भारतकोश
संग्रह पर लौटें

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished893 पृष्ठ

सगर की दिग्विजय ] [ ४०६

तस्य मे चोपसर्गश्च संभवंतिकथं मुने।
भवताऽनुगृहीतोऽस्मि कृतार्थश्चाधुना कृतः ॥५२
यन्मां द्रष्टुमिहायातः स्वयमेव भवान्गुरो।
यन्मह्यमाह भगवान्विपक्षविजयादिकम् ॥५३
तत्तथाऽनुष्ठितं किन्तु सर्वं भवदनुग्रहात् ।
भवत्प्रसादतः सर्वं मन्ये प्राप्तं महीक्षिताम् ॥५४
अन्यथा मम का शक्तिः शत्रून्हंतुं तथाविधान् ।
अनल्पी कुरुते फल्यं यन्मे व्यवसितं भवान् ॥५५
फलमल्पमपि प्रीतये स्यादगस्याधिरोपितुः।
जैमिनिरुवाच—
एवं संभावितः सम्यक्सगरेण महामुनिः ॥५६

दोनों हाथों को जोड़कर महामुनि को सगर ने उत्तर दिया था। सगर ने कहा—हे महर्षे ! मेरा सर्वत्र कुशल है—इसमें लेशमात्र भी संशय नहीं है ॥५०॥ जिस मुझ सेवक का निरन्तर ही आप जैसे महापुरुष कल्याण की कामना का ध्यान रखा करते हैं उस सेवक मेरे प्रति सभी देवगण कल्याणाभिमुख अर्थात् श्रेय करने वाले सदा ही रहा करते हैं ॥५१॥ हे मुने ! ऐसे मुझको उपद्रव कैसे हो सकते हैं। मैं तो आपके परमाधिक अनुग्रह का भाजन हो गया हूँ और अब अपने समस्त कार्यों में सफल भी बना दिया गया हूँ ॥५२॥ हे गुरुदेव ! आप जो स्वयं ही मुझको अपना दर्शन देने के लिए यहाँ पर पधारे हैं और जो आपने विपक्षियों पर विजय आदि प्राप्त करने की बातें मुझसे कही हैं ॥५३॥ यह सभी कुछ वैसा ही किया गया है किन्तु यह सब आपकी ही अनुकम्पा से हुआ है। मैं स्वयं ही इस बात को मानता हूँ कि शत्रु तथा अन्य नृपों पर जो भी मैंने विजय प्राप्त की है—यह सब आपके ही प्रसाद से ही हुआ है ॥५४॥ नहीं तो ऐसे-ऐसे प्रबल शत्रुओं का हनन कर पराजित करने की मेरे जैसे की क्या शक्ति है। जो भी मेरा व्यवसित है उसको सफल आप जैसे महान् पुरुष ही किया करते हैं ॥५५॥ अग अधिरोपिता का अनल्प भी फल प्रीति के लिए ही होता है। जैमिनी मुनि ने कहा—इस रीति से राजा सगर के द्वारा उन महामुनि का समादर किया गया था।

४१० ] | ब्रह्माण्ड पुराण

अभ्यनुज्ञाय तं भूपः प्रजगाम निजाश्रमम् । वसिष्ठे तु गते राजा सगरः प्रीतमानसः ॥५७ अयोध्यायामभवत्सन्प्रशशासाखिलां भुवम् । भार्याभ्यां समुपेताभ्यां रूपशीलगुणादिभिः ॥५८ बुभुजे विषयान्ग्राम्यान्यथाकामं यथासुखम् । सुमतिकेशिनी चोभे विकसद्वदनांबुजे ॥५९ रूपौदार्यगुणोपेते पीनवृत्तपयोधरे । नील कुंचितकेशाढ्ये सर्वाभरणभूषिते ॥६० सर्वलक्षणसंपन्ने नवयौवनगोचरे । प्रिये सन्निहिते तस्य नित्यं प्रियहिते रते ॥६१ स्वाचारभावचेष्टाभिर्जह्रतुस्तुस्तन्मनोऽनिशम् । स चापि भरणोत्कर्ष प्रतीतात्मा महीपतिः ॥६२

फिर वह मुनि नृप सगर से आज्ञा ग्रहण करके अपने आश्रम को चले गये थे। वसिष्ठ मुनि के गमन कर जाने पर राजा के मन में परम हर्ष हुआ था ।५७। वह राजा फिर अयोध्या पुरी अपनी राजधानी में निवास करता था और उसने समस्त भूमण्डल पर प्रशासन किया था। दोनों भार्याओं को भी अपने पास में रखता था जो रूप लावण्य, शील स्वभाव और गुण गण आदि से सुसम्पन्न थीं ।५८। उस राजा सगर ने ग्राम्य विषयों के सुख का पूर्ण अपनी इच्छा के अनुरूप ही उपभोग किया था। सुमति और केशिनी ये दोनों ही विकसित कमल के समान परम सुन्दर मुखों वाली थीं ।५९। सुन्दर स्वरूप के साथ-साथ इन दोनों पत्नियों में विशाल उदारता भी थी। इनके उरोज युग्म परिपुष्ट वृत्ताकार एवं समुन्नत थे। इनके केशपाश नील वर्ण के कुञ्चित अर्थात् छल्लेदार परम सुहावने थे। ये सभी आभरणों से विभूषित रहा करती थीं ।६०। नूतन यौवन के उद्गम में दिखलाई देने वाली नारियों में जो गुण गण हुआ करते हैं। उन सभी से ये दोनों रानियां सुसम्पन्न थीं। ये दोनों बहुत ही प्रिय थीं और सदा राजा के समीप में रहा करती थीं तथा नित्य ही अपने परम प्रिय स्वामी के हित कार्य में रति रखने वाली थीं ।६१। इन दोनों के अपने आचरण राजा के प्रति इतने सुन्दर थे वे अपने हाव-भाव और चेष्टाओं के द्वारा निरन्तर ही राजा के मन को अपनी ओर आकर्षित रखा करती थीं। वह राजा भी उन दोनों के भरण के उत्कर्ष से प्रसन्न मन वाला था ।६२।

सगर की दिग्विजय ] [ ४११

रममाणो यथाकामं सह ताभ्यां पुरेऽवसत् । अन्येषां भुवि राज्ञां तु राजशब्दो न चाप्यभूत् ॥६३ गुणेन चाभवत्तस्य सगरस्य महात्मनः । अल्पोऽपि धर्मः सततं यथा भवति मानसे ॥६४ राज्ञस्तस्यार्थकामौ तु न तथा विपुलावपि । अलुब्धमानसोऽर्थं च भेजे धर्ममपीडयन् ॥६५ तदर्थमेव राजेंद्र कामं चापीडयंस्तयोः ॥६६

