूरों ने एक क्षण तक तो ऊपर की ओर अपने मुख किये थे और फिर वे वहाँ से पलायन करने में तत्पर हो गये थे । राजा भी उस वन में विविध भाँति के पुष्पों से और फलों से लदे हुए वृक्षों को अवलोकित करके अत्यन्त प्रसन्न हुआ था ।३५।
अम्लानकुसुमैः स्वादुफलैः शाद्वलगर्भकैः ।
सुस्निग्धपल्लवच्छायैरभितः सम्भृतं नगैः ।।३६।।
चूताग्रपल्लवास्वादुस्निग्धकंठपिकारवैः ।
श्रोत्राभिरामजनकैस्सधुष्टं सर्वतो दिशम् ।।३७।।
सर्वर्तुकुसुमोपेतं भ्रमद्भ्रमरमण्डितम् ।
प्रसूनस्तवकानम्रवल्लरीवेल्लितद्रुमम् ।।३८।।
कपित्थसमाक्रान्तवनस्पतिशतैरावृतम् ।
उन्मत्तशिखिसारङ्गकूजत्पक्षिगणान्वितम् ।।३९।।
गायद्विद्याधरवधूगीतिकासुमनोहरम् ।
संचरत्किन्नरीद्वन्द्वविराजद्वृक्षगह्वरम् ।।४०।।
हंससारसचक्राव्हकारण्डवशूकादिभिः ।
सुस्वरंरावतोषांतःसरोभिः परिवारितम् ।।४१।।
४१८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराणं
सरः स्वम्बुजकह्लारकुमुदोत्पलराशिषु ।
शनैः परिवहन्मंदमारुतापूर्णदिङ्मुखम् ॥४२
वह अरण्य वृक्षों से घिरा हुआ था जिनमें अनेक अम्लान पुष्प थे—स्वादिष्ट फल थे और हरी-हरी घास वाली भूमि थी तथा बहुत घनी सुस्निग्ध पत्रों की छाया से सब वृक्ष संयुत थे ।३६। वहाँ पर सभी ओर कानों को श्रवण करने में परम प्रिय लगाने वाली आम्र वृक्षों के कोमल पत्रों के खाने से स्निग्ध कण्ठों वाली कोमलों की मधुर ध्वनि थी इससे वह वन संपुष्ट हो रहा था ।३७। उसमें सभी ऋतुओं के कुसुम खिल रहे थे जिन पर भ्रमर गुञ्जार करते हुए झूल रहे थे । बहुत सी लताएँ द्रुमों से लिपटी हुई थीं जो अपने ही प्रसूनों के गुच्छों के भार से नीचे की ओर झुक रही थीं ।३८। वह महारण्य ऐसा ही सुषमा सम्पन्न था कि वहाँ के वृक्षों पर सैकड़ों वानरों के झुण्ड बैठे हुए थे और उस वन में उन्मत्त शिखी-सारङ्ग भ्रमण कर रहे थे तथा पक्षियों का कल कूजन चहुँ ओर हो रहा था ।३६। उस वन में विद्याधरों की वधूटियां गीत गा रही थीं जिससे वह वन मन का हरण करने वाला हो रहा था । उस परम गहन वन में किन्नर-किन्नरियों के जोड़े सञ्चरण करते हुए शोभित हो रहे थे ।४०। उस वन में बहुत से सरोवर थे जिनसे चारों ओर वन घिरा हुआ था जिनका उपान्त सुस्वरों वाले हंस-सारस-चक्रवाक-कारण्डव और शुक आदि से समावृत हो रहा था ।४१। उन सरोवरों में कमल-कल्हार-कुमुद और उत्पल बहुत अधिक परिमाण में विकसित हो रहे थे । वहाँ पर मन्द मारुत के परिवहन से सभी दिशायें पूरित हो रही थीं ।४२।
एवंविधगुणोपेतमधिगाह्य तपोवनम् ।
गच्छन्रथेनाथ नृपः प्रहर्षं परमं ययौ ॥४३
उपशान्ताशयः सोऽथ संप्राप्याश्रममंडलम् ।
भार्याभ्यां सहितः श्रीमान्वाहादवरुरोह वै ॥४४
धुर्यान्विश्रामयेत्युक्त वा यंतारमवनीपतिः ।
आससादाश्रमोपांतं महर्षेर्भावितात्मनः ॥४५
स श्रुत्वा मुनिशिष्येभ्यः कृतनित्यक्रियादरम् ।
मुनि द्रष्टुं विनीतात्मा प्रविवेशाश्रमं तदा ॥४६
मुनिमध्ये समासीनमृषिवृन्दैः समन्वितम् ।
ननाम शिरसा राजा भार्याभ्यां सहितो मुदा ॥४७
सगर का और्वाश्रम में आगमन ] [ ४१६
कृतप्रणामं नृपतिमृषिर्बोर्वः प्रतापवान् । उपविशेति प्रेम्णा वै सह ताभ्यां समादिशत् ॥४८ अर्घ्यपाद्यादिभिः सम्यक्पूजयित्वा महामुनिः । आतिथ्येन च वन्येन सभार्यं तमतोषयत् ॥४९
इस प्रकार के गुणों से सुसम्पन्न उस तपोवन का अधिग़ाहन करके रथ के द्वारा गमन करते हुए नृप सगर को परमाधिक प्रसन्नता प्राप्त हुई थी ।४३। उपशान्त आश्रम के मण्डल में पहुँचकर फिर श्री सम्पन्न वह राजा अपने यान से नीचे उतर गया था ।४४। उस नृप ने सारथि से कहा था कि इन अश्वों को विश्राम करने दो और फिर भावितात्मा महर्षि के आश्रम के उपान्त में पहुँच गया था ।४५। उस राजा ने यह मुनि के शिष्यों से सुन लिया था कि मुनिवर नित्य क्रिया कर चुके हैं तभी उस विनीत आत्मा वाले नृप ने मुनि के दर्शन करने के लिए उस आश्रम में प्रवेश किया था ।४६। वे महामुनीन्द्र अनेक मुनियों के मध्य में विराजमान थे और चारों ओर ऋषियों के समुदाय वहाँ पर सन्निहित थे । उसी समय में राजा ने भार्याओं के साथ बड़ी ही प्रसन्नता से मुनिवर के चरणों में शिर झुकाकर प्रणाम किया था ।४७। जब राजा ने प्रणाम किया था तो प्रताप वाले और्व ऋषि ने बड़े ही प्रेम से दोनों पत्नियों के सहित उस नृप को ‘बैठ जाओ’ यह आज्ञा दी थी ।४८। तब महामुनि ने समागत उस अतिथि नृप का भारतीय संस्कृति की मर्यादानुसारिता से अर्घ्य पाद्य आदि से भली-भाँति अर्चन करके भार्याओं के सहित उस नृप को वन्य आतिथ्य सत्कार से भली-भाँति किया था ।४९।
