भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३६४ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण

को पूर्णतया शून्य कर दिया था । वह राजा ऐसा बलवान् था कि उसने अपनी समग्र सेना के द्वारा मर्दन करके सबको भीड़ डाला था और सम्पूर्ण भूतल को प्रमृष्ट कर दिया था ।१६। उस राजा ने हैहयों के समस्त राज्य को धूल में मिला दिया था। जब वहाँ कुछ भी शेष न रहा तो वे सब अपने राज्य और पुरोंको छोड़कर क्षीण कान्ति वाले और विनष्ट ऐश्वर्य वाले हो गये थे ।१७। जो राजा मरने से बच गये थे ऐसे बहुत से वहाँ चारों ओर भाग गये थे । उस महीपति ने जो भी वहाँ से भाग रहे थे उनको वेग से आगे बढ़कर निग्रहीत कर लिया था ।१८। इस मदोन्मत्त बलवान् नृप ने क्रुद्ध अन्तक जैसे प्रजाओं को मार दिया करता है वैसे ही इसने भी सबका संहार कर दिया था । समर में शत्रुओं के हनन करने वाले राजा सगर ने उन पर बड़ा भारी क्रोध किया था ।१६। फिर सगर नृप ने महान् रौद्र-शत्रुओं के लिये बहुत ही भीषण भार्गव अस्त्र को उन पर छोड़ा था । इस महास्त्र का बड़ा भारी सब पर प्रभाव पड़ा था । उसके छोड़े जाने पर जो कि अत्यन्त ही रौद्र था, वह तीनों भुवनों को भय देने वाला था । ऐसा प्रस्फुरण करता हुआ जो भार्गव अस्त्र था उसकी ज्वालाओं से दग्ध होते हुए और अवश शरीरों वाले वे समस्त नृपगण हो गये थे । इसके उपरान्त जो वायु-अस्त्र का प्रयोग करने से चारों ओर धूम के समूह ने उनको ऐसा घेर लिया था कि वहाँ पर घोर अन्धकार से उन को दृष्टि भी मुष्ट हो गयी थी अर्थात् देखने की शक्ति समाप्त हो गयी थी और मुहूर्त्त भर तक तो वे सब अधिक अन्धकार और रज से ढके हुए होकर भूमि के पृष्ठ पर लोटते हुए चक्कर काट रहे थे ।२०। शत्रुओं के सैनिकों की दशा उस समय में ऐसी हो गयी थी कि छोड़े हुए आग्नेयास्त्र के प्रताप से जिनकी गति प्रतिहत हो गयी है अर्थात् वे चलने में असमर्थ हो गये थे क्योंकि उनको उस समय में मार्ग दिखलाई नहीं दे रहा था—चारों ओर उन नृपों के सङ्ग नष्ट हो गये थे और उनके शरीर परवश हो गये थे तथा उनके चित्त व्याकुल हो गये थे । वे ऐसे भीत हो गये थे कि उन्होंने अपने वस्त्र-आयुध-कवच और विभूषा आदि सबका त्याग कर दिया था-उनके मस्तकों के केश खुले हुए थे—वे सब अत्यन्त उन्मत्तों के ही भावों का उस समय में अनुकरण कर रहे थे ।२१।

विजित्य हैहयान्सर्वान्समरे सगरो बली ।
संक्षुब्धसागराकारः काम्बोजानभ्यवर्तत ॥२२॥