संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 431, कुल 893 में से
संदर्भ में पढ़ें[ १८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
स तस्मै तत्परिश्रुत्य दास्यामीति गवामिषम् । आदत्त च निधिं तं तु पिशाचेनानुमोदितः ॥५८ न प्रादाच्च ततो मौढ्यात्तस्मै यत्तत्प्रतिश्रुतम् । प्रतिश्रुताप्रदानोत्थरोषं न श्रद्दधे नृप ॥५९ तमेवं सुचिरं कालं प्रतीक्ष्याशनकांक्षया । अपनीतधनः सोऽपि ममार व्यथितः क्षुधा ॥६० वैश्योऽपि कालो मरणं संप्राप्य सगरस्य तु । बभूव काले केशिन्यां तनयोऽन्वयवर्द्धनः ॥६१ अशरीरः पिशाचोऽपि पूर्ववैरमनुस्मरन् । वायुभूतोऽविशद्देहं राजपुत्रस्य भूपते ॥६२ तेनाविष्टस्ततः सोऽपि क्रूरचित्तोऽभवत्तदा । मतिविभ्रंशमासाद्य मुहुस्तेन बलात्कृतः ॥६३
इसलिए मेरी क्षुधा को दूर करने के वास्ते तुम मुझको गो मांस लाकर दो और तभी फिर मेरी आज्ञा से इस महान् निधि का ग्रहण करो ।५७। उस वैश्य ने उसके सामने प्रतिज्ञा की थी कि मैं आपको गौओं का मांस लाकर दे दूँगा । फिर पिशाच की अनुमति से उस निधि का ग्रहण कर लिया था ।५८। और मूर्खता से उसको खाने के लिए वह वस्तु नहीं दी थी जिसके देने की उससे प्रतिज्ञा की थी । हे नृप ! प्रतिज्ञा करके भी गौ मांस न देने से उसका बड़ा क्रोध हो गया था । जिसको वह सहन नहीं कर सका था ।५९। उस पिशाच ने बहुत लम्बे समय तक खाने की इच्छा से प्रतीक्षा की थी किन्तु जब वह वैश्य न पहुँचा तो उस पिशाच ने क्षुधा से व्यथित होकर उसका समस्त धन छीन लिया और उसको मार भी डाला था ।६०। वह वैश्य भी मृत्युगत होकर फिर सगर के यहाँ बालक होकर जन्मधारी हुआ था । जब समय प्राप्त हुआ था तो वह केशिनी का पुत्र वंश की वृद्धि करने वाला हुआ था ।६१। वह पिशाच भी शरीरधारी तो था नहीं, हे भूपते ! उसने अपने पूर्व के होने वाले वैर का अनुस्मरण करके वायुभूत होकर उसी राजा सगर के पुत्र के पुत्र के देह में प्रवेश कर लिया था ।६२। उसी के द्वारा आविष्ट होकर वह भी फिर बड़ा भारी क्रूर हाचित्त बोला