अथातिथ्योपविश्रान्तं प्रणम्यासीनमग्रतः । राजानमब्रवीदौर्वः शनैर्मृद्वक्षरं वचः ॥५० कुशलं ननु ते राज्ये वाह्येष्वाभ्यंतरेषु च । अपि धर्मेण सकलाः प्रजास्त्वं परिरक्षसि ॥५१ अपि जेतुं त्रिवर्गं त्वमुपायैः सम्यगीहसे । फलंति हि गुणास्तुभ्यं त्वया सम्यक्प्रचोदिताः ॥५२ दिष्ट्या त्वया जिताः सर्वे रिपवो नृपसत्तम । दिष्ट्या च सकलं राज्यं त्वया धर्मेण रक्ष्यते ॥५३ धर्म एव स्थितिर्येषां तेषां नास्त्यथ विप्लवः । न तं रक्षति किं धर्मः स्वयं येनाभिरक्षितः ॥५४
४२० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
पूर्वमेवाहमश्रौषं विजित्य सकलां महीम्। सबलो नगरीं प्राप्तः कृतदारो भवानिति ॥५५॥ राज्ञां तु प्रवरो धर्मो यत्प्रजापरिपालनम्। भवंति सुखिनो नूनं तेनैवेह परत्र च ॥५६॥ स भवानाज्यभरणं परित्यज्य मदंतिकम्। भार्याभ्यां सहितो राजन्समायातोऽसि मे वद ॥५७॥ जैमिनिरुवाच- एवमुक्तस्तु मुनिना सगरो राजसत्तमः। कृतांजलिपुटो भूत्वा प्राह तं मधुरं वचः ॥५८॥
इसके अनन्तर आतिथ्य और विश्रान्ति हो जाने पर आगे विराजमान ऋषि को प्रणाम करने के पश्चात् और्व महामुनि ने राजा से धीरे-धीरे मृदु वचन कहे थे ।५०। हे राजन् ! आपके राज्य में बाहिर और भीतर सब प्रकार का कुशल-क्षेम तो है न ? और तो धर्मके साथ अपनी मस्तक प्रजा की सुरक्षा तो कर ही रहे हैं न ? ।५१। आप तीनों वर्गों को जीतने के लिए उपायों के द्वारा अच्छी तरह से अभिलाषा करते हैं न ? आपके द्वारा भली-भाँति प्रेरित गुण गण आपके लिये फल दिया ही करते हैं न ? ।५२। हे नृपश्रेष्ठ ! यह तो बड़े ही हर्ष की बात है कि आपने समस्त शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर ली है। यह भी बड़े ही प्रसन्नता है कि आप धर्म पूर्वक सम्पूर्ण राज्य की सुरक्षा किया करते हैं ।५३। जिनकी धर्म में ही स्थिति होती है उनको महालोक में कोई भी विप्लव नहीं हुआ करता है। जब वह धर्म जिसके द्वारा अभिरक्षित होता है तो क्या वह स्वयं ही उसकी रक्षा नहीं किया करता है ? अवश्य धर्म उसकी सुरक्षित होकर रक्षा करता है ।५४। यह तो पूर्व में ही सुन लिया था कि आपके सम्पूर्ण वसुन्धरा पर विजय प्राप्त करके अपने बल के साथ सपत्नीक अपनी नगरी में प्राप्त हो गये हैं ।५५। राजाओं का तो यही परमश्रेष्ठ धर्म होता है कि इनके द्वारा अपनी प्रजा का परिपालन किया जाता है। ऐसे ही नृप निश्चय ही इस लोक में और परलोक में सुखी हुआ करते हैं ।५६। तैसे राजा आप हैं फिर राज्य के भरण को त्याग करके इस समय में मेरे समीप में समागत हुए हैं और दोनों पत्नियों को भी साथ में लेकर आये हैं। राजन् ! क्या कारण है मुझे आप इस आगमन का जो भी कारण हो बतलाइये ।५७। जैमिनी मुनि ने कहा—उस मुनि के द्वारा इस रीति से राजा से पूछा था तो उस परम श्रेष्ठ नृप सगर ने दोनों करों को जोड़कर उनसे मधुर वचनों में निवेदन किया था ।५८।
४. द्वितीय खण्ड — भूमिका व उपोद्घातपाद (विस्तार)
ब्रह्माण्ड पुराण
(द्वितीय खण्ड)
(सरल भाषानुवाद सहित जनोपयोगी संस्करण)
सम्पादक:
डॉ० चमन लाल गौतम
रचयिता—प्राणायाम के असाधारण प्रयोग, ओंकार सिद्धि, मंत्र शक्ति से रोग निवारण, विपत्ति निवारण-कामना सिद्धि, श्रीमद्भागवत् सप्ताह कथा, योगासन से रोग निवारण, तन्त्र विज्ञान, तन्त्र रहस्य, मनुस्मृति, सूर्य पुराण, तंत्र महाविज्ञान, कालिका पुराण, मानसागरी आदि।
भूमिका
पुराणों में यही अन्तिम पुराण है। उच्च कोटि के पुराण में इसे महत्त्व-पूर्ण स्थान प्राप्त है। इसकी प्रशंसा में पुराणकार यहाँ तक चले गये कि उन्होंने इसे वेद के समान घोषित किया। इसका अभिप्राय यह हुआ कि पाठक जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए वेद का अध्ययन करता है, उस तरह की विषय सामग्री उसे यहाँ भी प्राप्त हो जाती है और वह जीवन को चतुर्मुखी बना सकता है।
