संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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दत्तात्रेयाद्वरं वव्रे मृतिमुत्तमपूरुषात् । यत्पुरा सोऽगमन्मुक्तिं रणे रामेण घातितः ॥६५॥ तस्यासीत्पंचमः पुत्रः प्रख्यातो यो जयध्वजः । पुत्रस्तस्य महाबाहुस्तालजंघोऽभवन्नृप ॥६६॥ अभूत्तस्यापि पुत्राणां शतमुत्तमधन्विनाम् । तालजंघाभिधा येषां वीतिहोत्रोऽग्रजोऽभवत् ॥६७॥ पुत्रैः सवीतिहोत्राद्यैर्हैहयाद्यैश्च राजभिः । कालं महांत्तमवसद्धिमाद्रिवनगह्वरे ॥६८॥ यः पूर्वं रामबाणेन द्रवन्पृष्ठेऽभिताडितः । तालजंघोऽपतद्भूमौ मूर्च्छितो गाढवेदनः ॥६९॥ ददर्श वीतिहोत्रस्तं द्रवन्दैववशादिव । रथमारोप्य वेगेन पलायनपरोऽभवत् ॥७०॥
वह नृप कार्त्तवीर्य इस भूमण्डल में इस प्रकार के प्रभाव वाला हुआ था कि उस प्रकार का कोई भी पुरुष न कभी हुआ और न भविष्य में भी होगा तथा न कभी सुना ही गया है ।६४। उसने दत्तात्रेय मुनीन्द्र से यह वरदान प्राप्त किया था कि उसकी मृत्यु किसी महान उत्तम पुरुष से होवे । रण से वह परशुरामजी के द्वारा निहत होकर पहिले मुक्ति को प्राप्त हो गया था ।६५। उस राजा का पाँचवां पुत्र प्रख्यात था जिसका नाम जयध्वज था । हे नृप ! उसका पुत्र महाबाहु तालजङ्घ हुआ था ।६६। उसके भी उत्तम धनुर्धारी सौ पुत्र हुए थे । उन सबके नाम तालजङ्घ था उनमें वीतिहोत्र सबमें बड़ा भाई था ।६७। वह वीतिहोत्र प्रभृति पुत्रों के तथा हैहय वंशश नृपों के सहित उस हिमाद्रि पर्वत के वन गह्वर में बहुत लम्बे समय तक उसने निवास किया था ।६८। जो पहिले राम के बाण के द्वारा भागता हुआ भी पृष्ठ भाग में प्रताड़ित हो गया था । फिर वह तालजङ्घ गहरी वेदना से युक्त होकर मूर्च्छा को प्राप्त हो गया था और भूमि पर गिर गया था ।६९। भाग्यवश उसको भागते हुए वीतिहोत्र ने देखा था । बड़े ही वेग से उसको रथ पर समारोपित करके वह भाग जाने में तत्पर हो गया था ।७०।