वह राजा सगर उन दोनों अपनी परम प्रिय पत्नियों के साथ अपनी इच्छा के अनुसार रमण करता हुआ अपने नगर में निवास किया करता था। इस भूमि में अन्य राजा के लिए राजा—यह शब्द ही नहीं था। राजा का अर्थ होता जो राजित (शोभित) होता है। वह अर्थ इसी में घटित होता है। अन्य अर्थ यह भी है कि यही एक चक्रवर्ती राजा था ।६३। इस राजा में ही ऐसे गुण गण विद्यमान थे कि महान् आत्मा वाले इसके लिए ही राजा शब्द अन्वर्थ होता था। इसके मन ने अल्प भी धर्म निरन्तर रहा करता था ।६४। इस राजा में विशेष अधिक भी अर्थ और काम वैसे नहीं थे जो उसके मन को अधिक समासक्त कर सकें। इतना लुब्धक नहीं था कि अर्थ संग्रह में ही व्यस्त रहे। यह तो धर्म में कुछ भी बाधा न करके ही अर्थ का सेवन किया करता था। इसमें काम वासना भी उतनी ही थी कि हे राजेन्द्र ! जिससे दोनों पत्नियों को सर्वदा आप्यायित करता रहे ।६५-६६।

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॥ सगर का और्वाश्रम में आगमन ॥

जैमिनिरुवाच— एवं स राजा विधिवत्पालयामास मेदिनीम् । सप्तद्वीपवतीं सम्यक्साक्षाद्धर्म इवापरः ॥१ ब्राह्मणादींस्तथा वर्णांन्स्वेस्वे धर्मे पृथक्पृथक् । स्थापयित्वा यथान्यायं ररक्षाव्याहतेन्द्रियः ॥२ प्रजाश्च सर्ववर्णेषु यथाश्रेष्ठानुवर्तिनः । वर्णांश्चैवानुलोम्येन तद्वदर्थेषु च क्रमात् ॥३

४१२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

न सति स्थविरे बालं मृत्युरभ्युपगच्छति । सर्ववर्णेषु भूपाले महीं तस्मिन्प्रशासति ॥४ स्फीतान्यपेतबाधानि तदा राष्ट्राणि कृत्स्नशः । तेष्वसंख्या जनपदाश्चातुर्वर्ण्यजनावृताः ॥५ ते चासंख्यगृहग्रामशतोपेता विभागशः । देशाश्चावासभूयिष्ठा नृपे तस्मिन्प्रशासति ॥६ अनाश्रमी द्विजः कश्चिन्न बभूव तदा भुवि । प्रजानां सर्ववर्णेषु प्रारंभाः फलदायिनः ॥७

जैमिनि मुनि ने कहा—उस राजा ने सात द्वीपों वाली मेदिनी का विधि के साथ परिपालन साक्षात् दूसरे मूर्तिमान् धर्म के ही समान किया था ॥१॥ अव्याहत इन्द्रियों वाले उस नृप सगर ने न्यायानुरूप ब्राह्मण आदि चारों वर्णों को अपने-अपने धर्म में पृथक्-पृथक् स्थापित कर दिया था ॥२॥ सब ही वर्णों में जो भी प्रजाजन थे वे उचित रीति से अपने से श्रेष्ठों के अनुवर्त्तन करने वाले थे। जो वर्ण आनुलोम्य से हुए थे उनकी भी उसी भाँति कार्यों में क्रम से लगा दिया था। उच्च वर्ण वाले से नीचे वर्ण वाली स्त्री में जो समुत्पन्न होते हैं वे अनुलोम सृष्टि वाले होते हैं। इसके विपरीत क्षत्रिय से ब्राह्मणी आदि में समुत्पन्ने विलोम हैं, जिसका शास्त्र में सर्वथा निषेध है ॥३॥ वृद्ध माता-पिता के जीवित रहने पर उस नृप के राज्य में बालक की मृत्यु नहीं हुआ करती थी। यह बात उस महीपति के शासन करने पर सभी वर्णों में हुआ करती थी ॥४॥ उस समय में राष्ट्र पूर्णतया बाधा रहित और स्फीत अर्थात् विस्तृत थे। उन राष्ट्रों में अगणित जनपद थे जिनमें चारों वर्णों के मानव रहा करते थे ॥५॥ उस नृप के प्रशासन करने पर सभी देशों में बहुत अधिक आवास गृह थे तथा विभक्त रूप से संख्या रहित सैकड़ों ही गृह और ग्राम थे ॥६॥ वह ऐसा समय था कि इस भू मण्डल में कोई भी द्विज ऐसा नहीं था जिसका कोई आश्रम न होवे। ब्रह्मचर्य—गार्हस्थ्य—वानप्रस्थ और संन्यास ये चार ही आश्रम थे। सभी वर्णों की प्रजाओं में जो भी आरम्भ होते हैं वे सभी निष्फल न होकर फल देने वाले हुआ करते थे ॥७॥

स्वोचितान्येव कर्माणि प्रारभंत च मानवाः । पुरुषार्थोपपन्नानि कर्माणि च तदा नृणाम् ॥८

सगर का और्वाश्रम में आगमन ] [ ४१३

महोत्सवसमुद्युक्ताः पुरग्रामव्रजाकराः । अन्योन्यप्रियकामाश्च राजभक्तिसमन्विताः ॥८ न निन्दितोऽभिशस्तो वा दरिद्रो व्याधितोऽपि वा । प्रजासु कश्चिल्लुब्धो वा कृपणो वापि नाभवेत् ॥९ जनाः परगुणप्रीताः स्वसम्पर्काभिकाङ्क्षिणः । गुरुषु प्रणता नित्यं सविद्याव्यसनेदृताः ॥११ परपवादभीताश्च स्वदाररतयोऽनिशम् । निसर्गतः खलसंसर्गविरता धर्मतत्पराः ॥१२ आस्तिकाः सर्वशोऽभवन् प्रजास्तस्मिन्प्रशासति । एवं सुबाहुतनये स्वप्रतापार्जितां महीम् ॥१३ ऋतवश्च महाभाग यथाकालानुवर्तिनः । शालिभूयिष्ठसस्याढ्या सदैव सकला मही ॥१४