इस पुराण के पठन-पाठन, मनन-चिन्तन और अध्ययन की परम्परा भी प्रशंसनीय है। गुरु ने अपने शिष्यों में से इसका ज्ञान अपने योग्यतम शिष्य को उसका पात्र समझ कर दिया ताकि इसकी परम्परा अबाध गति से निरन्तर चलती रहे। भगवान प्रजापति ने वसिष्ठ मुनि को, भगवान वसिष्ठ ऋषि ने परम पुण्यमय अमृत के सदृश इस तत्व ज्ञान को शक्ति के पुत्र अपने पौत्र पाराशर को दिया। प्राचीन काल में भगवान पाराशर ने इस परम दिव्य ज्ञान को जातूकर्ण्य ऋषि को, जातूकर्ण्य ऋषि ने परम संयमी द्वैपायन को पढ़ाया। द्वैपायन ऋषि ने श्रुति के समान इस अद्भुत पुराण को अपने पाँच शिष्यों जैमिनि, सुमन्तु, वैशम्पायन पेलव और लोमहर्षण को पढ़ाया। सूत परम विनम्र, धार्मिक और पवित्र थे। अतः उनको यह अद्भुत वृतान्त वाला पुराण पढ़ाया था। ऐसी मान्यता है कि सूतजी ने इस पुराण का श्रवण भगवान व्यास देव जी से किया था। इन परम ज्ञानी सूत जी ने ही नैमिषारण्य में महात्मा मुनियों को इस पुराण का प्रवचन किया था। वही ज्ञान आज हमारे सामने है।
पुराण का लक्षण है—सर्ग अर्थात् सृष्टि और प्रति सर्ग अर्थात् उस सृष्टि से होने वाली सृष्टि, वंशों का वर्णन, मन्वन्तर अर्थात् मनुओं का कथन। इसका तात्पर्य यह है कि कौन-कौन मनु किस-किस के पश्चात् हुए ! वंशों में होने वालों का चरित यह ही पाँचों बातों का होना पुराण का लक्षण है। यह सभी लक्षण इस पुराण में उपस्थित हैं। इसके चार पाद हैं-
( ६ )
प्रक्रिया, अनुषंग, उपोद्घात और उपसंहार। इन्हीं के द्वारा सम्पूर्ण वर्णन हुआ है।
इस पुराण के नामकरण का रहस्य है कि इसमें समस्त ब्रह्मांड का वर्णन है। भुवन कोष का उल्लेख तो सभी पुराणों में मिलता है परन्तु प्रस्तुत पुराण में सारे विश्व का सांगोपांग वर्णन उपलब्ध होता है। इसमें विश्व के भूगोल का विस्तृत व रोचक विवेचन है। इसमें ऐसी-ऐसी जानकारी मिलती है जिसे देखकर आश्चर्य होता है कि बिना वैज्ञानिक सहयोग के इतनी गहन खोज कैसे की होगी। वैज्ञानिक युग में अभी तक उसकी पुष्टि भी नहीं हो पायी है।
पुराण में स्वायम्भुव मनु के सर्ग व भारत आदि सब वर्षों की समस्त नदियों का वर्णन है। फिर सहस्रों द्वीपों के भेदों का सात द्वीपों में ही अन्तर्भाव हैं, जम्बूद्वीप और समुद्र के मण्डल का विस्तार से वर्णन है। पर्वतों का योजना-बद्ध उल्लेख है। जम्बूद्वीप आदि सात समुद्रों के द्वारा घिरे हुए हैं। सप्तद्वीप का प्रमाण सहित वर्णन है। सूर्य, चन्द्र और पृथ्वी को पूर्ण परिणाम बताया गया है। सूर्य की गति का भी उल्लेख है। ग्रहों की गति और परिमाण भी कहे गये हैं। इस तरह से विश्व के भूगोल का महत्वपूर्ण उल्लेख है।
वेद के सम्बन्ध में भी यह जानकारी उल्लेखनीय है कि विभु बुद्धिमान गीर्ण स्कन्ध ने सन्तान के हेतु से एक वेद के चार पाद किये थे और ईश्वर ने चार प्रकार से किया था। भगवान शिव के अनुग्रह से व्यास देव ने उसी भाँति भेद किया था। उस वेद की शिष्यों और प्रशिष्यों ने वेद की अयुत शाखाएं की थीं।
इस पुराण के विषय में एक विशेष बात यह है कि ईसवी सन् ५ की शताब्दी में इस पुराण को ब्राह्मण लोग जावा द्वीप ले गये थे। वहाँ की प्राचीन "कवि भाषा" में अनुवाद हुआ जो आज भी मिलता है। इससे इस पुराण की प्राचीनता का भी बोध होता है।
( ७ )
पुराणकार ने श्राद्ध के विषय को बड़े ही साङ्गोपाङ्ग रूप में, मुख्य तथा अवान्तर प्रभेदों के साथ दिया है। परशुराम की महिमा तथा गौरव का विवेचन असाधारण ढंग से किया गया है। परशुराम कार्तवीर्य हैहय के संघर्ष का बड़े विस्तार के साथ वर्णन है। परशुराम जी पहले महेन्द्र पर्वत (वर्तमान गंजम जिले में पूर्वी घाट की आरम्भिक पहाड़ी) पर तप करते थे। जब ये सारी पृथ्वी को दान में दे चुके तो अपने निवास के लिए उन्हें भूमि की आवश्यकता प्रतीत हुई। उन्होंने समुद्र से भूमि की याचना की जो सत्याद्रि तथा अरब सागर के बीच में संकरी भूमि है" यही चित्पावन ब्राह्मणों का मूल स्थल कोंकण है। परशुराम से प्रमुख रूप से सम्बन्धित होने के कारण इस पुराण का उदय-स्थल सत्यादि तथा गोदावरी प्रदेश में होना उपयुक्त दिखाई देता है।
राजाओं के जीवन चरित्र से पुराण का महत्व बढ़ा है। उनके गुण व अवगुण दोनों ही उजागर हुए हैं। उत्तानपाद राजा के पुत्र ध्रुव का चरित्र घोर संघर्ष से सफलता प्राप्त करने और दृढ़ सङ्कल्प से सिद्धि प्राप्त करने का प्रतीक है। चाक्षुष मनु के सर्ग का कथन भी उपयोगी है। राजा यदु और राजर्षि देव का वर्णन भो रोचक बन पड़ा है। राजा कंस की कथा से स्पष्ट है कि जब धर्म की हानि से अत्याचार चरम सीमा तक पहुँच जाते हैं तो उनसे निवृत्ति के लिए भगवान अवतरित होते हैं। राजा शान्तनु के पराक्रम के विवरण के साथ भविष्य में होने वाले राजाओं के उपसंहार का भी कथन दिया गया है जो एक आश्चर्य है। राजा सगर और राजा भगीरथ द्वारा गङ्गा का स्वर्गलोक से पृथ्वी लोक पर अवतरण घोर श्रम द्वारा असम्भव को सम्भव बनाने की लोक प्रिय गाथा है।
