संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअसमंजस का त्याग ] [ १६
गया था। मति का विभ्रंश हो गया था और वह बार-२ बल पूर्वक असदा- चरण करने लग गया था ॥६३॥
असमंजसत्वं नगरे चक्रे सोऽपि नृशंसवत् । बालांश्च यूनः स्थविरान्योषितश्च सदा खलः ॥६४॥ हत्वा हत्वा प्रचिक्षेप सरय्वामतिनिर्दयः । ततः पौरजनाः सर्वे दृष्ट्वा तस्य कदर्यताम् ॥६५॥ बहुशो निकृतास्तेन गत्वा राज्ञे व्यजिज्ञपन् । राजा च तदुपश्रुत्य तमाहूय प्रयत्नतः ॥६६॥ वारयामास बहुधा दुःखेन महतान्वितः । बहुशः प्रतिषिद्धोऽपि पित्रा तेन महात्मना ॥६७॥ जले तप्ते च संतप्ताः सं बभूवुर्यथा यवाः । नाशकत्तं यदा पापाद्विनिवर्त्तयितुं नृपः ॥६८॥ लोकापवादभीरुत्वाद्विषयानत्यजत्तदा ॥६६॥
उसने भी फिर तो अपने नगर में एक नृशंस के ही समान असम- करदी थी। वह खल ऐसा दुष्ट हो गया था कि छोटे बालकों को—युवकों को—वृद्धों को और स्त्रियों को सदा ही पकड़ लिया करता था ॥६४॥ सबको मार-मार कर वह अत्यन्त निर्दयता से सरयू नदी में फेंक दिया करता था। फिर तो सभी नगर निवासियों ने उसकी उस नीचता को देखा था। वह सभी का निरादर करके डांट देता था। ऐसा जब बहुत बार हुआ जो उन सबने जाकर राजा से कहा था ओर राजा ने अब यह सुना तो उसको प्रयत्न पूर्वक अपने समीप में बुलाया था। राजा ने कितनी ही बार बहुत अधिक दुःख से संयुत होकर उसको इस महान नीच कुकर्म से रोका था। बहुत बार उसको रोका भी गया था तो भी महात्मा पिता का कथन उसने नहीं माना था ॥६५-५७॥ जिस तरह से संतप्त जल में यव हो जाते हैं उसी प्रकार की दशा राजा की हो गयी थी। जब राजा में उस महान पापकर्म से हटाने की शक्ति न रही थी तो बहुत ही वह दुःखित हो गया था। लोक में बड़ा भारी अपवाद होगा कि राजा ही का पुत्र ऐसा अन्याय करता है तो अब न्याय कहाँ होगा—इससे डरकर उसने उस समय में विषयों का त्याग किया था ॥६८-६६॥