संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअसमंजस का त्याग ] [ १३
भवेतां ध्रुवमन्यच्च श्रूयतां वचनं मम ॥२७ पुत्रो भविष्यत्येकस्यामेकः सोऽनतिधार्मिकः । तथापि तस्य कल्पांतं संभूतिश्च भविष्यति ॥२८
उन दोनों राजा की पत्नियों ने सदा ही अतन्द्रित होकर उस मुनि की विनय—आचार और भक्ति से प्रीति को बढ़ा दिया था ।२२। उस भक्ति और शुश्रूषा से मुनिवर बहुत ही अधिक सन्तुष्ट हो गये थे और फिर उन्होंने दोनों राजा की पत्नियों को अपने समीप में बुलाकर उन से यह वचन कहा था—आप दोनों ही हमसे किसी भी वरदान का वरण करो जो भी तुम्हारी इच्छा हो ओर तुमको अभीप्सित हो । मैं उसी को तुम्हारे लिए दे दूँगा—इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है यद्यपि वह वरदान बहुत दुर्लभ भी क्यों न होवे ।२३-२४। इसके अनन्तर उन दोनों ने मस्तक टेक कर प्रणाम किया था और उन महामुनि से कहा था—हे भगवान् ! हम दोनों ही आदर के साथ पुत्रों की कामना करती हैं ।२५। इसके अनन्तर और्व भगवान् ने कहा—आप दोनों के लिये राजा के प्रिय की कामना वाले मैंने यह अभीष्ट वरदान दे दिया है ।२६। हे महाभाग वालियो ! मेरे प्रसाद से तुम दोनों ही पुत्रों वाली होओगी और अन्य भी एक वचन परम ध्रुव है, उसका भी श्रवण कीजिए । ।२७। एक पत्नी में एक ही पुत्र जन्म ग्रहण करेगा किन्तु वह अति धार्मिक नहीं होगा तो भी कल्प के अन्त में उनकी संभूति होगी ।२८।
षष्टिः पुत्रसहस्राणामपरस्यां च जायते । अकृतार्थाश्च ते सर्वे विनंक्ष्यंत्यचिरादिव ॥२९ एवंविधगुणोपेतौ वरो दत्तौ मया युवाम् । अभीप्सितं तु यद्यस्याः स्वेच्छया तत्प्रकीर्त्यताम् ॥३० एवमुक्ते तु मुनिना वैदर्भ्यान्वयवर्द्धनम् । वरयामास तनयं पुत्रानन्यांस्तथा परा ॥३१ इति दत्त्वा वरं राज्ञे सगराय महामुनिः । सभार्य्यमनुमान्यैनं विससर्ज पुरीं प्रति ॥३२ मुनिना समनुज्ञातः कृतकृत्यो महीपतिः । रथमारुह्य वेगेन सप्रियः प्रययौ पुरीम् ॥३३