तपस्वी ऋषियों की गौरव गाथाएँ भी कम अनुकरणीय नहीं हैं। कश्यप, पुलस्त्य, अत्रि, पराशर की कथाएँ रोचक हैं। भार्गव चरित्र विस्तार से वर्णित है। महर्षि वासिष्ठ ज्ञान के और महर्षि विश्वामित्र सृजन के प्रतीक होते हैं।
( ८ )
चारों युगों के विस्तृत वर्णन से आश्चर्य तो होता ही है, साथ ही ऋषियों की प्रतिभा का भी आभास होता है। रौरव आदि नरकों के वर्णन से सभी प्राणियों के पापों के परिणामों का निर्णय किया गया है। इससे पाठक को अपने कर्मों की समीक्षा करके जीवन मार्ग को नये ढङ्ग से निर्धारित करने की प्रेरणा मिलती है।
पुराण को साहित्य की दृष्टि से भी उत्कृष्ट माना जाता है क्योंकि निबन्ध ग्रन्थों में इसके श्लोक दिखाई देते हैं। मिताक्षरा अपरार्क, स्मृति चन्द्रिका, कल्पतरु में इसके श्लोक उद्धृत किये गये हैं। इससे लगता है साहित्यकारों की दृष्टि में यह पुराण उच्च महत्व का है। कालिदास की रचनाओं का और उनकी वैदर्भी रीति का प्रभाव भी इस पुराण के विवेचन पर है। इतिहास कारों का मत है कि पुराण की रचना गुप्तोत्तर युग में अर्थात् ६०० ईस्वी में मानना उचित है।
—चमनलाल गौतम
ब्रह्माण्ड पुराण
(द्वितीय खण्ड)
॥ असमंजस का त्याग ॥
सगर उवाच-
कुशलं मम सर्वत्र महर्षे नात्र संशयः ।
यस्य मे त्वमनुध्याता शमं भार्गवसत्तमः ॥१
यस्तथा शिक्षितः पूर्वमस्त्रे शस्त्रे च सांप्रतम् ।
सोऽहं कथमशक्तः स्यां सकलारिविनिग्रहे ॥२
त्वं मे गुरुः सुहृद्दैवं बंधुमित्रं च केवलम् ।
न ह्यन्यमभिजानामि त्वामृते पितरं च मे ॥३
त्वयोपदिष्टेनास्त्रेण सकला भूभृतो मया ।
विजिता यदनुस्मृत्या शक्तिः सा तपसस्तव ॥४
तपसा त्वं जगत्सर्वं पुनासि परिपासि च ।
स्रष्टुं संहर्तुमपि च शक्नोष्वेव न संशयः ॥५
महाननन्यसामान्यप्रभावस्तपसश्च ते ।
इह तस्यैकदेशोऽपि दृश्यते विस्मयप्रदः ॥६
पश्य सिंहासने बाल्यादुपैत्य मृगपोतकः ।
पिबत्यंभः शनैर्ब्रह्मन्निः शंकं ते तपोवने ॥७
राजा सगर ने कहा—हे महर्षे ! मेरे यहाँ सर्वत्र कुशल है—इसमें तो कुछ भी संशय नहीं है जिस मेरे विषय में भार्गव श्रेष्ठ आप शमका अनुध्यान करने वाले विद्यमान हैं। जिसको पूर्व में ही शस्त्रास्त्रों के प्रयोग करने की भली भाँति शिक्षा-दीक्षा दे दी गयी है वह मैं इस समय समस्त
१० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
शत्रुओं के विनिग्रह करने में कैसे असमर्थ हो सकता हूँ ।१-२। आप तो मेरे गुरुदेव हैं— सुहृत्-दैव-बन्धु और मित्र हैं। केवल आप ही मेरे सब कुछ हैं। मैं तो आपके अतिरिक्त अन्य किसी को भी मेरा पिता नहीं जानता हूँ ।३। आपके द्वारा उपदेश किये गये अस्त्र से ही मैंने सब नृपों पर विजय प्राप्त की है जिनके स्मरण से ही पूर्ण विजय मेरी हुई है यह आपके ही तप की शक्ति है। यहाँ पर उसका एक देश भी विस्मय देने वाला दिखलाई देता है ।४-६। देखिये, मृग का शिशु बचपन से ही सिंहासन पर समीप में आकर हे ब्रह्मन् ! धीरे-धीरे जल पी रहा है और वह आपके इस तपोवन में बिल्कुल ही निःशङ्क अर्थात् भय से रहित है ।७।
धयत्यतिविश्रम्भात् कृशाऽपि हरिणीस्तनम् । करोति मृगशृंगाग्रे गंडकंडूयनं रुरुः ॥८ नवप्रसूतां हरिणीं हत्वा वृत्त्यै वनांतरे । व्याघ्री त्वत्तसावासे सैव पुष्णाति तच्छिशून् ॥९ गजं द्रुतमनुद्रुत्य सिंहो यस्मादिदं वनम् । प्रविष्टोऽनुसरंतौ त्वद्भयादेकत्र तिष्ठतः ॥१० नकुलस्त्वाखुमार्जारमयूरशशपन्नगाः । वृकसूकरशार्दूलशरभर्क्षप्लवंगमाः ॥११ श्रृगाला गवया गावो हरिणा महिषास्तथा । वनेऽत्र सहजं वैरं हित्वा मैत्रीमुपागताः ॥१२ एवंविधा तपः शक्तिर्लोकविस्मयदायिनी । न क्वापि दृश्यते ब्रह्मंस्त्वामृते भुवि दुर्लभा ॥१३ अहं तु त्वत्प्रसादेन विजित्य वसुधामिमाम् । रिपुभिः सह विप्रर्षे स्वराज्यं समुपागतः ॥१४
वह अत्यन्त दुबली हरिणी भी अत्यधिक विश्राम के साथ अपने स्तन को पिला रही है। हरिण मृग छोना के गण्डों को शृङ्ग के अग्रभाग से खुजला रहा है ।८। नव प्रसूता अर्थात् हाल ही में प्रसव करने वाली हरिणी को मारकर वृत्ति के लिए दूसरे वन में वही व्याघ्री आप के इस तपस्या के आश्रम में उसके शिशुओं के पोषण कर रही है ।९। एक सिंह एक हाथी के