सभी मानव उस शासन में अपने जो भी समुचित कर्म थे उन्हीं का प्रारम्भ किया करते थे। उस काल में मानवों के सभी कर्म पुरुषार्थ से समुत्पन्न हुआ करते थे ।८। नगर-ग्राम-व्रज और आकर सब महोत्सवों से समुद्युक्त थे। उनमें सभी मानव परस्पर में एक दूसरे के प्रिय करने की कामना वाले थे और सबके मनों में अपने राजा के प्रति भक्ति की भावना विद्यमान रहा करती थी ।८। उस समय में प्रजाओं में कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं दिखाई पड़ता था कि जो निन्दित-अभिशस्त-दरिद्र-व्याधित लुब्धक अथवा कृपण होते। तात्पर्य यही है कि किसी भी प्रकार से हीनता या खिन्नता आदि नहीं थी ।९। उस काल में सभी जन ऐसे थे जो दूसरों के गुणों को देख या जानकर परम हर्षित हुआ करते थे तथा अपने से सम्पर्क करने की अभिकाङ्क्षा रखा करते थे, सभी मानव सद्विद्या के व्यसन से समाहृत और ज्ञान दाता गुरुजनों में उनकी नित्य ही प्रणत भावना रहा करती थी ।११। सभी जन दूसरों की बुराई से डरा करते थे—सब लोग निरन्तर अपनी ही स्त्री में रति रखने वाले थे अर्थात् पर स्त्री गामिता का नाम भी नहीं था। सबको स्वाभाविक रूप से खलों के संसर्ग से विरक्तता होती है और सभी धर्म में परायण रहा करते थे ।१२। उस धार्मिक नृप के शासन काल में सभी प्रजा सभी ओर आस्तिक अर्थात् परम प्रभु के अस्तित्व को मानने वाले थे। अपने प्रताप से अर्जित मही पर सबाय तनय के शासन में इस प्रकार के सब ऋतुएं हे महाभाग ! ठीक-ठीक समय पर अनुवर्त्तन

४१४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

किया करती थीं और सम्पूर्ण भूमि सदा ही शाली और सस्य की बहुलता वाली थी । अर्थात् धान्य परिपूर्ण था ।१३-१४।

बभूव नृपशार्दूले तस्मिन् राज्यानि शासति ।।१५ यस्याष्टादशमंडलाधिपतिभिः सेवार्थमभ्यागतैः प्रख्यातोरुपराक्रमेनृपशतैर्मूर्द्धाभिषिक्तैः पृथक् । संविष्टैर्मणिविष्टरेषु नितरामध्यास्यमानाऽमरैः शक्रस्येव विराजते दिवि सभा रत्नप्रभोद्भासिता ।।१६ संकेतादपयांतराभ्युपगमाः सर्वेऽपि सोपायनाः कृत्वा सैन्यनिवेशनानि परितः पुर्याः पृथक् पार्थिवाः । द्रष्टुं कांक्षितराजकाः सतनया विज्ञापयंतो मुहु- र्द्वास्थैरेव नरेश्वराय सुचिरं वत्स्यन्तमन्तः पुरं ।।१७ नमन्नरेंद्रमुकुटश्रेणीनामतिघर्षणात । किणीकृतौ विराजते चरणौ तस्य भूभुजः ।।१८ सेवागतनरेंद्रौघविनिकीर्णैः समंततः । रत्नैर्भांति सभा तस्य गुहा सोमे रवी यथा ।।१९ एवं स राजा धर्मेण भानुवंशशिखामणिः । अनन्यशासनामूर्वीमन्वशासदरिंदमः ।।२० इत्थं पालयतः पृथ्वीं सगरस्य महीपतेः । न चापपात मृत पुत्रमुखालोकनजृंभिता ।।२१

जब यह राजशार्दूल इस भूमि पर शासन कर रहा था उस समय में भूमि धान्योत्पत्ति करके सबको सुखी करता था ।१५। उस राजा की सभा रत्नों की प्रभा से उद्भासित स्वर्ग में इन्द्र की सभा के ही समान शोभा दे रही थी जिसमें अठारह मण्डलों की अधिपति राजा की सेवा के लिये समागत हुए विद्यमान थे । इनके अतिरिक्त मूर्द्धाभिषिक्त सैकड़ों ही नृप पृथक् विराजमान थे जिनके विशाल पराक्रम प्रख्यात थे—जिस सभा में मणि मण्डित आसनों पर नृपगण ऐसे ही संस्थित थे जैसे देवगण निरन्तर इन्द्र देवकी सभा में समवस्थित रहा करते हैं ।१६। वे सभी नृप सङ्केत से ही अन्य विषयों का ज्ञान प्राप्त कर लेने वाले अपने-अपने उपायनों को साथ में लिये हुए थे और उन पार्थिवों ने उस पुरी के चारों ओर अपनी सेनाओं का पृथक् निवेशन कर दिया था । राजा सगर उस समय में अन्तःपुर में थे तो ये नृप गण अपने पुत्रों के सहित राजा के दर्शन करने की इच्छा वाले थे

सगर का और्वाश्रम में आगमन ] [ ४१५

और द्वार पर स्थित द्वारपालों के द्वारा बारम्बार बहुत काल पर्यन्त राजा को विज्ञापन करते हुए स्थित थे ।१७। उस राजा सगर के चरण युग्म समागत नृपों के मस्तक झुकाने से उनके मुकुटों से रत्नों की अतिवृष्टि होने से किणीकृत हो गये थे अर्थात् रत्नों के कण उन पर बिखरे हुए थे जिससे एक अद्भुत शोभा हो रही थी ।१८। नृप की सेवा करने के लिए जो नृपों का समुदाय वहाँ पर समागत हुआ था उनके द्वारा सभी ओर बिखर गये रत्नों से उस सगर की सभा ऐसी शोभित हो रही थी जैसे चन्द्र और सूर्य के प्रकाश में गुहा विभात हुआ करती है ।१९। इस रीति से अरियों का दमन करने वाला सूर्य वंश का शिरोमणि वह नृप धर्म से इस भूमि का जो किसी भी अन्य के शासन में न होकर इसी नृप के प्रशासन में थी शासन किया करता था ।२०। इस प्रकार से पृथ्वी के पालन करने वाले राजा सगर की उत्कंठा अपने एक पुत्र के मुख का अवलोकन करने की हुई थी क्यों कि उसके कोई भी पुत्र उत्पन्न नहीं हुआ था ।२१।

विना तां दुःखितोऽत्यर्थं चिंतयामास नैकधा ।
अहो कष्टपुत्रोऽहमस्मिन्वंशे ध्रुवं तु यत् ।।२२
प्रयांति नूनमस्माकं पितरः पिंडविप्लवम् ।
निरयादपि सत्पुत्रे संजाते पितरः किल ।।२३
प्रीत्या प्रयांति तद्गेहं जातकर्मक्रियोत्सुकाः ।
महता सुकृतेनापि संप्राप्तस्य दिवं किल ।।२४
अपुत्रस्यामराः स्वर्गे द्वारं नोद्घाटयंति हि ।
पिता तु लोकमुभयोः स्वर्लोकं तत्पितामहाः ।।२५
जेष्यंति किल सत्पुत्रे जाते वंशद्वयेऽपि च ।
अनपत्यतयाऽहं तु पुत्रिणां या भवेद्गतिः ।।२६
न तां प्राप्स्यामि वै नूनं सुदुर्लभतरा हि सा ।
पदादेंद्रात्किलाभिन्नमृद्धं राज्यमखंडितम् ।।२७
मम यत्तदपुण्यस्य याति निष्फलतामिह ।
इदं मत्पूर्वजैरेव सिंहासनमधिष्ठितम् ।।२८

