संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवसिष्ठ गमन वर्णन ] [ ३८५
ते तत्र न्यवसन्सर्वे हिमाद्रौ भयपीडिताः । कृच्छ्रं महांतामासाद्य शाकमूलफलाशनः ॥७१ ततः शांतिं गते रामे तपस्यासक्तमानसे । तालजंघः स्वकं राज्यं सपुत्रः प्रत्यपद्यत ॥७२ सन्निवेश्य पुरीं भूयः पूर्ववन्नृपसत्तमः । वसंस्तदा निजं राज्यमपालयदरिंदमः ॥७३ सुपुत्रः सानुगबलः पूर्ववैरमनुस्मरन् । अभ्याययौ महाराज तालजंघः पुरं तव ॥७४ चतुरंगबलोपेतः कंपयन्निव मेदिनीम् । रुरोदाभ्येत्य नगरीमयोध्यां स महीपतिः ॥७५ ततो निष्क्रम्य नगरात्फल्गुतंत्रोऽपि ते पिता । युयुधे तैर्नृपैः सर्वैर्वृद्धोऽपि तरुणो यथा ॥७६ निहतानेकमातंगतुरंगरथसैनिकः । शत्रुभिर्निर्जितो वृद्धः पलायनपरोऽभवत् ॥७७
वे सभी भागते हुए आकर भय से बहुत पीड़ित हो गये थे और हिमाद्रि पर्वत में बस गये थे । उन सबको महान कष्ट प्राप्त हुआ था और वहाँ पर वे सब शाक-मूल और फलों का अशन करने वाले हुए थे ।७१। जब वहाँ पर परशुराम परत शान्ति को प्राप्त हो जाने पर केवल तपस्या में ही आसक्त मन वाले हो गये थे और फिर उनका कोई भी भय नहीं रहा था तो तालजङ्घ ने अपने पुत्रों के सहित अपना राज्य कर लिया था ।७२। उस श्रेष्ठ राजा ने फिर पूर्व की ही भाँति अपनी नगरी को सन्निवेशित करके उस समय में वहीं पर निवास करते हुए उस अरिन्दम ने अपने राज्य का परिपालन किया था ।७३। हे महाराज ! सुन्दर पुत्र वाले और अपने अनुचरों तथा सेना से युक्त होकर उस तालजङ्घ ने पूर्व वैर का अनुस्मर करके वह तालजङ्घ आपके पुर में अभ्यागत हो गया था ।७४। वह चतुरङ्गिणी सेना से संयुत होकर भूमि को कँपाता हुआ जैसे हो चला था। जब वह अयोध्या नगरी में पहुँचा तो वह राजा रोने लग गया था ।७५। इसके पश्चात् आपके पिता के पास बहुत कम साधन थे तो भी वह नगर से निकल