असमंजस का त्याग ] [ ११
पीछे आक्रमण करके जब यहाँ पर आ गया है तो प्रवेश करते ही अनुसरण करते हुए वे दोनों सिंह और गज आपके ही भय से एक ही स्थान में स्थित हो रहे हैं ।१०। जो स्वभाव से ही आपस में शत्रु होते हैं वे सभी नकुल-मूषक-मार्जार-मयूर-शश-सर्प-वृक-सूकर--शार्दूल--शरभ-प्लवङ्गम-शृगाल-गवय-गौ हरिण और महिष ये सभी एक-एक के शत्रु होते हुए भी इस वन में अपने स्वाभाविक वैर को भूलकर परस्पर मैत्री के भाव को प्राप्त हो गये हैं ।११-१२। इस प्रकार की यह आपकी ही शक्ति है जो लोगों को बड़ा ही विस्मय देने वाली है। हे ब्रह्मन् ! आपके बिना लोक में इस भूमि पर ऐसी दुर्लभ शक्ति अन्यत्र कहीं पर भी दिखलाई नहीं देती है ।१३। और मैं तो आपके ही प्रसाद से इस सम्पूर्ण वसुधा को जीतकर सब रिपुओं को ध्वस्त करके अपने राज्य में प्राप्त हुआ हूँ ।१४।
वश्यामात्यस्त्रिवर्गेऽपि यथायोग्यकृतादरः । त्वयोपदिष्टमार्गेण सम्यग्राज्यमपालयम् ।।१५
एवं प्रवर्त्तमानस्य मम राज्येऽवतिष्ठतः । भवद्दिक्षा संजाता सापेक्षा भृगुपुंगव ।।१६
किं त्वद्य मयि पर्याप्तमनपत्यतयैव मे । पितृपिण्डप्रदानेन सह संरक्षणं भुवः ।।१७
तदिदं दुःखमत्यर्थमनिवार्यं मनोगतम् । नान्योऽपहर्त्ता लोकेऽस्मिन् ममेति त्वामुपागतः ।।१८
इत्युक्तः सगरेणाथ स्थित्वा सोऽन्तर्मनाः क्षणम् । उवाच भगवानौर्वः सनिदेशमिदं वचः ।।१९
नियम्य सह भार्याभ्यां किञ्चित्कालमिहावस । अवाप्स्यति ततोऽभीष्टं भवान्नात्र विचारणा ।।२०
स च तत्रावसत्प्रीतस्तच्छुश्रूषापरायणः । पत्नीभ्यां सह धर्मात्मा भक्तियुक्तश्चिरं तदा ।।२१
मेरे सभी अमात्य वश्य हैं और तीनों वर्गों में भी मैं यथायोग्य आदर प्राप्त करने वाला हूँ । आपके ही द्वारा जो उपदेश प्राप्त किया है उसी मार्ग से मैंने अच्छी तरह से राज्य का परिपालन किया है ।१५। इसी रीति से मैं
१२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
प्रवृत्त हो रहा हूँ और अपने राज्य पर स्थित हूँ किन्तु हे भृगु श्रेष्ठ ! मेरी इच्छा आपके दर्शन प्राप्त करने की हुई थी जो कि कुछ अपेक्षा से समन्वित है ।१६। आज मुझमें आपके प्रसाद से सभी कुछ पर्याप्त प्राप्त हुआ है किन्तु मेरी कोई सन्तति नहीं है । इसी कारण से मुझे इस भूमि का संरक्षण करना और पितृगण को पिण्डों का देना दुष्कर सा हो रहा है ।१७। यही मुझे बड़ा भारी घोर दुःख है जो मेरे मन में बैठा हुआ है और निवारण के योग्य नहीं है । इस लोक में मेरे इस दुःख का अपहरण करने वाला आपको छोड़कर अन्य कोई भी नहीं है । अतएव मैं आपकी सन्निधि में प्राप्त हुआ हूँ ।१८। इस प्रकार से जब सगर नृप के द्वारा उस मुनि से कहा गया था तो वह मुनि एक क्षण तक मन ही मन में सोचते हुए स्थित रहे थे और फिर और्व भगवान् ने निदेश पूर्वक यह वचन राजा से कहा था ।१९। आप नियमित रहकर अपनी दोनों पत्नियों के साथ कुछ समय तक यहीं पर निवास करें । फिर आपका जो भी अभीप्सित है उसको आप अवश्य ही प्राप्त कर लेंगे—इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।२०। फिर वह राजा भी सेवा में तत्पर होकर वहीं पर निवास करने लगा था । उसको परम प्रसन्नता हुई थी । उस समय मैं दोनों पत्नियों के साथ धर्म में युक्त तथा भक्तिभाव से समन्वित होकर ही चिरकाल पर्यन्त वहाँ निवास किया था ।२१।
राजपत्न्यौ च ते तस्य सर्वकालमतंद्रिते ।
मुनेरतनुतां प्रीतिं विनयाचारभक्तिभिः ॥२२
भक्त्या शुश्रूषया चैव तयोस्तुष्टो महामुनिः ।
राजपत्न्यौ समाहूय इदं वचनमब्रवीत् ॥२३
भवत्यौ वरमस्मत्तो ब्रियतां काममीप्सितम् ।
दास्यामि तं न संदेहो यद्यपि स्यात्सुदुर्ल्लभम् ॥२४
ततः प्रणम्य शिरसा तेऽप्युभे तं महामुनिम् ।
ऊचतुर्भगवन्पुत्रान्कामयावेति सादरम् ॥२५
ततस्ते भगवानाह भवतीभ्यां मया पुनः ।
राज्ञश्च प्रियकामेन वरो दत्तोऽयमीप्सितः ॥२६
पुत्रवत्यौ महाभागे भवत्यौ मत्प्रसादतः ।
असमंजस का त्याग ] [ १३
भवेतां ध्रुवमन्यच्च श्रूयतां वचनं मम ॥२७ पुत्रो भविष्यत्येकस्यामेकः सोऽनतिधार्मिकः । तथापि तस्य कल्पांतं संभूतिश्च भविष्यति ॥२८