पुत्रोत्पत्ति के बिना वह अत्यधिक दुःखित रहा करता था और अनेक प्रकार से उसने चिन्तन किया था । अहो ! बड़ा ही कष्ट है इस वंश में मैं बिना पुत्र वाला हूँ । यह परम ध्रुव है कि मैं बड़ा भाग्यहीन हूँ ।२२। निश्चय

४१६ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

ही हमारे पितृगण पिण्डदान के विप्लव को प्राप्त होंगे। यदि सत्पुत्र जन्म ग्रहण कर लेता है तो फिर वे नरक से भी निकल आया करते हैं। वे प्रीति से जातकर्म में समुत्सुक होकर उसके घर में प्रयाण किया करते हैं। यदि कोई महान् पुण्य उन्होंने किया हो तो उसके प्रभाव से वे स्वर्ग को प्राप्त होते हैं।२३-२४। किन्तु जिसके पुत्र नहीं होता है वह सुकृत के प्रभाव से स्वर्ग के द्वार तक ही पहुँच पाता है और फिर पुत्रहीन के लिए देवगण स्वर्ग का द्वार नहीं खोला करते हैं और अन्दर प्रवेश नहीं कर पाता है। पिता भी दोनों लोकों में और उसके पितामह स्वर्गलोक को दोनों वंशों में सत्पुत्र के समुत्पन्न होने पर ही जय प्राप्त करेंगे। मैं तो सन्तान हीन होने से पुत्र वालों की जो गति होती है उसको मैं निश्चय ही प्राप्त नहीं करूँगा क्योंकि पुत्रहीन के लिए वह गति अतीव दुर्लभ है। इन्द्र के पद से अभिन्न यह अखण्ड और समृद्ध राज्य भी व्यर्थ ही है। २५-२७। पुण्यहीन मेरा यह सब कुछ यहाँ पर निष्फलता को ही प्राप्त हो रहा है। यह राज्यासन जिस पर मेरे पूर्वज पुरुष विराजमान हुए थे, सब व्यर्थ ही है।२८।

अपुत्रत्वेन राज्यं च पराधीनत्वमेष्यति ।
तस्मादौर्वाश्रममहं मत्ख्यातं मुनिपुङ्गवम् ॥२९॥
प्रसादयिष्ये पुत्रार्थं भार्याभ्यां सहितोऽधुना ।
गत्वा तस्मै स्वपुत्रत्वं विनिवेद्य महात्मने ॥३०॥
स यद्वक्ष्यति तत्सर्वं करिष्ये नात्र संशयः ।
इति सञ्चिन्त्य मनसा सगरो राजसत्तमः ॥३१॥
इत्येष कृत्यविद्राजन्गन्तुमौर्वाश्रमं प्रति ।
स मन्त्रिप्रवरे राज्यं प्रतिष्ठाप्य ततो वनम् ॥३२॥
प्रययौ रथमारुह्य भार्याभ्यां सहितो मुदा ।
जगाम रथघोषेण मेघनादातिशङ्किभिः ॥३३॥
स्तब्धेक्षणैर्लक्ष्यमाणो मार्गोपान्ते शिखण्डिभिः ।
प्रियाभ्यां दर्शयन्नाजन्सारङ्गांस्तिमितेक्षणान् ॥३४॥
श्रृणमूर्ध्वमुखान्सद्यः पलायनपरान्पुनः ।
वृक्षान्पुष्पफलोपेतान्विलोक्य मुदितोऽभवत् ॥३५॥

जब मेरे कोई पुत्र ही नहीं है तो इस सिंहासन पर भविष्य में कौन बैठेगा। बड़े दुःख का विषय है यह भी आगे किसी दूसरे की ही अधीनता में चला जायेगा। इसलिए मैं अब और्व मुनि के समीप में जाकर उनसे ही

सगर का और्वाश्रम में आगमन ] [ ४१७

यह प्रार्थना करूँ ।२६। इस समय में दोनों अपनी पत्नियों के सहित वहाँ पहुँच कर उन महामुनि को प्रसन्न करूँगा । वे महान् आत्मा वाले महापुरुष हैं वहाँ जाकर अपने पुत्र हीनता के विषय में उनसे विशेष निवेदन करना ही उचित है ।३०। वे इसके लिए जो भी कुछ उपाय बतलायेंगे वह सभी मैं करूँगा इसमें तनिक भी संशय नहीं है । नृपश्रेष्ठ सगर ने ऐसा विचार अपने मन में किया था । हे राजन् ! इसलिए कृत्यों के ज्ञाता उस नृप सगर ने और्व महामुनि की सन्निधि में गमन करने का निश्चय कर लिया था । उसने जो परम श्रेष्ठ मन्त्री था उसको राज्य के प्रशासन का भार सौंपकर फिर वन में चल दिया था ।३१-३२। बड़ी प्रसन्नता से अपनी दोनों पत्नियों को साथ में लेकर रथ पर समारूढ़ हो गया था और वहाँ से चल दिया था । जिस समय में उसका रथ चला है उसका ऐसा महान घोष हुआ था कि मयूरों को मेघों की गर्जना की शंका हो गयी थी ।३३। मार्ग के समीप में मयूरों ने एकटक होकर उसको देखा था । राजा भी उन स्तिमित नेत्रों वाले मयूरों की ओर संकेत करके अपनी पत्नियों को उनकी इस तरह से दृष्टि करने को दिखाता जा रहा था ।३४। उन वन्य मयूरों ने एक क्षण तक तो ऊपर की ओर अपने मुख किये थे और फिर वे वहाँ से पलायन करने में तत्पर हो गये थे । राजा भी उस वन में विविध भाँति के पुष्पों से और फलों से लदे हुए वृक्षों को अवलोकित करके अत्यन्त प्रसन्न हुआ था ।३५।

अम्लानकुसुमैः स्वादुफलैः शाद्वलगर्भकैः ।
सुस्निग्धपल्लवच्छायैरभितः सम्भृतं नगैः ।।३६।।
चूताग्रपल्लवास्वादुस्निग्धकंठपिकारवैः ।
श्रोत्राभिरामजनकैस्सधुष्टं सर्वतो दिशम् ।।३७।।
सर्वर्तुकुसुमोपेतं भ्रमद्भ्रमरमण्डितम् ।
प्रसूनस्तवकानम्रवल्लरीवेल्लितद्रुमम् ।।३८।।
कपित्थसमाक्रान्तवनस्पतिशतैरावृतम् ।
उन्मत्तशिखिसारङ्गकूजत्पक्षिगणान्वितम् ।।३९।।
गायद्विद्याधरवधूगीतिकासुमनोहरम् ।
संचरत्किन्नरीद्वन्द्वविराजद्वृक्षगह्वरम् ।।४०।।
हंससारसचक्राव्हकारण्डवशूकादिभिः ।
सुस्वरंरावतोषांतःसरोभिः परिवारितम् ।।४१।।

