भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२७ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

अश्वमोचन वर्णन

जैमिनिरुवाच—
त्यक्त्वा पुत्रं स धर्मात्मा सगरः प्रेम तद्गतम् ।
धर्मशीले तदा बाले चकारांशुमति प्रभुः ॥१॥
एतस्मिन्नेव काले तु सुमत्यास्तनया नृप ।
ववृधुः संघशः सर्वे परस्परमनुव्रताः ॥२
वज्रसंहननाः क्रूरा निर्दया निरपत्रपाः ।
अधर्मशीला नितरामेकधर्माण एव च ॥३
एककार्याभिनिरताः क्रोधना मूढचेतसः ।
अधृष्याः सर्वभूतानां जनोपद्रवकारिणः ॥४
विनयाचारसन्मार्गनिरपेक्षाः समंततः ।
बबाधिरे जगत्सर्वमसुरा इव कामतः ॥५
विध्वस्तयज्ञसन्मार्गं भुवनं तैरुपद्रुतम् ।
निःस्वाध्यायवषट्कारं बभूवार्तं विशेषतः ॥६
विध्वस्यमाने सुभृशं सागरैर्वरदर्पितैः ।
प्रक्षोभं परमं जग्मुर्देवासुरमहोरगाः ॥७

जैमिनी मुनि ने कहा—उस परम धर्मात्मा नृप सगर ने अपने पुत्र असमञ्जस का त्याग कर दिया था और उसमें जो उसका प्रेम था उसको तब तब धर्मशील बालक अंशुमान में उस प्रभु ने किया था ।१। इसी काल में सुमति नाम वाली रानी के जो साठ हजार पुत्र थे हे नृप ! वे सब समुदाय में समुत्पन्न होकर परस्पर में अनुव्रत होकर बढ़कर बड़े हो गये थे ।२। ये सभी एक ही धर्म वाले थे तथा वज्र के समान सुदृढ़ शरीरों वाले बहुत ही क्रूर-अत्यन्त निर्दयी और निर्लज्ज थे और निरन्तर अधर्म शील थे और धर्म को सर्वथा जानते ही नहीं थे ।३। ये सब एक ही कार्य में निरत रहते थे—बहुत अधिक क्रोधी और मूढ़ चित्तों वाले थे । ये सब समस्त प्राणियों को अधृष्य थे और जनों के लिए अत्यधिक पद्रवों के करने वाले थे ।४। ये सभी ओर से विनय पूर्वक आचरण और सन्मार्ग की अपेक्षा नहीं रखते थे । इन्होंने असुरों के ही समान स्वेच्छा से सम्पूर्ण जगत को बाधा पहुँचाई