भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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असमंजस का त्याग ] [ १७

स बाल्य एव मतिमानुदारैः स्वगुणैर्भृशम् ।
प्रीणयामास सुहृदः स्वपितामहमेव च ॥५२
एतस्मिन्नंतरे राजंस्तस्य पुत्रोऽसमंजसः ।
आविष्टो नष्टचेष्टोऽभूत्स पिशाचेन केनचित् ॥५३
स तु कश्चिदभूद्वैश्यः पूर्वजन्मनि धर्मवित् ।
कस्यचिद्विषये राज्ञः प्रभूतधनधान्यवान् ॥५४
स कदाचिदरण्येषु विचरन्निधिमुत्तमम् ।
दृष्ट्वा ग्रहीतुमारेभे वणिग्लोभपरिप्लुतः ॥५५
ततस्तद्रक्षकोऽभ्येत्य पिशाचः प्राह तं तदा ।
क्षुधितोऽहं चिरादस्मिन्नवसन्निधिपालकः ॥५६

राजा सगर ने उस असमञ्जस पुत्र का विवाह भी विधिपूर्वक करा दिया था और उसने भी अपने सद्गुणों के द्वारा सभी सुहृदों को आनन्दित किया था ।५०। इस रीति से रहने वाले उस केशिनी के पुत्र के एक सुत ने भी जन्म ले लिया था जो अंशुमान नाम से प्रख्यात हुआ था ।५१। वह बचपन की अवस्था में ही बड़ा मतिमान् था और अपने उदार गुणों से उसमें सभी सुहृदों को तथा अपने पितामह राजा सगर को बहुत ही अधिक प्रीणित किया था ।५२। इसी बीच में ऐसा हुआ था कि उस राजा का अंशुमान पुत्र असमञ्जस किसी पिशाच के द्वारा समाविष्ट हो गया था जिस कारण से उसकी चेष्टा एकदम नष्ट हो गयी थी ।५३। वह पूर्वजन्म में कोई धर्म का ज्ञाता वैश्य हुआ था। वह किसी राजा के देश में हुआ था था और बहुत धन-धान्य की समृद्धि से युक्त था ।५४। वह किसी समय में अरण्यों में विचरण कर रहा था और वहाँ पर उसने एक स्थल में उत्तम निधि देखी थी। वह वैश्य भी लोभ से युक्त होकर उसके लेने का उपक्रम करने लगा था ।५५। उस निधि का रक्षक एक पिशाच था। वह उसी समय में वहाँ पर आगया था और उससे बोला। मैं बहुत समय से भूखा हूँ और यहाँ पर निवास करता हुआ इस निधि की रक्षा कर रहा हूँ ।५६।

तस्मात्तत्परिहाराय मम दत्वा गवामिषम् ।
कामतः प्रतिगृह्णीष्व निधिमेनं ममाज्ञया ॥५७