४१८ ] [ ब्रह्माण्ड पुराणं

सरः स्वम्बुजकह्लारकुमुदोत्पलराशिषु ।
शनैः परिवहन्मंदमारुतापूर्णदिङ्मुखम् ॥४२

वह अरण्य वृक्षों से घिरा हुआ था जिनमें अनेक अम्लान पुष्प थे—स्वादिष्ट फल थे और हरी-हरी घास वाली भूमि थी तथा बहुत घनी सुस्निग्ध पत्रों की छाया से सब वृक्ष संयुत थे ।३६। वहाँ पर सभी ओर कानों को श्रवण करने में परम प्रिय लगाने वाली आम्र वृक्षों के कोमल पत्रों के खाने से स्निग्ध कण्ठों वाली कोमलों की मधुर ध्वनि थी इससे वह वन संपुष्ट हो रहा था ।३७। उसमें सभी ऋतुओं के कुसुम खिल रहे थे जिन पर भ्रमर गुञ्जार करते हुए झूल रहे थे । बहुत सी लताएँ द्रुमों से लिपटी हुई थीं जो अपने ही प्रसूनों के गुच्छों के भार से नीचे की ओर झुक रही थीं ।३८। वह महारण्य ऐसा ही सुषमा सम्पन्न था कि वहाँ के वृक्षों पर सैकड़ों वानरों के झुण्ड बैठे हुए थे और उस वन में उन्मत्त शिखी-सारङ्ग भ्रमण कर रहे थे तथा पक्षियों का कल कूजन चहुँ ओर हो रहा था ।३६। उस वन में विद्याधरों की वधूटियां गीत गा रही थीं जिससे वह वन मन का हरण करने वाला हो रहा था । उस परम गहन वन में किन्नर-किन्नरियों के जोड़े सञ्चरण करते हुए शोभित हो रहे थे ।४०। उस वन में बहुत से सरोवर थे जिनसे चारों ओर वन घिरा हुआ था जिनका उपान्त सुस्वरों वाले हंस-सारस-चक्रवाक-कारण्डव और शुक आदि से समावृत हो रहा था ।४१। उन सरोवरों में कमल-कल्हार-कुमुद और उत्पल बहुत अधिक परिमाण में विकसित हो रहे थे । वहाँ पर मन्द मारुत के परिवहन से सभी दिशायें पूरित हो रही थीं ।४२।

एवंविधगुणोपेतमधिगाह्य तपोवनम् ।
गच्छन्रथेनाथ नृपः प्रहर्षं परमं ययौ ॥४३
उपशान्ताशयः सोऽथ संप्राप्याश्रममंडलम् ।
भार्याभ्यां सहितः श्रीमान्वाहादवरुरोह वै ॥४४
धुर्यान्विश्रामयेत्युक्त वा यंतारमवनीपतिः ।
आससादाश्रमोपांतं महर्षेर्भावितात्मनः ॥४५
स श्रुत्वा मुनिशिष्येभ्यः कृतनित्यक्रियादरम् ।
मुनि द्रष्टुं विनीतात्मा प्रविवेशाश्रमं तदा ॥४६
मुनिमध्ये समासीनमृषिवृन्दैः समन्वितम् ।
ननाम शिरसा राजा भार्याभ्यां सहितो मुदा ॥४७

सगर का और्वाश्रम में आगमन ] [ ४१६

कृतप्रणामं नृपतिमृषिर्बोर्वः प्रतापवान् । उपविशेति प्रेम्णा वै सह ताभ्यां समादिशत् ॥४८ अर्घ्यपाद्यादिभिः सम्यक्पूजयित्वा महामुनिः । आतिथ्येन च वन्येन सभार्यं तमतोषयत् ॥४९

इस प्रकार के गुणों से सुसम्पन्न उस तपोवन का अधिग़ाहन करके रथ के द्वारा गमन करते हुए नृप सगर को परमाधिक प्रसन्नता प्राप्त हुई थी ।४३। उपशान्त आश्रम के मण्डल में पहुँचकर फिर श्री सम्पन्न वह राजा अपने यान से नीचे उतर गया था ।४४। उस नृप ने सारथि से कहा था कि इन अश्वों को विश्राम करने दो और फिर भावितात्मा महर्षि के आश्रम के उपान्त में पहुँच गया था ।४५। उस राजा ने यह मुनि के शिष्यों से सुन लिया था कि मुनिवर नित्य क्रिया कर चुके हैं तभी उस विनीत आत्मा वाले नृप ने मुनि के दर्शन करने के लिए उस आश्रम में प्रवेश किया था ।४६। वे महामुनीन्द्र अनेक मुनियों के मध्य में विराजमान थे और चारों ओर ऋषियों के समुदाय वहाँ पर सन्निहित थे । उसी समय में राजा ने भार्याओं के साथ बड़ी ही प्रसन्नता से मुनिवर के चरणों में शिर झुकाकर प्रणाम किया था ।४७। जब राजा ने प्रणाम किया था तो प्रताप वाले और्व ऋषि ने बड़े ही प्रेम से दोनों पत्नियों के सहित उस नृप को ‘बैठ जाओ’ यह आज्ञा दी थी ।४८। तब महामुनि ने समागत उस अतिथि नृप का भारतीय संस्कृति की मर्यादानुसारिता से अर्घ्य पाद्य आदि से भली-भाँति अर्चन करके भार्याओं के सहित उस नृप को वन्य आतिथ्य सत्कार से भली-भाँति किया था ।४९।

अथातिथ्योपविश्रान्तं प्रणम्यासीनमग्रतः । राजानमब्रवीदौर्वः शनैर्मृद्वक्षरं वचः ॥५० कुशलं ननु ते राज्ये वाह्येष्वाभ्यंतरेषु च । अपि धर्मेण सकलाः प्रजास्त्वं परिरक्षसि ॥५१ अपि जेतुं त्रिवर्गं त्वमुपायैः सम्यगीहसे । फलंति हि गुणास्तुभ्यं त्वया सम्यक्प्रचोदिताः ॥५२ दिष्ट्या त्वया जिताः सर्वे रिपवो नृपसत्तम । दिष्ट्या च सकलं राज्यं त्वया धर्मेण रक्ष्यते ॥५३ धर्म एव स्थितिर्येषां तेषां नास्त्यथ विप्लवः । न तं रक्षति किं धर्मः स्वयं येनाभिरक्षितः ॥५४