उन दोनों राजा की पत्नियों ने सदा ही अतन्द्रित होकर उस मुनि की विनय—आचार और भक्ति से प्रीति को बढ़ा दिया था ।२२। उस भक्ति और शुश्रूषा से मुनिवर बहुत ही अधिक सन्तुष्ट हो गये थे और फिर उन्होंने दोनों राजा की पत्नियों को अपने समीप में बुलाकर उन से यह वचन कहा था—आप दोनों ही हमसे किसी भी वरदान का वरण करो जो भी तुम्हारी इच्छा हो ओर तुमको अभीप्सित हो । मैं उसी को तुम्हारे लिए दे दूँगा—इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है यद्यपि वह वरदान बहुत दुर्लभ भी क्यों न होवे ।२३-२४। इसके अनन्तर उन दोनों ने मस्तक टेक कर प्रणाम किया था और उन महामुनि से कहा था—हे भगवान् ! हम दोनों ही आदर के साथ पुत्रों की कामना करती हैं ।२५। इसके अनन्तर और्व भगवान् ने कहा—आप दोनों के लिये राजा के प्रिय की कामना वाले मैंने यह अभीष्ट वरदान दे दिया है ।२६। हे महाभाग वालियो ! मेरे प्रसाद से तुम दोनों ही पुत्रों वाली होओगी और अन्य भी एक वचन परम ध्रुव है, उसका भी श्रवण कीजिए । ।२७। एक पत्नी में एक ही पुत्र जन्म ग्रहण करेगा किन्तु वह अति धार्मिक नहीं होगा तो भी कल्प के अन्त में उनकी संभूति होगी ।२८।
षष्टिः पुत्रसहस्राणामपरस्यां च जायते । अकृतार्थाश्च ते सर्वे विनंक्ष्यंत्यचिरादिव ॥२९ एवंविधगुणोपेतौ वरो दत्तौ मया युवाम् । अभीप्सितं तु यद्यस्याः स्वेच्छया तत्प्रकीर्त्यताम् ॥३० एवमुक्ते तु मुनिना वैदर्भ्यान्वयवर्द्धनम् । वरयामास तनयं पुत्रानन्यांस्तथा परा ॥३१ इति दत्त्वा वरं राज्ञे सगराय महामुनिः । सभार्य्यमनुमान्यैनं विससर्ज पुरीं प्रति ॥३२ मुनिना समनुज्ञातः कृतकृत्यो महीपतिः । रथमारुह्य वेगेन सप्रियः प्रययौ पुरीम् ॥३३
१४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
स प्रविश्य पुरीं रम्यां हृष्टपुष्टजनावृताम् । आनंदितः पौरजनै रेमे परमया मुदा ॥३४ एतस्मिन्नेव काले तु राजपत्नयावुभे नृप । राज्ञे प्रावोचतां गर्भं मुदा परमया युते ॥३५
और दूसरी रानी के गर्भ से साठ सहस्र पुत्र समुत्पन्न होंगे । और वे भी सब अकृतार्थ अर्थात् असफल ही होकर थोड़े ही समय में विनष्ट हो जायँगे ।२६। इस प्रकार के गुणों से समन्वित दो वरदान तुम दोनों को दे दिये हैं । इन दोनों में जिसका भी आप दोनों में जो भी अभीष्ट हो उसको मुझे बतला दो ।३०। महामुनीन्द्र के द्वारा जब उन दोनों से इस तरह से कहा गया था जोकि वैदर्भ्य वंश का वर्धन करने वाला था तो वैदर्भी ने तो एक पुत्र प्राप्त करने का वरदान चाहा था और दूसरी ने अन्य साठ हजार पुत्रों के नाम ग्रहण करने के वरदान की याचना की थी ।३१। उस महामुनि ने इस प्रकार से राजा सगर को वरदान देकर भार्याओं के सहित उसको आज्ञा देकर अपनी नगरी की ओर विदा कर दिया था ।३२। मुनि के द्वारा आज्ञा प्राप्त करके राजा कृतकृत्य हो गया था और रथ पर समारूढ़ होकर अपनी प्रियाओं के साथ बड़े वेग से पुरी की ओर चला गया था ।३३। उस नृप ने अपनी नगरी में प्रवेश किया था, जो नगरी परम सुरम्य थी और हृष्ट-पुष्ट जनों से घिरी हुई थी । पुरवासी जनों के साथ हर्षोल्लास से युक्त होकर आनन्दित होते हुए प्रेम से रमण करने लगा था ।३४। इसी समय में हे नृप ! उन दोनों राजा की पत्नियों ने परमाधिक प्रीति संयुक्त होकर राजा की सेवा में अपने-अपने गर्भों के धारण करने की सूचना दी थी ।३५।
ववृधे च तयोर्गर्भः शुक्लपक्षे यथोडुराट् । सह संतोषसंपत्त्या पित्रोः पौरजनस्य च ॥३६ संपूर्णे तु ततः काले मुहूर्त्ते केशिनी शुभे । असुयताग्निगर्भाभं कुमारममितद्युतिम् ॥३७ जातकर्मादिकं तस्य कृत्वा चैव यथाविधि । असमंजस इत्येव नाम तस्याकरोन्नृपः ॥३८ सुमतिश्चापि काले गर्भालाबुमसूयत । संप्रसूतं तु तं त्यक्तुं दृष्ट्वा राजाऽकरोन्मनः ॥३६
असमंजस का त्याग ] [ १५
तज्ज्ञात्वा भगवानौर्वस्तत्रागच्छद्यदृच्छया । सम्यक् संभावितो राजा तमुवाच त्वरान्वितः ॥४० गर्भालाबुरयं राजन्न त्यक्तुं भवताऽर्हति । पुत्राणां षष्टिसाहस्रबीजभूतो यतस्तव ॥४१ तस्मात्तत्सकलीकृत्य घृतकुम्भेषु यत्नतः । निःक्षिप्य सपिधानेषु रक्षणीयं पृथक्पृथक् ॥४२
