संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 379, कुल 893 में से
संदर्भ में पढ़ेंवसिष्ठ गमन वर्णन ] [ ३८३
गतेषु तेषु भगवानकृतव्रणसंयुतः।
तपो महत्तसमास्थाय तत्रैव न्यवसत्सुखी ॥५६॥
काश्यपी तु ततो भूमिर्जननाथा ह्यनेकंशः ।
सर्वदुःखप्रशांत्यर्थं मारीचानुमतेन तु ॥६०॥
तत्र दीपप्रतिष्ठाख्यव्रतं विष्णुमुखोदितम् ।
चचार धरणीं सम्यक् दुःखैःर्मुक्ताऽभवच्च सा ॥६१॥
इत्येष जामदग्न्यस्य प्रादुर्भाव उदाहृतः ।
यस्मिञ्श्रुते नरः सर्वपातकैर्विप्रमुच्यते ॥६२॥
प्रभावः कार्त्तवीर्यस्य लोके प्रथिततेजसः ।
प्रसंगात्कथितः सम्यङ्नातिसंक्षेपविस्तरः ॥६३॥
इसके पश्चात् भृगुनन्दन ने समस्त प्राणियों के लिए अभय का दान दे दिया था और वहाँ ही उस पर्वत पर तपस्या करने का आरम्भ कर दिया था ।५७। इसके अनन्तर जो भी यज्ञ में समागत सदस्य तथा ऋत्विज थे उन्होंने एवं शंसित व्रतों वाले मुनियों ने सभी ने जैसे-जैसे जहाँ से वहाँ आगमन किया वैसे ही विदा होकर चले गये थे ।५८। उन सबके चले जाने पर भगवान ने अकृतव्रण से संयुत होकर महान तप में समास्थित होकर सुख से सम्पन्न उसी स्थान पर निवास किया करते थे ।५६। इसके पश्चात् जानना था काश्यपी भूमि ने अनेक प्रकार के समस्त दुःखों की प्रशान्ति के लिए मारीच की अनुमति से एक व्रत किया था ।६०। वहाँ पर दीप प्रतिष्ठा नाम वाला व्रत जो कि भगवान विष्णु के मुख से कहा गया था उसको धरणी ने भली भाँति किया था और फिर समस्त दुःखों से मुक्त हो गयी थी ।६१। वह भगवान जामदग्न्य का प्रादुर्भाव सब बता दिया गया है जिसके श्रवण करने पर मनुष्य समस्त पातकों से मुक्त हो जाया करता है ।६२। अपरिमित तेज वाले कार्त्तवीर्य का लोक में जो प्रबल प्रभाव था वह भी प्रसङ्ग से दिया गया था जो न तो अति संक्षिप्त था और न विशेष विस्तृत ही था ।६३।
एवंप्रभावः स नृपः कार्त्तवीर्योऽभवद्भुवि ।
न तादृशः पुमान्कश्चिद्भावी भूतोऽथवा श्रुतः ॥६४॥