४२० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

पूर्वमेवाहमश्रौषं विजित्य सकलां महीम्। सबलो नगरीं प्राप्तः कृतदारो भवानिति ॥५५॥ राज्ञां तु प्रवरो धर्मो यत्प्रजापरिपालनम्। भवंति सुखिनो नूनं तेनैवेह परत्र च ॥५६॥ स भवानाज्यभरणं परित्यज्य मदंतिकम्। भार्याभ्यां सहितो राजन्समायातोऽसि मे वद ॥५७॥ जैमिनिरुवाच- एवमुक्तस्तु मुनिना सगरो राजसत्तमः। कृतांजलिपुटो भूत्वा प्राह तं मधुरं वचः ॥५८॥

इसके अनन्तर आतिथ्य और विश्रान्ति हो जाने पर आगे विराजमान ऋषि को प्रणाम करने के पश्चात् और्व महामुनि ने राजा से धीरे-धीरे मृदु वचन कहे थे ।५०। हे राजन् ! आपके राज्य में बाहिर और भीतर सब प्रकार का कुशल-क्षेम तो है न ? और तो धर्मके साथ अपनी मस्तक प्रजा की सुरक्षा तो कर ही रहे हैं न ? ।५१। आप तीनों वर्गों को जीतने के लिए उपायों के द्वारा अच्छी तरह से अभिलाषा करते हैं न ? आपके द्वारा भली-भाँति प्रेरित गुण गण आपके लिये फल दिया ही करते हैं न ? ।५२। हे नृपश्रेष्ठ ! यह तो बड़े ही हर्ष की बात है कि आपने समस्त शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर ली है। यह भी बड़े ही प्रसन्नता है कि आप धर्म पूर्वक सम्पूर्ण राज्य की सुरक्षा किया करते हैं ।५३। जिनकी धर्म में ही स्थिति होती है उनको महालोक में कोई भी विप्लव नहीं हुआ करता है। जब वह धर्म जिसके द्वारा अभिरक्षित होता है तो क्या वह स्वयं ही उसकी रक्षा नहीं किया करता है ? अवश्य धर्म उसकी सुरक्षित होकर रक्षा करता है ।५४। यह तो पूर्व में ही सुन लिया था कि आपके सम्पूर्ण वसुन्धरा पर विजय प्राप्त करके अपने बल के साथ सपत्नीक अपनी नगरी में प्राप्त हो गये हैं ।५५। राजाओं का तो यही परमश्रेष्ठ धर्म होता है कि इनके द्वारा अपनी प्रजा का परिपालन किया जाता है। ऐसे ही नृप निश्चय ही इस लोक में और परलोक में सुखी हुआ करते हैं ।५६। तैसे राजा आप हैं फिर राज्य के भरण को त्याग करके इस समय में मेरे समीप में समागत हुए हैं और दोनों पत्नियों को भी साथ में लेकर आये हैं। राजन् ! क्या कारण है मुझे आप इस आगमन का जो भी कारण हो बतलाइये ।५७। जैमिनी मुनि ने कहा—उस मुनि के द्वारा इस रीति से राजा से पूछा था तो उस परम श्रेष्ठ नृप सगर ने दोनों करों को जोड़कर उनसे मधुर वचनों में निवेदन किया था ।५८।

४. द्वितीय खण्ड — भूमिका व उपोद्घातपाद (विस्तार)

ब्रह्माण्ड पुराण

(द्वितीय खण्ड)

(सरल भाषानुवाद सहित जनोपयोगी संस्करण)


सम्पादक:

डॉ० चमन लाल गौतम

रचयिता—प्राणायाम के असाधारण प्रयोग, ओंकार सिद्धि, मंत्र शक्ति से रोग निवारण, विपत्ति निवारण-कामना सिद्धि, श्रीमद्भागवत् सप्ताह कथा, योगासन से रोग निवारण, तन्त्र विज्ञान, तन्त्र रहस्य, मनुस्मृति, सूर्य पुराण, तंत्र महाविज्ञान, कालिका पुराण, मानसागरी आदि।

भूमिका

पुराणों में यही अन्तिम पुराण है। उच्च कोटि के पुराण में इसे महत्त्व-पूर्ण स्थान प्राप्त है। इसकी प्रशंसा में पुराणकार यहाँ तक चले गये कि उन्होंने इसे वेद के समान घोषित किया। इसका अभिप्राय यह हुआ कि पाठक जिस उद्देश्य की पूर्ति के लिए वेद का अध्ययन करता है, उस तरह की विषय सामग्री उसे यहाँ भी प्राप्त हो जाती है और वह जीवन को चतुर्मुखी बना सकता है।

इस पुराण के पठन-पाठन, मनन-चिन्तन और अध्ययन की परम्परा भी प्रशंसनीय है। गुरु ने अपने शिष्यों में से इसका ज्ञान अपने योग्यतम शिष्य को उसका पात्र समझ कर दिया ताकि इसकी परम्परा अबाध गति से निरन्तर चलती रहे। भगवान प्रजापति ने वसिष्ठ मुनि को, भगवान वसिष्ठ ऋषि ने परम पुण्यमय अमृत के सदृश इस तत्व ज्ञान को शक्ति के पुत्र अपने पौत्र पाराशर को दिया। प्राचीन काल में भगवान पाराशर ने इस परम दिव्य ज्ञान को जातूकर्ण्य ऋषि को, जातूकर्ण्य ऋषि ने परम संयमी द्वैपायन को पढ़ाया। द्वैपायन ऋषि ने श्रुति के समान इस अद्भुत पुराण को अपने पाँच शिष्यों जैमिनि, सुमन्तु, वैशम्पायन पेलव और लोमहर्षण को पढ़ाया। सूत परम विनम्र, धार्मिक और पवित्र थे। अतः उनको यह अद्भुत वृतान्त वाला पुराण पढ़ाया था। ऐसी मान्यता है कि सूतजी ने इस पुराण का श्रवण भगवान व्यास देव जी से किया था। इन परम ज्ञानी सूत जी ने ही नैमिषारण्य में महात्मा मुनियों को इस पुराण का प्रवचन किया था। वही ज्ञान आज हमारे सामने है।

पुराण का लक्षण है—सर्ग अर्थात् सृष्टि और प्रति सर्ग अर्थात् उस सृष्टि से होने वाली सृष्टि, वंशों का वर्णन, मन्वन्तर अर्थात् मनुओं का कथन। इसका तात्पर्य यह है कि कौन-कौन मनु किस-किस के पश्चात् हुए ! वंशों में होने वालों का चरित यह ही पाँचों बातों का होना पुराण का लक्षण है। यह सभी लक्षण इस पुराण में उपस्थित हैं। इसके चार पाद हैं-

( ६ )