उन दोनों के गर्भ शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा के ही समान बढ़ गये थे । इससे माता-पिता को और पुरवासियों को भी बहुत अधिक सन्तोष हुआ था ।३६। इसके अनन्तर जब गर्भ का पूरा समय सम्प्राप्त हो गया तो परम शुभ मुहूर्त्त में केशिनी ने अपरिमित द्युति से सम्पन्न अग्नि के गर्भ की आभा वाले कुमार को जन्म ग्रहण कराया था ।३७। उस कुमार का जातकर्म आदि संस्कार करके उसका विधि के साथ असमञ्जस नाम नृप ने रक्खा था ।३८। उसी समय में सुमति रानी ने भी एक गर्भ से अलावु को प्रसूत किया था । उसको प्रसूत हुआ देखकर उसका त्याग कर देने का विचार राजा के मन में हुआ था ।३९। किन्तु जब यह ज्ञात हुआ था कि राजा उस अलावु का त्याग करना चाहता है तो भगवान् और्व मुनि यदृच्छा से ही वहाँ पर समागत हो गये थे । राजा सगर ने उनका भली भाँति स्वागत-सत्कार किया था । तब बहुत ही शीघ्रता से युक्त होकर मुनि ने राजा से कहा—।४०। हे राजन् ! आप इस गर्भ से निःसृत अलावु का त्याग करने के योग्य नहीं हैं क्योंकि यह आपके साठ सहस्र पुत्रों का बीजभूत है ।४१। इस कारण से इन सबको एकत्रित करके घृत के कलशों में यत्न पूर्वक ऊपर ढकना लगाकर अलग-२ इनकी रक्षा करनी चाहिए ।४२।
सम्यगेवं कृते राजन्भवतो मत्प्रसादतः । यथोक्तसंख्या पुत्राणां भविष्यति न संशयः ॥४३ काले पूर्णे ततः कुम्भान्भित्त्वा निर्याति ते पृथक् । एवं ते षष्टिसाहस्रं पुत्राणां जायते नृप ॥४४ इत्युक्त्वा भगवानौर्वस्तत्रैवांतरधाद्विभुः । राजा च तत्तथा चक्रे यथौर्वेण समीरितम् ॥४५ ततः संवत्सरे पूर्णे घृतकुम्भात्क्रमेण ते ।
१६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
भित्वा भित्वा पुनर्जज्ञुः सहसैवानुवासरम् ॥४६
एवं क्रमेण संजातास्तनयास्ते महीपते ।
ववृधुः संघशो राजन्षष्टिसहस्रसंख्यया ॥४७
अपृथग्धर्मचरणा महाबलपराक्रमाः ।
बभूवुस्ते दुराधर्षाः क्रूरात्मानो विशेषतः ॥४८
स नातिप्रीतिमांस्तेषु राजा मतिमतां वरः ।
केशिनीतनयं त्वेकं बहुमान सुतं प्रियम् ॥४९
हे राजन् ! इसी विधि से कार्य किये जाने पर मेरे पूर्ण प्रसाद से आपके पुत्रों की जो भी बतायी गयी है वही संख्या उत्पन्न होगी—इसमें लेश मात्र भी संशय नहीं है ।४३। काल जब भी पूर्ण हो जायगा तभी वे सब इन कुम्भों को तोड़कर पृथक्-२ निकल आयेंगे । हे नृप ! इस तरह से आपके साठ सहस्र पुत्र जन्म ग्रहण करेंगे ।४४। इतना कह कर भगवान् और्व वहाँ पर ही अन्तर्हित हो गये क्योंकि वे तो विभु थे और राजा सगर ने वैसा ही सब किया था जैसा भी और्व मुनि ने उनसे कहा था ।४५। इसके पश्चात् जब एक वर्ष पूर्ण हो गया तो वे घृत कुम्भों से क्रम से उन्हें फोड़-तोड़ करके तुरन्त ही प्रतिदिन जन्म लेने लग गये थे ।४६। हे महीपते ! इसी तरह से वे सब क्रम से पुत्र समुत्पन्न हुए थे । हे राजन् ! समुदाय में ये उत्पन्न होकर साठ सहस्र संख्या में बढ़ गये थे ।४७। उन सबके धर्माचरण समान ही थे और वे सब महान बल पराक्रम से समन्वित थे । वे सभी विशेष रूप से क्रूर आत्मा वाले थे और सब दुराधर्ष थे अर्थात् उनको दबा देना बड़ा ही कठिन था, ऐसे तेजस्वी थे ।४८। राजा सगर भी मतिमानों में परम श्रेष्ठ था और इन साठ सहस्र पुत्रों पर उसकी अधिक प्रीति नहीं थी । केशिनी का जो एक पुत्र था उसका वह राजा विशेष मान किया करता था और वह उसको प्रिय भी लगता था ।४९।
विवाहं विधिवत्तस्मै कारयामास पार्थिवः ।
स चाप्यानन्दयामास स्वगुणैः सुहृदोऽखिलान् ॥५०
एवं प्रवर्तमानस्य केशिनीतनयस्य तु ।
अजायत सुतः श्रीमानंशुमानिति विश्रुतः ॥५१
असमंजस का त्याग ] [ १७
स बाल्य एव मतिमानुदारैः स्वगुणैर्भृशम् ।
प्रीणयामास सुहृदः स्वपितामहमेव च ॥५२
एतस्मिन्नंतरे राजंस्तस्य पुत्रोऽसमंजसः ।
आविष्टो नष्टचेष्टोऽभूत्स पिशाचेन केनचित् ॥५३
स तु कश्चिदभूद्वैश्यः पूर्वजन्मनि धर्मवित् ।
कस्यचिद्विषये राज्ञः प्रभूतधनधान्यवान् ॥५४
स कदाचिदरण्येषु विचरन्निधिमुत्तमम् ।
दृष्ट्वा ग्रहीतुमारेभे वणिग्लोभपरिप्लुतः ॥५५
ततस्तद्रक्षकोऽभ्येत्य पिशाचः प्राह तं तदा ।
क्षुधितोऽहं चिरादस्मिन्नवसन्निधिपालकः ॥५६
राजा सगर ने उस असमञ्जस पुत्र का विवाह भी विधिपूर्वक करा दिया था और उसने भी अपने सद्गुणों के द्वारा सभी सुहृदों को आनन्दित किया था ।५०। इस रीति से रहने वाले उस केशिनी के पुत्र के एक सुत ने भी जन्म ले लिया था जो अंशुमान नाम से प्रख्यात हुआ था ।५१। वह बचपन की अवस्था में ही बड़ा मतिमान् था और अपने उदार गुणों से उसमें सभी सुहृदों को तथा अपने पितामह राजा सगर को बहुत ही अधिक प्रीणित किया था ।५२। इसी बीच में ऐसा हुआ था कि उस राजा का अंशुमान पुत्र असमञ्जस किसी पिशाच के द्वारा समाविष्ट हो गया था जिस कारण से उसकी चेष्टा एकदम नष्ट हो गयी थी ।५३। वह पूर्वजन्म में कोई धर्म का ज्ञाता वैश्य हुआ था। वह किसी राजा के देश में हुआ था था और बहुत धन-धान्य की समृद्धि से युक्त था ।५४। वह किसी समय में अरण्यों में विचरण कर रहा था और वहाँ पर उसने एक स्थल में उत्तम निधि देखी थी। वह वैश्य भी लोभ से युक्त होकर उसके लेने का उपक्रम करने लगा था ।५५। उस निधि का रक्षक एक पिशाच था। वह उसी समय में वहाँ पर आगया था और उससे बोला। मैं बहुत समय से भूखा हूँ और यहाँ पर निवास करता हुआ इस निधि की रक्षा कर रहा हूँ ।५६।
