संक्षिप्त ब्रह्माण्ड पुराण (खण्ड १ व २)
Brahmanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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आये थे और उन समस्त नृपों के साथ वृद्ध होते हुए भी तरुण पुरुष के ही समान उसने घोर युद्ध किया था ।७६। उसके बहुत से हाथी-अश्व-रथ और सैनिक जब निहत हो गये थे तो वह शत्रुओं के द्वारा निर्जित हो गया था और फिर वह वृद्ध वहां से भागने लग गया ।७७।
त्यक्त्वा स नगरं राज्यं सकोशबलवाहनम् । अन्तर्वत्न्या च ते मात्रा सहितो वनमाविशत् ।।७८ तत्र चौर्वाश्रमोपांते निवसन्त्तचिरादिव । शोकामर्षसमाविष्टो वृद्धभावेन च स्वयम् ।।७६ विलोक्यमानो मात्रा ते बाष्पगद्गदकंठया । अनाथ इव राजेन्द्र स्वर्गलोकमितो गतः ।।८० ततस्ते जननी राजन्दुःखशोकसमन्विता । चितामारोपयद्भर्तू रुदती सा कलेवरम् ।।८१ अनशनादिदुःखेन भर्तुर्व्यसनकर्शिता । चकाराग्निप्रवेशाय सुदृढां मतिमात्मनः ।।८२ और्वरुतदखिलं श्रुत्वा स्वयमेव महामुनि । निर्गत्य चाश्रमात्तां च वारयन्निदमब्रवीत् ।।८३ न मर्तव्यं त्वया राज्ञि सांप्रतं जठरे तव । पुत्रस्तिष्ठति सर्वेषां प्रवरश्चक्रवर्तिनाम् ।।८४
उस वृद्ध नृप ने अपना सम्पूर्ण राज्य-नगर-कोश-बल समस्त वाहनों को छोड़कर गर्भवती तुम्हारी माता को साथ में लेकर वन में प्रवेश कर कर लिया था ।७८। वहाँ वन में और्व मुनि के आश्रम के समीप में अल्प समय तक ही उसने निवास किया था और वह स्वयं वृद्धता के कारण से बहुत ही अधिक शोक तथा अमर्ष से समाविष्ट हो गया था। तुम्हारी माता उसको देख रही थी और उसके नेत्रों से अश्रुपात हो रहा था उसका कण्ठ गद्गद हो गया था । हे राजेन्द्र ! वह वृद्ध नृप एक अनाथ के ही समान यहाँ से स्वर्गलोक में चल बसा था ।७६-८०। इसके अनन्तर हे राजन् ! तुम्हारी माता विचारी पति वियोग के महा दुःख और शोक से समन्वित हो गयी थी । फिर करुण क्रन्दन करती हुई उसने स्वामी के मृत शरीर को चिता