प्रक्रिया, अनुषंग, उपोद्घात और उपसंहार। इन्हीं के द्वारा सम्पूर्ण वर्णन हुआ है।

इस पुराण के नामकरण का रहस्य है कि इसमें समस्त ब्रह्मांड का वर्णन है। भुवन कोष का उल्लेख तो सभी पुराणों में मिलता है परन्तु प्रस्तुत पुराण में सारे विश्व का सांगोपांग वर्णन उपलब्ध होता है। इसमें विश्व के भूगोल का विस्तृत व रोचक विवेचन है। इसमें ऐसी-ऐसी जानकारी मिलती है जिसे देखकर आश्चर्य होता है कि बिना वैज्ञानिक सहयोग के इतनी गहन खोज कैसे की होगी। वैज्ञानिक युग में अभी तक उसकी पुष्टि भी नहीं हो पायी है।

पुराण में स्वायम्भुव मनु के सर्ग व भारत आदि सब वर्षों की समस्त नदियों का वर्णन है। फिर सहस्रों द्वीपों के भेदों का सात द्वीपों में ही अन्तर्भाव हैं, जम्बूद्वीप और समुद्र के मण्डल का विस्तार से वर्णन है। पर्वतों का योजना-बद्ध उल्लेख है। जम्बूद्वीप आदि सात समुद्रों के द्वारा घिरे हुए हैं। सप्तद्वीप का प्रमाण सहित वर्णन है। सूर्य, चन्द्र और पृथ्वी को पूर्ण परिणाम बताया गया है। सूर्य की गति का भी उल्लेख है। ग्रहों की गति और परिमाण भी कहे गये हैं। इस तरह से विश्व के भूगोल का महत्वपूर्ण उल्लेख है।

वेद के सम्बन्ध में भी यह जानकारी उल्लेखनीय है कि विभु बुद्धिमान गीर्ण स्कन्ध ने सन्तान के हेतु से एक वेद के चार पाद किये थे और ईश्वर ने चार प्रकार से किया था। भगवान शिव के अनुग्रह से व्यास देव ने उसी भाँति भेद किया था। उस वेद की शिष्यों और प्रशिष्यों ने वेद की अयुत शाखाएं की थीं।

इस पुराण के विषय में एक विशेष बात यह है कि ईसवी सन् ५ की शताब्दी में इस पुराण को ब्राह्मण लोग जावा द्वीप ले गये थे। वहाँ की प्राचीन "कवि भाषा" में अनुवाद हुआ जो आज भी मिलता है। इससे इस पुराण की प्राचीनता का भी बोध होता है।

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पुराणकार ने श्राद्ध के विषय को बड़े ही साङ्गोपाङ्ग रूप में, मुख्य तथा अवान्तर प्रभेदों के साथ दिया है। परशुराम की महिमा तथा गौरव का विवेचन असाधारण ढंग से किया गया है। परशुराम कार्तवीर्य हैहय के संघर्ष का बड़े विस्तार के साथ वर्णन है। परशुराम जी पहले महेन्द्र पर्वत (वर्तमान गंजम जिले में पूर्वी घाट की आरम्भिक पहाड़ी) पर तप करते थे। जब ये सारी पृथ्वी को दान में दे चुके तो अपने निवास के लिए उन्हें भूमि की आवश्यकता प्रतीत हुई। उन्होंने समुद्र से भूमि की याचना की जो सत्याद्रि तथा अरब सागर के बीच में संकरी भूमि है" यही चित्पावन ब्राह्मणों का मूल स्थल कोंकण है। परशुराम से प्रमुख रूप से सम्बन्धित होने के कारण इस पुराण का उदय-स्थल सत्यादि तथा गोदावरी प्रदेश में होना उपयुक्त दिखाई देता है।

राजाओं के जीवन चरित्र से पुराण का महत्व बढ़ा है। उनके गुण व अवगुण दोनों ही उजागर हुए हैं। उत्तानपाद राजा के पुत्र ध्रुव का चरित्र घोर संघर्ष से सफलता प्राप्त करने और दृढ़ सङ्कल्प से सिद्धि प्राप्त करने का प्रतीक है। चाक्षुष मनु के सर्ग का कथन भी उपयोगी है। राजा यदु और राजर्षि देव का वर्णन भो रोचक बन पड़ा है। राजा कंस की कथा से स्पष्ट है कि जब धर्म की हानि से अत्याचार चरम सीमा तक पहुँच जाते हैं तो उनसे निवृत्ति के लिए भगवान अवतरित होते हैं। राजा शान्तनु के पराक्रम के विवरण के साथ भविष्य में होने वाले राजाओं के उपसंहार का भी कथन दिया गया है जो एक आश्चर्य है। राजा सगर और राजा भगीरथ द्वारा गङ्गा का स्वर्गलोक से पृथ्वी लोक पर अवतरण घोर श्रम द्वारा असम्भव को सम्भव बनाने की लोक प्रिय गाथा है।

तपस्वी ऋषियों की गौरव गाथाएँ भी कम अनुकरणीय नहीं हैं। कश्यप, पुलस्त्य, अत्रि, पराशर की कथाएँ रोचक हैं। भार्गव चरित्र विस्तार से वर्णित है। महर्षि वासिष्ठ ज्ञान के और महर्षि विश्वामित्र सृजन के प्रतीक होते हैं।

( ८ )

चारों युगों के विस्तृत वर्णन से आश्चर्य तो होता ही है, साथ ही ऋषियों की प्रतिभा का भी आभास होता है। रौरव आदि नरकों के वर्णन से सभी प्राणियों के पापों के परिणामों का निर्णय किया गया है। इससे पाठक को अपने कर्मों की समीक्षा करके जीवन मार्ग को नये ढङ्ग से निर्धारित करने की प्रेरणा मिलती है।

पुराण को साहित्य की दृष्टि से भी उत्कृष्ट माना जाता है क्योंकि निबन्ध ग्रन्थों में इसके श्लोक दिखाई देते हैं। मिताक्षरा अपरार्क, स्मृति चन्द्रिका, कल्पतरु में इसके श्लोक उद्धृत किये गये हैं। इससे लगता है साहित्यकारों की दृष्टि में यह पुराण उच्च महत्व का है। कालिदास की रचनाओं का और उनकी वैदर्भी रीति का प्रभाव भी इस पुराण के विवेचन पर है। इतिहास कारों का मत है कि पुराण की रचना गुप्तोत्तर युग में अर्थात् ६०० ईस्वी में मानना उचित है।

—चमनलाल गौतम

ब्रह्माण्ड पुराण

(द्वितीय खण्ड)

॥ असमंजस का त्याग ॥

सगर उवाच-

कुशलं मम सर्वत्र महर्षे नात्र संशयः ।
यस्य मे त्वमनुध्याता शमं भार्गवसत्तमः ॥१
यस्तथा शिक्षितः पूर्वमस्त्रे शस्त्रे च सांप्रतम् ।
सोऽहं कथमशक्तः स्यां सकलारिविनिग्रहे ॥२
त्वं मे गुरुः सुहृद्दैवं बंधुमित्रं च केवलम् ।
न ह्यन्यमभिजानामि त्वामृते पितरं च मे ॥३
त्वयोपदिष्टेनास्त्रेण सकला भूभृतो मया ।
विजिता यदनुस्मृत्या शक्तिः सा तपसस्तव ॥४
तपसा त्वं जगत्सर्वं पुनासि परिपासि च ।
स्रष्टुं संहर्तुमपि च शक्नोष्वेव न संशयः ॥५
महाननन्यसामान्यप्रभावस्तपसश्च ते ।
इह तस्यैकदेशोऽपि दृश्यते विस्मयप्रदः ॥६
पश्य सिंहासने बाल्यादुपैत्य मृगपोतकः ।
पिबत्यंभः शनैर्ब्रह्मन्निः शंकं ते तपोवने ॥७