तस्मात्तत्परिहाराय मम दत्वा गवामिषम् ।
कामतः प्रतिगृह्णीष्व निधिमेनं ममाज्ञया ॥५७
[ १८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
स तस्मै तत्परिश्रुत्य दास्यामीति गवामिषम् । आदत्त च निधिं तं तु पिशाचेनानुमोदितः ॥५८ न प्रादाच्च ततो मौढ्यात्तस्मै यत्तत्प्रतिश्रुतम् । प्रतिश्रुताप्रदानोत्थरोषं न श्रद्दधे नृप ॥५९ तमेवं सुचिरं कालं प्रतीक्ष्याशनकांक्षया । अपनीतधनः सोऽपि ममार व्यथितः क्षुधा ॥६० वैश्योऽपि कालो मरणं संप्राप्य सगरस्य तु । बभूव काले केशिन्यां तनयोऽन्वयवर्द्धनः ॥६१ अशरीरः पिशाचोऽपि पूर्ववैरमनुस्मरन् । वायुभूतोऽविशद्देहं राजपुत्रस्य भूपते ॥६२ तेनाविष्टस्ततः सोऽपि क्रूरचित्तोऽभवत्तदा । मतिविभ्रंशमासाद्य मुहुस्तेन बलात्कृतः ॥६३
इसलिए मेरी क्षुधा को दूर करने के वास्ते तुम मुझको गो मांस लाकर दो और तभी फिर मेरी आज्ञा से इस महान् निधि का ग्रहण करो ।५७। उस वैश्य ने उसके सामने प्रतिज्ञा की थी कि मैं आपको गौओं का मांस लाकर दे दूँगा । फिर पिशाच की अनुमति से उस निधि का ग्रहण कर लिया था ।५८। और मूर्खता से उसको खाने के लिए वह वस्तु नहीं दी थी जिसके देने की उससे प्रतिज्ञा की थी । हे नृप ! प्रतिज्ञा करके भी गौ मांस न देने से उसका बड़ा क्रोध हो गया था । जिसको वह सहन नहीं कर सका था ।५९। उस पिशाच ने बहुत लम्बे समय तक खाने की इच्छा से प्रतीक्षा की थी किन्तु जब वह वैश्य न पहुँचा तो उस पिशाच ने क्षुधा से व्यथित होकर उसका समस्त धन छीन लिया और उसको मार भी डाला था ।६०। वह वैश्य भी मृत्युगत होकर फिर सगर के यहाँ बालक होकर जन्मधारी हुआ था । जब समय प्राप्त हुआ था तो वह केशिनी का पुत्र वंश की वृद्धि करने वाला हुआ था ।६१। वह पिशाच भी शरीरधारी तो था नहीं, हे भूपते ! उसने अपने पूर्व के होने वाले वैर का अनुस्मरण करके वायुभूत होकर उसी राजा सगर के पुत्र के पुत्र के देह में प्रवेश कर लिया था ।६२। उसी के द्वारा आविष्ट होकर वह भी फिर बड़ा भारी क्रूर हाचित्त बोला
असमंजस का त्याग ] [ १६
गया था। मति का विभ्रंश हो गया था और वह बार-२ बल पूर्वक असदा- चरण करने लग गया था ॥६३॥
असमंजसत्वं नगरे चक्रे सोऽपि नृशंसवत् । बालांश्च यूनः स्थविरान्योषितश्च सदा खलः ॥६४॥ हत्वा हत्वा प्रचिक्षेप सरय्वामतिनिर्दयः । ततः पौरजनाः सर्वे दृष्ट्वा तस्य कदर्यताम् ॥६५॥ बहुशो निकृतास्तेन गत्वा राज्ञे व्यजिज्ञपन् । राजा च तदुपश्रुत्य तमाहूय प्रयत्नतः ॥६६॥ वारयामास बहुधा दुःखेन महतान्वितः । बहुशः प्रतिषिद्धोऽपि पित्रा तेन महात्मना ॥६७॥ जले तप्ते च संतप्ताः सं बभूवुर्यथा यवाः । नाशकत्तं यदा पापाद्विनिवर्त्तयितुं नृपः ॥६८॥ लोकापवादभीरुत्वाद्विषयानत्यजत्तदा ॥६६॥
उसने भी फिर तो अपने नगर में एक नृशंस के ही समान असम- करदी थी। वह खल ऐसा दुष्ट हो गया था कि छोटे बालकों को—युवकों को—वृद्धों को और स्त्रियों को सदा ही पकड़ लिया करता था ॥६४॥ सबको मार-मार कर वह अत्यन्त निर्दयता से सरयू नदी में फेंक दिया करता था। फिर तो सभी नगर निवासियों ने उसकी उस नीचता को देखा था। वह सभी का निरादर करके डांट देता था। ऐसा जब बहुत बार हुआ जो उन सबने जाकर राजा से कहा था ओर राजा ने अब यह सुना तो उसको प्रयत्न पूर्वक अपने समीप में बुलाया था। राजा ने कितनी ही बार बहुत अधिक दुःख से संयुत होकर उसको इस महान नीच कुकर्म से रोका था। बहुत बार उसको रोका भी गया था तो भी महात्मा पिता का कथन उसने नहीं माना था ॥६५-५७॥ जिस तरह से संतप्त जल में यव हो जाते हैं उसी प्रकार की दशा राजा की हो गयी थी। जब राजा में उस महान पापकर्म से हटाने की शक्ति न रही थी तो बहुत ही वह दुःखित हो गया था। लोक में बड़ा भारी अपवाद होगा कि राजा ही का पुत्र ऐसा अन्याय करता है तो अब न्याय कहाँ होगा—इससे डरकर उसने उस समय में विषयों का त्याग किया था ॥६८-६६॥