भारतकोश
संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)

Brahmanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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सगर-प्रतिज्ञा वर्णन ] [ ३६५

नानावादित्रघोषाहतपटहरवाकर्णनध्वस्तधैर्याः सद्यः संत्यक्तराज्यस्वबलपुरपुरंध्रीसमूहा विमूढाः । कांबोजास्तालजंघाः शकयवनकिरातादयः साकमेते भ्रमुर्भूर्यंत्रभीत्या दिशि दिशि रिपवो यस्य पूर्वापराधाः ॥२३

भीतास्तस्त नरेश्वरस्य रिपवः केचित्प्रता- पानलज्वालामुष्टदृशो विसृज्य वसतिं राज्यं च पुत्रादिभिः । द्विट्सैन्यैः समभिद्रुता वनभुवं संप्राप्य तत्रापि तेऽ- स्तैमित्यं समुपागता गिरिगुहासुप्तोत्थितेन द्विपः ॥२४

तालजंघान्निहत्याजौ राजा सबलवाहनान् । क्रमेण नाशयामास तद्राज्यमरिकर्षणः ॥२५

ततो यवनकांबोजकिरादीननेकंशः । निजघान रुषाविष्टः पल्हवान्पारदानपि ॥२६

हन्यमानास्तु ते सर्वे राजानस्तेन संयुगे । द्रुद्रुवुः संघशो भीता ह्यवशिष्टाः समंततः ॥२७

युष्माभिर्यस्य राज्यं बहुभिरपहृतं तस्य पुत्रोऽधुनाऽहं हन्तुं वः सप्रतिज्ञ प्रसममुपगतो वैरनिर्यातनैषी । इत्युच्चैः श्रावयाणो युधि निजचरितं वैरिभिर्नागवीर्यः क्षत्रैर्विध्वंसितेजाः सगरनरपतिः स्मारयामास भूपः ॥२८

समर में उस समय में सगर नृप ने सब हैहय नृपों को पराजित करके वह बलवान् नृप संक्षुब्धसागर के समान आकार वाला हो गया था और फिर उसने काम्बोजों पर आक्रमण किया था ।२२। जिन्होंने सगर नृप का पहिले अपराध किया था वे सब इस समय में बहुत ही बुरी दशा में पड़कर दिशाओं में मारे-मारे इसके शत्रुगण भूमि पर भ्रमण कर रहे थे अर्थात् प्राणों की रक्षा के लिए भटकते हुए घूम रहे थे । जब युद्ध में अनेक तरह के वाद्यों के घोष से और पटहों की ध्वनि के श्रवण करने से उन सब