राजा सगर ने कहा—हे महर्षे ! मेरे यहाँ सर्वत्र कुशल है—इसमें तो कुछ भी संशय नहीं है जिस मेरे विषय में भार्गव श्रेष्ठ आप शमका अनुध्यान करने वाले विद्यमान हैं। जिसको पूर्व में ही शस्त्रास्त्रों के प्रयोग करने की भली भाँति शिक्षा-दीक्षा दे दी गयी है वह मैं इस समय समस्त

१० ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

शत्रुओं के विनिग्रह करने में कैसे असमर्थ हो सकता हूँ ।१-२। आप तो मेरे गुरुदेव हैं— सुहृत्-दैव-बन्धु और मित्र हैं। केवल आप ही मेरे सब कुछ हैं। मैं तो आपके अतिरिक्त अन्य किसी को भी मेरा पिता नहीं जानता हूँ ।३। आपके द्वारा उपदेश किये गये अस्त्र से ही मैंने सब नृपों पर विजय प्राप्त की है जिनके स्मरण से ही पूर्ण विजय मेरी हुई है यह आपके ही तप की शक्ति है। यहाँ पर उसका एक देश भी विस्मय देने वाला दिखलाई देता है ।४-६। देखिये, मृग का शिशु बचपन से ही सिंहासन पर समीप में आकर हे ब्रह्मन् ! धीरे-धीरे जल पी रहा है और वह आपके इस तपोवन में बिल्कुल ही निःशङ्क अर्थात् भय से रहित है ।७।

धयत्यतिविश्रम्भात् कृशाऽपि हरिणीस्तनम् । करोति मृगशृंगाग्रे गंडकंडूयनं रुरुः ॥८ नवप्रसूतां हरिणीं हत्वा वृत्त्यै वनांतरे । व्याघ्री त्वत्तसावासे सैव पुष्णाति तच्छिशून् ॥९ गजं द्रुतमनुद्रुत्य सिंहो यस्मादिदं वनम् । प्रविष्टोऽनुसरंतौ त्वद्भयादेकत्र तिष्ठतः ॥१० नकुलस्त्वाखुमार्जारमयूरशशपन्नगाः । वृकसूकरशार्दूलशरभर्क्षप्लवंगमाः ॥११ श्रृगाला गवया गावो हरिणा महिषास्तथा । वनेऽत्र सहजं वैरं हित्वा मैत्रीमुपागताः ॥१२ एवंविधा तपः शक्तिर्लोकविस्मयदायिनी । न क्वापि दृश्यते ब्रह्मंस्त्वामृते भुवि दुर्लभा ॥१३ अहं तु त्वत्प्रसादेन विजित्य वसुधामिमाम् । रिपुभिः सह विप्रर्षे स्वराज्यं समुपागतः ॥१४

वह अत्यन्त दुबली हरिणी भी अत्यधिक विश्राम के साथ अपने स्तन को पिला रही है। हरिण मृग छोना के गण्डों को शृङ्ग के अग्रभाग से खुजला रहा है ।८। नव प्रसूता अर्थात् हाल ही में प्रसव करने वाली हरिणी को मारकर वृत्ति के लिए दूसरे वन में वही व्याघ्री आप के इस तपस्या के आश्रम में उसके शिशुओं के पोषण कर रही है ।९। एक सिंह एक हाथी के

असमंजस का त्याग ] [ ११

पीछे आक्रमण करके जब यहाँ पर आ गया है तो प्रवेश करते ही अनुसरण करते हुए वे दोनों सिंह और गज आपके ही भय से एक ही स्थान में स्थित हो रहे हैं ।१०। जो स्वभाव से ही आपस में शत्रु होते हैं वे सभी नकुल-मूषक-मार्जार-मयूर-शश-सर्प-वृक-सूकर--शार्दूल--शरभ-प्लवङ्गम-शृगाल-गवय-गौ हरिण और महिष ये सभी एक-एक के शत्रु होते हुए भी इस वन में अपने स्वाभाविक वैर को भूलकर परस्पर मैत्री के भाव को प्राप्त हो गये हैं ।११-१२। इस प्रकार की यह आपकी ही शक्ति है जो लोगों को बड़ा ही विस्मय देने वाली है। हे ब्रह्मन् ! आपके बिना लोक में इस भूमि पर ऐसी दुर्लभ शक्ति अन्यत्र कहीं पर भी दिखलाई नहीं देती है ।१३। और मैं तो आपके ही प्रसाद से इस सम्पूर्ण वसुधा को जीतकर सब रिपुओं को ध्वस्त करके अपने राज्य में प्राप्त हुआ हूँ ।१४।

वश्यामात्यस्त्रिवर्गेऽपि यथायोग्यकृतादरः । त्वयोपदिष्टमार्गेण सम्यग्राज्यमपालयम् ।।१५

एवं प्रवर्त्तमानस्य मम राज्येऽवतिष्ठतः । भवद्दिक्षा संजाता सापेक्षा भृगुपुंगव ।।१६

किं त्वद्य मयि पर्याप्तमनपत्यतयैव मे । पितृपिण्डप्रदानेन सह संरक्षणं भुवः ।।१७

तदिदं दुःखमत्यर्थमनिवार्यं मनोगतम् । नान्योऽपहर्त्ता लोकेऽस्मिन् ममेति त्वामुपागतः ।।१८

इत्युक्तः सगरेणाथ स्थित्वा सोऽन्तर्मनाः क्षणम् । उवाच भगवानौर्वः सनिदेशमिदं वचः ।।१९

नियम्य सह भार्याभ्यां किञ्चित्कालमिहावस । अवाप्स्यति ततोऽभीष्टं भवान्नात्र विचारणा ।।२०

स च तत्रावसत्प्रीतस्तच्छुश्रूषापरायणः । पत्नीभ्यां सह धर्मात्मा भक्तियुक्तश्चिरं तदा ।।२१

मेरे सभी अमात्य वश्य हैं और तीनों वर्गों में भी मैं यथायोग्य आदर प्राप्त करने वाला हूँ । आपके ही द्वारा जो उपदेश प्राप्त किया है उसी मार्ग से मैंने अच्छी तरह से राज्य का परिपालन किया है ।१५। इसी रीति से मैं