संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८२ ] [ ब्रह्माण्ड पुराण
काश्यपाय ददौ सर्वामृते तं शैलमुत्तमम् । आत्मनः सन्निवासाथं तं रामः पर्यकल्पयत् ॥५४॥ ततः प्रभृति राजेंद्र पूजयामास शास्त्रतः । हिरण्यरत्नवस्त्राश्वगोगजान्नादिभिस्तथा ॥५५॥ पुरा समाप्य यज्ञांते तथा चावभृथाप्लुतः । चक्रे द्रव्यपरित्यागं तेषामनुमते तदा ॥५६॥
इन समस्त मुनियों ने तथा अन्यों ने क्रम के अनुसार अन्यान्य जो भी कर्म उस यज्ञशाला में थे उनको किया था । उस यज्ञ में भगवान् भृगु भी अपने पुत्रों-शिष्यों और प्रशिष्यों के सहित पधारे थे । उन्होंने अन्यान्य मुनियों के साथ हे राजन् ! यज्ञ की सदस्यता की थी अर्थात् सब सदस्य बन गये थे और उन सबके साथ मिलकर भृगुपुङ्गव परशुरामजी ने उस सम्पूर्ण कर्म को सुसम्पन्न किया था ।५०-५१। जब सम्पूर्ण कर्म समाप्त हो गया था यथा रीति अपने गुरुदेव के ही साथ ब्रह्माजी का पूजन किया था । फिर रूप लावण्य वाली मही कन्या को महामूल्यवान् आभूषणों से समलंकृत किया था ।५२। फिर उस मही कन्या को जो सहस्रों पुरों और ग्रामों से समन्वित एवं सागरों और अम्बर की माला वाली थी तथा उसमें अनेकों शैल-वन और कानन भी थे । उन मुनि शार्दूल ने उसको अपने समीप में बुला लिया था ।५३। फिर सम्पूर्ण उसको काश्यप मुनि को दे दिया था केवल उस उत्तम महेन्द्र पर्वत को नहीं दिया था जिस पर वे स्वयं निवास किया करते थे क्यों कि परशुरामजी ने उस पर्वत को अपने ही निवास करने के लिए कल्पित कर लिया था ।५४। तभी से लेकर हे राजेन्द्र ! शास्त्रानुसार सुवर्ण-रत्न-वस्त्र-अश्व-गौ-गज आदि के द्वारा उसका पूजन किया था । पहिले इस सब कर्म को समाप्त करके फिर यज्ञ के अवसान समय में वे यज्ञान्त अवभृथ स्नान से आप्लुत हुए थे और उसी अवसर पर उन समस्त महा मुनियों के के अनुमति से फिर द्रव्य का परित्याग कर दिया था ।५५-५६।
दत्त्वा च सर्वभूतानामभयं भृगुनन्दनः । तत्रापि पर्वतवरे तपश्चतुं समारभत् ॥५७॥ ततस्तं समनुज्ञाय सदस्या ऋत्विजस्तथा । ययुर्यथागतं सर्वे मुनयः शंसितव्रताः ॥५८॥